भारत खेलों का दीवाना देश है। क्रिकेट से लेकर हॉकी, कुश्ती, बैडमिंटन और एथलेटिक्स तक, प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। बावजूद इसके, जब भी भारत किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन की मेज़बानी करता है, तो वह गर्व के साथ-साथ विवाद, अव्यवस्था और आलोचनाओं का कारण भी बन जाता है। सवाल यह नहीं है कि भारत में क्षमता नहीं है, सवाल यह है कि फिर हर बार यह प्रक्रिया ‘सिरदर्द’ क्यों बन जाती है। इसके पीछे कई संरचनात्मक, प्रशासनिक और मानसिक कारण छिपे हुए हैं।
बुनियादी ढांचे की कमजोरी और आख़िरी समय की तैयारियां
किसी भी अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन की रीढ़ उसका बुनियादी ढांचा होता है—स्टेडियम, अभ्यास स्थल, खिलाड़ियों के लिए आवास, परिवहन व्यवस्था और तकनीकी सुविधाएं। भारत में अक्सर यहीं से समस्याओं की शुरुआत होती है। योजनाएं तो बड़े पैमाने पर बनती हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन समय पर नहीं हो पाता। निर्माण कार्य आख़िरी महीनों या हफ्तों तक खिंच जाता है, जिससे गुणवत्ता से समझौता होता है।
कई बार स्टेडियम समय पर तैयार नहीं होते, या फिर दिखावे के लिए अस्थायी सजावट कर दी जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि आयोजन के दौरान ही खामियां सामने आने लगती हैं। अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और अधिकारी जब इन सुविधाओं की तुलना दूसरे देशों से करते हैं, तो भारत की छवि प्रभावित होती है।
इसके साथ ही, रखरखाव की संस्कृति की कमी भी एक बड़ी समस्या है। आयोजन से पहले अचानक रंग-रोगन, सफाई और मरम्मत शुरू होती है, जबकि वर्षों तक बुनियादी ढांचे की नियमित देखभाल नहीं की जाती। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय आयोजन भारत में अक्सर “इमरजेंसी मोड” में होते हैं, न कि योजनाबद्ध और सहज तरीके से।
प्रशासनिक जटिलताएं और समन्वय की कमी
भारत में खेल आयोजन केवल खेल विभाग का मामला नहीं होता। इसमें केंद्र और राज्य सरकार, खेल महासंघ, नगर निगम, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और निजी एजेंसियां—सब शामिल होती हैं। समस्या यह है कि इनके बीच स्पष्ट समन्वय का अभाव रहता है। जिम्मेदारियां बंटी होती हैं, लेकिन जवाबदेही तय नहीं होती।
अक्सर देखा गया है कि एक विभाग दूसरे पर जिम्मेदारी डाल देता है। फाइलें घूमती रहती हैं और निर्णय लेने में देरी होती है। अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन समय की सख्त पाबंदियों में होते हैं, लेकिन भारतीय प्रशासनिक प्रणाली इस गति के अनुरूप नहीं चल पाती।
इसके अलावा, खेल महासंघों की कार्यप्रणाली भी कई बार सवालों के घेरे में रहती है। अनुभव और पेशेवर प्रबंधन की कमी के कारण आयोजन से जुड़े कई अहम फैसले समय पर नहीं हो पाते। नतीजा यह होता है कि छोटी-छोटी बातें भी बड़े विवाद का रूप ले लेती हैं, जो अंततः पूरे आयोजन की छवि को नुकसान पहुंचाती हैं।
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आर्थिक दबाव, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय छवि का तनाव
अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन केवल खेल नहीं होते, वे देश की प्रतिष्ठा से भी जुड़े होते हैं। भारत में यही पहलू अक्सर अतिरिक्त दबाव पैदा कर देता है। सरकारें इन आयोजनों को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करना चाहती हैं, जिससे राजनीति का प्रवेश हो जाता है। बजट बढ़ जाता है, लेकिन खर्च का सही आकलन और पारदर्शिता सवालों में आ जाती है।
आर्थिक दृष्टि से भी भारत के लिए यह चुनौतीपूर्ण होता है। विकसित देशों की तुलना में यहां संसाधन सीमित हैं, लेकिन अपेक्षाएं उतनी ही ऊंची होती हैं। आयोजन पर होने वाला भारी खर्च, और उसके बाद सीमित प्रत्यक्ष लाभ, इस पूरी प्रक्रिया को विवादास्पद बना देता है। जब जनता को लगता है कि करदाताओं का पैसा सही जगह नहीं लग रहा, तो आलोचना तेज हो जाती है।
इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजरें भी भारत पर रहती हैं। छोटी सी चूक भी वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन जाती है। इससे आयोजकों पर अतिरिक्त मानसिक दबाव पड़ता है। कई बार यह दबाव इतनी हड़बड़ी पैदा कर देता है कि व्यवस्थाएं और बिगड़ जाती हैं।
भारत में खेल संस्कृति का एक और पहलू यह है कि आयोजन को अक्सर “इवेंट” की तरह देखा जाता है, न कि खेल विकास की दीर्घकालिक प्रक्रिया के हिस्से के रूप में। जब आयोजन खत्म होता है, तो वही स्टेडियम और सुविधाएं फिर से उपेक्षा का शिकार हो जाती हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या हम आयोजन को केवल प्रतिष्ठा के लिए करते हैं, या सच में खेल व्यवस्था को मजबूत करने के लिए।
आगे की राह: सिरदर्द से सिस्टम तक
अगर भारत को अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों को ‘सिरदर्द’ बनने से रोकना है, तो सोच में बदलाव जरूरी है। बुनियादी ढांचे को केवल आयोजन से पहले नहीं, बल्कि नियमित रूप से विकसित और संरक्षित करना होगा। प्रशासनिक ढांचे में स्पष्ट जिम्मेदारी और पेशेवर प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी।
सबसे अहम बात यह है कि खेल आयोजनों को राजनीति से ऊपर उठाकर खेल विकास के व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए। जब आयोजन को एक अवसर के रूप में लिया जाएगा—सीखने, सुधारने और स्थायी ढांचा खड़ा करने के लिए—तभी भारत इस चुनौती को अवसर में बदल पाएगा।
भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, उत्साह की भी कमी नहीं है। कमी है तो सिर्फ व्यवस्थित तैयारी, दीर्घकालिक सोच और जवाबदेह प्रणाली की। जब ये तीनों तत्व साथ आ जाएंगे, तब अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन भारत के लिए सिरदर्द नहीं, बल्कि गर्व का विषय बनेंगे।
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