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Supreme Court takes a tough stand on prohibition – शराबबंदी पर अदालत ने पूछा,“बदलाव ज़मीन पर कहाँ दिखा?”

शराबबंदी
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 11, 2025 5:58 अपराह्न
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बिहार की शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट नें वह कड़े सवाल उठाए हैं, जिन पर सरकार वर्षों से ठोस जवाब देने में असफल रही है। अदालत ने कहा कि प्रतिबंध एक बड़ा सामाजिक प्रयोग था, लेकिन इतने समय बाद भी सरकार यह नहीं दिखा पा रही कि इससे जनता के जीवन में कितना सुधार आया। अदालत ने तीखे लहजे में पूछा कि यदि कानून इतना प्रभावी है, तो अवैध शराब का जाल क्यों लगातार फैल रहा है और अपराध क्यों नहीं घट रहे?

शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट नें वह कड़े सवाल उठाए

निचली अदालतों में दिक्कत, छोटे मामलों के कारण जेलें भर गईं

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने कहा कि शराबबंदी ने न्यायिक ढाँचे पर अतिरिक्त बोझ डाला है। राज्य की निचली अदालतें शराबबंदी से जुड़े मामलों में इतनी व्यस्त हो गई हैं कि गंभीर अपराधों की सुनवाई प्रभावित होने लगी है। हजारों लोग मामूली उल्लंघन पर जेल भेजे गए, जिससे राज्य की जेलें क्षमता से अधिक भर गईं। अदालत ने यह स्थिति चिंताजनक बताते हुए कहा कि “कानून व्यवस्था सुधारने के लिए बनाया गया कानून ही यदि न्याय प्रणाली को कमजोर कर दे, तो उसकी समीक्षा अनिवार्य है।”

अवैध शराब का बढ़ता ग्राफ, शराबबंदी प्रतिबंध के बावजूद भी इस कारोबार में तेजी

ग्रामीण से लेकर शहरी इलाकों तक अवैध शराब की सप्लाई लगातार जारी है। सीमावर्ती जिलों में बड़े रैकेट पकड़े जा रहे हैं, और हर सप्ताह भारी मात्रा में जब्तियाँ हो रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि प्रतिबंध इतना सख़्त है, तो फिर यह नेटवर्क कैसे बढ़ रहा है? अदालत ने इसे निगरानी तंत्र की कमज़ोरी और प्रशासनिक समन्वय की कमी बताया। अदालत ने कहा कि “केवल जब्ती और छापेमारी सफलता का प्रमाण नहीं हो सकते, जब तक समाज में वास्तविक परिवर्तन न दिखे।”

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अदालत ने पूछा ‘सामाजिक सुधार का आधार कहाँ?’

अदालत ने यह भी कहा कि शराबबंदी मात्र दंडात्मक नीति नहीं है, बल्कि यह सामाजिक सुधार की पहल है। इसके लिए व्यापक जागरूकता अभियान, नशामुक्ति शिविर, काउंसलिंग और पुनर्वास कार्यक्रम अनिवार्य थे, परंतु राज्य सरकार इन मोर्चों पर गंभीर कोशिशें नहीं दिखा पाई। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि कितने परिवार इस नीति से लाभान्वित हुए और कितनी सामाजिक योजनाएँ नियमित रूप से चलीं? अदालत का कहना था कि “प्रतिबंध तब तक सफल नहीं होगा, जब तक लोगों की जीवनशैली और मानसिकता में सकारात्मक बदलाव न आए।”

अदालत के सवालों में आया नया मोड़ अब या तो सुधार या फिर नीति पर पुनर्विचार

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद राजनीतिक हलकों और प्रशासन दोनों में हलचल है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब राज्य के सामने दो ही रास्ते हैं, या तो अदालत के सामने ठोस प्रमाण रखे जाएँ कि शराबबंदी सफल है, या इसे लागू करने की रणनीति में व्यापक सुधार किए जाएँ। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि कागज़ी दावों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखने वाले परिणामों से ही नीति की सफलता तय होगी। अहम पहलू यह है कि यह सुनवाई बिहार के लिए केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि वह क्षण है जहाँ नीति और वास्तविकता आमने-सामने खड़ी हैं। आने वाले दिनों में तस्वीर साफ होगी कि सरकार अदालत की अपेक्षाओं पर खरी उतरती है या फिर शराबबंदी के मॉडल को बड़े बदलावों की दिशा में बढ़ना पड़ेगा।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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