देश की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मोदी सरकार पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार योजनाबद्ध तरीके से मनरेगा को कमजोर कर उसे “खत्म करने की चाल” चल रही है। वहीं, कांग्रेस नेता शशि थरूर ने पार्टी के भीतर ही एक फैसले पर असहमति जताते हुए मनरेगा से जुड़े संदर्भ में अपना नाम हटाए जाने को “दुर्भाग्यपूर्ण” करार दिया है। इस पूरे घटनाक्रम ने संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक नई बहस छेड़ दी है।

मनरेगा क्या है और क्यों अहम है
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की गारंटी देना है। यह योजना हर ग्रामीण परिवार को साल में न्यूनतम 100 दिन का रोजगार सुनिश्चित करती है। आर्थिक मंदी, सूखा, महामारी या बेरोजगारी के दौर में मनरेगा को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सुरक्षा कवच माना जाता है। लाखों परिवारों की आय का सहारा बनने वाली इस योजना का सामाजिक और आर्थिक महत्व लंबे समय से स्वीकार किया जाता रहा है।
खरगे का आरोप: जानबूझकर कमजोर किया जा रहा मनरेगा
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का कहना है कि केंद्र सरकार बजट आवंटन में कटौती, भुगतान में देरी और प्रशासनिक अड़चनों के जरिए मनरेगा को धीरे-धीरे अप्रभावी बना रही है। उनके अनुसार, मजदूरी का समय पर भुगतान न होना, काम के दिनों में कमी और तकनीकी प्रक्रियाओं का जटिल होना इस बात का संकेत है कि सरकार इस योजना से पीछे हटना चाहती है। खरगे ने यह भी कहा कि मनरेगा केवल एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण गरीबों के सम्मान और आजीविका से जुड़ा अधिकार है।
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बजट और भुगतान को लेकर उठे सवाल
कांग्रेस का आरोप है कि हाल के वर्षों में मनरेगा के लिए आवंटित राशि वास्तविक जरूरतों से कम रही है। कई राज्यों से मजदूरी भुगतान में लंबी देरी की शिकायतें सामने आई हैं। विपक्ष का कहना है कि जब मजदूरों को महीनों तक मेहनत का पैसा नहीं मिलता, तो योजना का उद्देश्य ही विफल हो जाता है। खरगे ने इसे “नीतिगत उपेक्षा” बताते हुए सरकार से जवाब मांगा है।
शशि थरूर की प्रतिक्रिया: नाम हटाना दुर्भाग्यपूर्ण
इस पूरे विवाद में कांग्रेस नेता शशि थरूर का बयान भी चर्चा में रहा। थरूर ने मनरेगा से जुड़े एक दस्तावेज या पहल से अपना नाम हटाए जाने पर असंतोष जताया और इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उनका कहना था कि मनरेगा जैसे विषय पर व्यापक और समावेशी दृष्टिकोण की जरूरत है। थरूर के अनुसार, व्यक्तिगत या राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर ग्रामीण गरीबों के हित में एकजुट होना चाहिए।
पार्टी के भीतर मतभेद या लोकतांत्रिक बहस?
थरूर की टिप्पणी को कांग्रेस के भीतर विचारों की विविधता के रूप में देखा जा रहा है। कुछ नेताओं का मानना है कि यह आंतरिक लोकतंत्र की स्वस्थ प्रक्रिया है, जहां अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते हैं। वहीं, आलोचकों का कहना है कि ऐसे बयान विपक्ष की एकजुटता को कमजोर कर सकते हैं। हालांकि, थरूर ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी पर निशाना साधना नहीं, बल्कि नीति पर रचनात्मक बहस को आगे बढ़ाना है।
सरकार का पक्ष: पारदर्शिता और सुधार का दावा
केंद्र सरकार मनरेगा को कमजोर करने के आरोपों को खारिज करती रही है। सरकार का कहना है कि डिजिटल भुगतान, आधार-आधारित सत्यापन और तकनीकी सुधारों का मकसद पारदर्शिता बढ़ाना और भ्रष्टाचार रोकना है। सरकार यह भी दावा करती है कि मांग-आधारित योजना होने के कारण काम और भुगतान की प्रक्रिया राज्यों की भूमिका पर भी निर्भर करती है। केंद्र के अनुसार, सुधारों को “खत्म करने की चाल” कहना तथ्यात्मक नहीं है।
ग्रामीण भारत पर संभावित असर
विशेषज्ञों का मानना है कि मनरेगा में किसी भी तरह की अनिश्चितता का सीधा असर ग्रामीण रोजगार, उपभोग और सामाजिक स्थिरता पर पड़ता है। यदि भुगतान में देरी या काम की उपलब्धता कम होती है, तो पलायन बढ़ सकता है। विपक्ष का तर्क है कि मौजूदा आर्थिक चुनौतियों के बीच मनरेगा की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
राजनीतिक रणनीति या नीतिगत चिंता?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मनरेगा पर बहस केवल योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकार और विपक्ष के बीच विकास मॉडल की टकराहट को भी दर्शाती है। एक तरफ सरकार बुनियादी ढांचे और दीर्घकालिक निवेश पर जोर देती है, वहीं विपक्ष सामाजिक सुरक्षा और तत्काल रोजगार को प्राथमिकता देने की बात करता है। इसी टकराव में मनरेगा राजनीतिक प्रतीक बन गया है।
आगे की राह: संवाद और समाधान
मनरेगा को लेकर उठे सवालों का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर नीति संवाद में खोजा जाना चाहिए। समय पर भुगतान, पर्याप्त बजट और सरल प्रक्रियाएं योजना की प्रभावशीलता बढ़ा सकती हैं। साथ ही, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी जरूरी है। शशि थरूर जैसे नेताओं की रचनात्मक आलोचना और खरगे की सख्त राजनीतिक चेतावनी—दोनों ही इस बहस को व्यापक बनाते हैं।
मनरेगा पर जारी विवाद यह दिखाता है कि ग्रामीण रोजगार और सामाजिक सुरक्षा आज भी देश की राजनीति के केंद्र में हैं। खरगे का आरोप हो या थरूर की असहमति, दोनों इस बात की ओर इशारा करते हैं कि योजना को लेकर चिंताएं वास्तविक हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इन आरोपों का कैसे जवाब देती है और क्या मनरेगा को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं। ग्रामीण भारत की उम्मीदें इसी पर टिकी हैं।






