भारत की राजधानी नई दिल्ली में ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है जिसमें दुनिया भर से प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। इस कार्यक्रम का केंद्र लाल किला है — जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का प्रतीक है। आज के इस लेख में हम इस यूनेस्को की बैठक (UNESCO Meeting) के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।

यूनेस्को की बैठक
भारत 8 दिसंबर से 13 दिसंबर 2025 तक यूनेस्को (UNESCO) की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए अंतर-सरकारी समिति (Intergovernmental Committee for the Safeguarding of the Intangible Cultural Heritage – ICH) की 20वीं सत्र (20th Session) की मेजबानी कर रहा है। यह बैठक लाल किले, नई दिल्ली में आयोजित की जा रही है, जो एक विश्व धरोहर स्थल है। यह पहली बार है जब भारत इस समिति के सत्र की मेजबानी कर रहा है, जो कि देश के लिए सम्मान की बात है।
इस बैठक का उद्देश्य विश्वभर की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और उसके महत्व को समझने के लिए नीतियाँ, रणनीतियाँ और साझा समझ विकसित करना है। इसमें 180 से अधिक देशों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं और वे अपने-अपने सांस्कृतिक अनुभव साझा कर रहे हैं।
लाल किला: ऐतिहासिक प्रतीक और आयोजन स्थल
लाल किला, जिसे मुगल शासक शाहजहाँ ने 1638 से 1648 के बीच बनवाया था, भारतीय इतिहास और संस्कृति का प्रतीक है। इसके विशाल किलेबंदी और भव्य स्थापत्य ने इसे विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिलाया है। यूनेस्को की इस बैठक के लिए इसे चुना जाना एक सभ्य और सांस्कृतिक संदेश भी देता है कि भारत अपनी परंपराओं को आधुनिक दुनिया के साथ जोड़ने का प्रयास कर रहा है।
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सुरक्षा इंतज़ाम और आयोजन की पृष्ठभूमि
हाल ही में 10 नवंबर 2025 को लाल किले के पास एक घातक धमाका हुआ था जिसमें कई लोगों की मौत और घायल होने की खबरें आई थीं। इसके बाद से ही सुरक्षा व्यवस्था में काफी सुधार किया गया है और भीषण सुरक्षा इंतज़ाम के बीच बैठक चल रही है।
लाल किले के आस-पास डेली पुलिस, पैरामिलिटरी और सीआईएसएफ के जवान तैनात हैं। प्रवेश केवल उन प्रतिनिधियों, अधिकारियों और मीडिया कर्मियों को अनुमति दी जा रही है जिनके पास विशेष पहचान पत्र (badge) है। पुलिस ने भारी सुरक्षा बैरिकेडिंग लगाई है और रात-दिन गश्त जारी है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना से बचा जा सके।
दिवाली का वैश्विक सांस्कृतिक पहचान में शामिल होना
यूनेस्को की बैठक के दौरान दिवाली (Deepavali) को भी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया गया है। यह भारत की 16वीं सांस्कृतिक परंपरा है जो यूनेस्को की सूची में शामिल हुई है, जिससे भारत की सांस्कृतिक विविधता और गौरव दोनों को वैश्विक पटल पर मजबूती मिली है।दिवाली को इस लिस्ट में शामिल करने का कारण यह बताया जा रहा है कि यह उत्सव समाज में एकता, भाईचारा, प्रकाश का संदेश और सामुदायिक जुड़ाव को बढ़ावा देता है। इससे न केवल भारत बल्कि दुनिया भर में इस पर्व की मान्यता और भी अधिक सुदृढ़ होगी।
बैठक का वैश्विक महत्व और भारत की भूमिका
यूनेस्को की इस समिति का लक्ष्य है कि वह विश्व की सांस्कृतिक और पारंपरिक परंपराओं को संरक्षित रखने में देशों की सहायता करे। खासकर ऐसे जीवित सांस्कृतिक तत्व जिन्हें दस्तावेज़ीकरण की आवश्यकता है — जैसे कि लोकगीत, भाषाएँ, नृत्य-कला, त्योहार और रीति-रिवाज — सबका महत्व समझाया जाए।
इस बैठक के माध्यम से भारत ने यह संदेश दिया है कि वह न केवल अपनी सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा में विश्वास रखता है, बल्कि विश्वभर के सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण में भी भागीदारी चाहता है। ऐसी बैठकें देशों के बीच सांस्कृतिक समझ और सहयोग को बढ़ाती हैं, जिससे साझा हितों पर काम करना आसान होता है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम और आयोजन का माहौल
यूनेस्को बैठक के दौरान लाल किले में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम, परंपरागत संगीत और नृत्य, तथा विविध देशों के सांस्कृतिक प्रदर्शन भी आयोजित किए गए हैं। इससे प्रतिनिधियों को भारत की सांस्कृतिक विविधता और समृद्ध विरासत को करीब से समझने का अवसर मिला है।
भारत सरकार और संस्कृति मंत्रालय द्वारा बैठक के लिए विशेष व्यवस्थाएँ की गई हैं, जिसमें पारंपरिक स्वागत समारोह और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ शामिल हैं। प्रतिनिधि और अतिथि भारत की आतिथ्य की परंपरा का अनुभव कर रहे हैं।
भारत का सांस्कृतिक नेतृत्व और भविष्य के लक्ष्य
यह बैठक भारत के लिए सांस्कृतिक नेतृत्व और वैश्विक पुनरूत्थान का प्रतीक है। भारत ने इस मंच के ज़रिए यह दिखाया है कि वह विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को बचाने, संरक्षित करने और प्रचारित करने में अग्रणी भूमिका निभाना चाहता है।
ऐसे कार्यक्रम दुनिया को यह संदेश देते हैं कि सांस्कृतिक विविधता ही मानवता की असली शक्ति है और इसके संरक्षण के बिना किसी भी समाज का संपूर्ण विकास संभव नहीं है। भारत की पहल इससे वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक बातचीत और समझ को आगे बढ़ाने में मदद करेगी।
निष्कर्ष
लाल किले में आयोजित यह यूनेस्को बैठक न केवल सांस्कृतिक संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि यह भारत के वैश्विक सांस्कृतिक नेतृत्व को भी दर्शाती है। सुरक्षा की दृढ़ व्यवस्था के बावजूद देश ने अपने ऐतिहासिक स्थल को वैश्विक संवाद के लिए समर्पित किया है। दिवाली जैसी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का विश्व धरोहर की सूची में शामिल होना, भारत की rich cultural identity का प्रतीक है और दुनिया को एकता, प्रकाश और सांस्कृतिक विविधता का संदेश देता है।






