रजनीगंधा (Tuberose) की खेती भारतीय किसानों के लिए ‘सफेद सोना’ साबित हो रही है। इसकी मनमोहक खुशबू और साल भर रहने वाली मांग इसे फूलों की खेती (Floriculture) में सबसे ऊपर रखती है।
रजनीगंधा- एक परिचय और महत्व
रजनीगंधा मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है
सिंगल (Single)- इसमें पंखुड़ियों की एक ही कतार होती है। यह इत्र (Perfume) और तेल निकालने के लिए सर्वोत्तम है।
डबल (Double)- इसमें पंखुड़ियों की कई कतारें होती हैं। इसका उपयोग गुलदस्ते (Bouquets) और सजावट के लिए किया जाता है।
फरवरी में खेती क्यों?
फरवरी का महीना रजनीगंधा की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इस समय तापमान 20°C से 30°Cके बीच होता है, जो कंद (Bulbs) के अंकुरण के लिए आदर्श है।
जलवायु और मिट्टी का चयन
रजनीगंधा एक उष्णकटिबंधीय पौधा है। इसके सफल उत्पादन के लिए निम्नलिखित स्थितियां आवश्यक हैं
- धूप – इसे प्रतिदिन 6-8 घंटे की सीधी धूप चाहिए। छायादार जगह पर फूल कम आते हैं।
- मिट्टी – जल निकासी वाली दोमट मिट्टी (Loamy Soil) सबसे अच्छी है।
- pH मान – मिट्टी का pH 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए।
- जल निकासी – जलभराव से कंद सड़ सकते हैं, इसलिए खेत में पानी रुकने की व्यवस्था न हो।
खेत की तैयारी और बुवाई की विधि
खेत की तैयारी
- खेत की 2-3 बार गहरी जुताई करें।
- प्रति एकड़ 15-20 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद डालें।
- मिट्टी को भुरभुरा बनाकर समतल कर लें।
- कंद (Bulbs) का चयन और उपचार
- आकार – हमेशा 1.5 से 2.5 सेमी व्यास वाले स्वस्थ कंद चुनें।
- उपचार -”बुवाई से पहले कंदों को बाविस्टिन (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) के घोल में 20-30 मिनट तक डुबोकर रखें ताकि फफूंद न लगे।
बुवाई का तरीका
दूरी ‘ कतार से कतार की दूरी 30 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 20 सेमी रखें।
गहराई – कंद को 5-7 सेमी की गहराई पर बोएं।
खाद, उर्वरक और सिंचाई प्रबंधन
बेहतर उत्पादन के लिए पोषण अनिवार्य है|
| उर्वरक का नाम | मात्रा (प्रति एकड़) | समय |
| नाइट्रोजन (N) | 80-100 किग्रा | तीन भागों में (बुवाई, 60 दिन, 90 दिन) |
| फास्फोरस (P) | 50-60 किग्रा | बुवाई के समय |
| पोटाश (K) | 50-60 किग्रा | बुवाई के समय |
सिंचाई
- गर्मियों में हर 5-7 दिन में सिंचाई करें।
- सर्दियों में 10-12 दिन के अंतराल पर पानी दें।
- ध्यान रहे कि फूल आते समय नमी बनी रहे, लेकिन कीचड़ न हो।
कीट और रोग नियंत्रण (फसल सुरक्षा)
रजनीगंधा में मुख्य रूप से निम्नलिखित समस्याएं आती हैं:
- थ्रिप्स (Thrips) – ये फूलों का रस चूसते हैं। उपचार के लिए इमिडाक्लोप्रिड (0.5 मिली/लीटर) का छिड़काव करें।
- कंद सड़न (Bulb Rot)- जलभराव के कारण होता है। इससे बचने के लिए ट्राइकोडर्मा को गोबर की खाद में मिलाकर डालें।
- नेमाटोड (Nematodes) – जड़ों को नुकसान पहुँचाते हैं। बुवाई के समय नीम की खली का प्रयोग करें।
कटाई और कमाई का गणित
बुवाई के लगभग 3 से 4 महीने बाद फूल आने शुरू हो जाते हैं।
- फूलों की तुड़ाई- अगर आप खुले फूल बेच रहे हैं, तो सुबह के समय केवल खिले हुए फूल तोड़ें। अगर स्टिक (Stick) बेच रहे हैं, तो नीचे के 1-2 फूल खुलने पर पूरी स्टिक काटें।
- पैदावार- एक एकड़ से लगभग 5-8 लाख स्टिक या 15-20 क्विंटल खुले फूल प्राप्त किए जा सकते हैं।
- मुनाफा – खर्च काटकर एक एकड़ से सालाना 3 से 5 लाख रुपये तक की शुद्ध कमाई आसानी से की जा सकती है।
ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें
- खरपतवार नियंत्रण – समय-समय पर निराई-गुड़ाई करते रहें ताकि पोषक तत्व केवल पौधों को मिलें।
- बाजार अनुसंधान – अपनी फसल लगाने से पहले स्थानीय फूलों की मंडी या इत्र बनाने वाली कंपनियों से संपर्क जरूर करें।
- मल्चिंग – मिट्टी की नमी बचाने के लिए प्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग किया जा सकता है।
विशेष सुझाव – रजनीगंधा की खेती के साथ आप मधुमक्खी पालन भी कर सकते हैं, जिससे शहद के रूप में अतिरिक्त आय होगी और परागण (Pollination) भी बेहतर होगा।







