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लैंसेट रिपोर्ट का दावा- भारत में कोयला और पेट्रोलियम जैसे ईंधनों के जलने से हर साल होती है लाखों मौत 

भारत में कोयला और पेट्रोलियम जैसे ईंधनों के जलने से हर साल होती है लाखों मौत
नवजोत कौर सिद्धू
On: जनवरी 24, 2026 12:41 अपराह्न
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यह एक अत्यंत गंभीर और समसामयिक विषय है। लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ (The Lancet Planetary Health) की रिपोर्टों ने बार-बार इस बात की पुष्टि की है कि भारत में वायु प्रदूषण, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन (कोयला और पेट्रोलियम) के दहन से होने वाला प्रदूषण, एक ‘साइलेंट किलर’ बन चुका है।

भारत में कोयला और पेट्रोलियम प्रदूषण: एक गहराता संकट और समाधान

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन इस विकास की कीमत हमारा पर्यावरण और जनस्वास्थ्य चुका रहा है। लैंसेट की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 16.7 लाख से 20 लाख मौतें केवल वायु प्रदूषण के कारण होती हैं। इनमें से एक बड़ा हिस्सा कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों और वाहनों में जलने वाले पेट्रोलियम से निकलने वाले सूक्ष्म कणों PM – 2.5 के कारण होता है।जीवाश्म ईंधन का दहन न केवल ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार है, बल्कि यह हमारे फेफड़ों और रक्तप्रवाह में जहर घोल रहा है।

 मुख्य कारण – जहर कहाँ से आ रहा है?

कोयला और पेट्रोलियम का उपयोग भारत की ऊर्जा और परिवहन व्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन यही मृत्यु का कारण भी बन रहा है।

1 –  कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट

भारत अपनी बिजली का लगभग 70% हिस्सा कोयले से प्राप्त करता है। इन संयंत्रों से निकलने वाला धुआं सल्फर डाइऑक्साइड (SO_2), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO_x) और भारी धातुओं जैसे पारे से भरा होता है।

2 –  परिवहन और पेट्रोलियम (वाहनों का धुआं)

सड़कों पर दौड़ती करोड़ों कारें, ट्रक और बाइक पेट्रोलियम उत्पादों (डीजल-पेट्रोल) का उपयोग करती हैं। शहरी क्षेत्रों में PM – 2.5 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का सबसे बड़ा स्रोत यही है।

3 –  औद्योगिक उत्सर्जन

लोहा, इस्पात और सीमेंट उद्योगों में कोयले का भारी मात्रा में उपयोग होता है। इन उद्योगों में अक्सर उत्सर्जन मानकों का पालन नहीं किया जाता।

4  – घरेलू उपयोग

आज भी ग्रामीण भारत के कई हिस्सों में कोयले और केरोसिन का उपयोग खाना पकाने के लिए किया जाता है, जो घर के अंदर (Indoor) वायु प्रदूषण का कारण बनता है।

स्वास्थ्य पर प्रभाव –  शरीर पर चोट

लैंसेट की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि वायु प्रदूषण केवल सांस की बीमारी नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर को प्रभावित करता है।

  • श्वसन संबंधी बीमारियां – अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD)।
  • हृदय रोग –  PM – 2.5 कण इतने छोटे होते हैं कि वे फेफड़ों के माध्यम से रक्त में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे दिल का दौरा (Heart Attack) और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
  • कैंसर –  लंबे समय तक इन गैसों के संपर्क में रहने से फेफड़ों का कैंसर होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
  • बच्चों पर प्रभाव –  प्रदूषण के कारण बच्चों के फेफड़ों का विकास रुक जाता है और जन्म के समय वजन कम होने जैसी समस्याएं आती हैं।

सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास (निवारण की कोशिशें)

भारत सरकार ने इस संकट की गंभीरता को समझते हुए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं-

योजना/पहलउद्देश्य
NCAP (राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम) 2024 तक 100 से अधिक शहरों में प्रदूषण को 20-30% कम करना। 
BS-VI मानकवाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए सीधे BS-IV से BS-VI ईंधन मानकों को लागू करना।
FAME योजनाइलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के निर्माण और खरीद को बढ़ावा देना। 
उज्ज्वला योजना कोयले और लकड़ी के चूल्हे से मुक्त कर स्वच्छ रसोई गैस (LPG) प्रदान करना। 
नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने का संकल्प। 

हम क्या कर सकते हैं? (बचाव और व्यक्तिगत जिम्मेदारी)

सरकार के भरोसे बैठने के बजाय, नागरिक के तौर पर हमें अपनी जीवनशैली में बदलाव लाने की आवश्यकता है-

  • सार्वजनिक परिवहन का उपयोग –  निजी कारों के बजाय मेट्रो, बस या साइकिल का उपयोग करें। यदि संभव हो, तो कारपूलिंग अपनाएं।
  • इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर कदम – अपना अगला वाहन खरीदते समय इलेक्ट्रिक (EV) विकल्पों पर विचार करें।
  • ऊर्जा की बचत –  बिजली बचाना मतलब कोयले का कम जलना। सौर पैनलों (Solar Panels) का उपयोग करें।
  • मास्क का प्रयोग – अत्यधिक प्रदूषण वाले दिनों में N95 मास्क का उपयोग करें।
  • वृक्षारोपण –  अपने आसपास अधिक से अधिक पेड़ लगाएं, जो प्राकृतिक एयर फिल्टर का काम करते हैं।

भविष्य की राह –  समाधान की दिशा

भारत को यदि अपनी जनता को बचाना है, तो उसे ‘नेट जीरो’ (Net Zero) उत्सर्जन की ओर तेजी से बढ़ना होगा।

  • कोयले से विदाई –  धीरे-धीरे कोयला संयंत्रों को बंद कर सौर, पवन और हाइड्रोजन ऊर्जा की ओर संक्रमण करना होगा।
  • सख्त कानून –  प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर भारी जुर्माना और सख्त निगरानी प्रणाली की आवश्यकता है।
  • शहरी नियोजन – शहरों में ‘ग्रीन बेल्ट’ विकसित करना और पैदल चलने वालों के लिए बेहतर बुनियादी ढांचा तैयार करना।

लैंसेट की रिपोर्ट एक चेतावनी है कि यदि हमने आज अपनी ऊर्जा आदतों को नहीं बदला, तो आने वाली पीढ़ियां एक बीमार भविष्य की ओर बढ़ेंगी। विकास जरूरी है, लेकिन वह विकास किस काम का जिसमें सांस लेना ही दूभर हो जाए? कोयला और पेट्रोलियम पर हमारी निर्भरता कम करना अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन बचाने की अनिवार्यता बन गया है।

Swati Pandey

A versatile writer mainly works on trending news, daily updates from politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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