यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवशाली क्षण है जब भारत की सांस्कृतिक विरासत की तीन अमूल्य कड़ियाँ वापस अपनी मातृभूमि लौट रही हैं। तमिलनाडु के मंदिरों से दशकों पहले चोरी हुई ये मूर्तियां कला, इतिहास और आध्यात्मिकता का संगम हैं।
तमिलनाडु की अमूल्य मूर्तियों की घर वापसी – एक विस्तृत रिपोर्ट
तमिलनाडु को ‘मंदिरों की भूमि’ कहा जाता है, जहाँ चोल और पांड्य राजवंशों के दौरान मूर्तिकला अपने चरमोत्कर्ष पर थी। हाल ही में अमेरिका के प्रमुख संग्रहालयों से जिन तीन मूर्तियों को भारत वापस लाया जा रहा है, वे न केवल धातु के टुकड़े हैं, बल्कि भारतीय इतिहास के जीवंत प्रमाण हैं।
शिव नटराज की कांस्य मूर्ति (सबसे मुख्य मूर्ति)
इन तीनों मूर्तियों में शिव नटराज की मूर्ति सबसे विशिष्ट और महत्वपूर्ण है।
- ऐतिहासिक काल – यह मूर्ति 11वीं शताब्दी (चोल काल) की है। चोल काल को “कांस्य मूर्तिकला का स्वर्ण युग” माना जाता है।
- निर्माण शैली – इसे ‘लॉस्ट वैक्स कास्टिंग’ (Lost Wax Casting) तकनीक से बनाया गया है। इसमें पहले मोम का पुतला बनाया जाता है, फिर उस पर मिट्टी का लेप लगाकर सांचा तैयार किया जाता है और अंत में पिघला हुआ कांस्य डाला जाता है।
- विशेषता – नटराज की यह मुद्रा ब्रह्मांडीय नृत्य (आनंद तांडव) को दर्शाती है, जो सृजन, संरक्षण और विनाश का प्रतीक है।
- महत्ता और मूल्य – अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस तरह की ऐतिहासिक चोल मूर्तियों की कीमत 30 से 50 करोड़ रुपये से भी अधिक आंकी जाती है, हालांकि इनका सांस्कृतिक मूल्य अनमोल है।
- चोरी और तस्करी – यह मूर्ति तमिलनाडु के कुंभकोणम जिले के एक प्राचीन मंदिर से 1960-70 के दशक के दौरान चोरी हुई थी। इसे अवैध रूप से समुद्र के रास्ते तस्करी कर न्यूयॉर्क ले जाया गया था।
देवी उमा परमेश्वरी की मूर्ति
- काल – यह भी 12वीं शताब्दी की चोल कालीन रचना है।
- प्रकार – यह ‘पंचलौह’ (पाँच धातुओं के मिश्रण) से बनी हो सकती है, जिसमें तांबा, सोना, चांदी, पीतल और जस्ता शामिल होता है।
- विवरण – यह मूर्ति लालित्य और करुणा का प्रतीक है। इसमें देवी को त्रिभंग मुद्रा में खड़े दिखाया गया है, जो चोल कला की पहचान है।
- चोरी का विवरण – इसे भी उसी समय के दौरान तमिलनाडु के ग्रामीण क्षेत्रों के मंदिरों से गायब किया गया था जब मूर्ति चोर गिरोह सक्रिय थे।
भगवान विष्णु (या अलवार संत) की मूर्ति
- काल – 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच की।
- ऊंचाई और वजन – यह लगभग 2.5 से 3 फीट ऊंची है और ठोस कांस्य से निर्मित है।
- कलात्मक बारीकियां – मूर्ति के आभूषण, मुकुट और धोती की नक्काशी इतनी सूक्ष्म है कि वह उस समय के कारीगरों के कौशल को दर्शाती है।
अमेरिका की आर्ट गैलरी और एशियाई कला संग्रह
ये मूर्तियां मुख्य रूप से न्यूयॉर्क स्थित ‘नॉर्टन साइमन म्यूजियम’ या ‘एशिया सोसाइटी’ और विशेष रूप से ‘मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट’ (The Met) के संग्रह का हिस्सा रही हैं।
द मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट (The Met), न्यूयॉर्क
- स्थान – यह न्यूयॉर्क शहर के सेंट्रल पार्क के पूर्वी किनारे पर स्थित है।
- एशियाई संग्रह – यहाँ ‘एशियन आर्ट विंग’ में 35,000 से अधिक वस्तुएं हैं, जो पूरे एशिया के 5,000 साल के इतिहास को दर्शाती हैं।
- वहाँ क्या-क्या है – यहाँ बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं, मुगलकालीन पेंटिंग्स, तिब्बती थंका और चोल साम्राज्य के दर्जनों कांस्य अवशेष रखे गए हैं।
- महत्वपूर्ण जानकारी – इन संग्रहालयों ने स्वीकार किया कि ये मूर्तियां सुभाष कपूर जैसे कुख्यात तस्करों के माध्यम से उनके पास पहुँची थीं, जिन्होंने जाली दस्तावेजों के आधार पर इन्हें “कानूनी” बताया था।
भारत वापसी की कहानी – कूटनीतिक जीत
इन मूर्तियों की वापसी अचानक नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे वर्षों की कानूनी और कूटनीतिक मेहनत है।
- शिनाख्त – तमिलनाडु की ‘आइडल विंग’ (Idol Wing) पुलिस ने पुराने मंदिर अभिलेखों और तस्वीरों का मिलान विदेशी संग्रहालयों की वेबसाइट पर मौजूद तस्वीरों से किया।
- जांच (HSI) – अमेरिका की होमलैंड सिक्योरिटी इन्वेस्टिगेशन (HSI) और मैनहट्टन डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी कार्यालय ने इन मूर्तियों के तस्करी के रूट की जांच की।
- द्विपक्षीय संबंध – भारत और अमेरिका के बीच ‘सांस्कृतिक संपत्ति समझौता’ (Cultural Property Agreement) हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अमेरिका यात्राओं के दौरान कलाकृतियों की वापसी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।
- लॉजिस्टिक्स – इन्हें विशेष एयर-कार्गो के जरिए सुरक्षित बक्सों में लाया जा रहा है, जिनके साथ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
- (ASI) के अधिकारी मौजूद रहते हैं।
शिव नटराज की मूर्ति ही सबसे मुख्य क्यों है?
शिव नटराज की मूर्ति न केवल तमिलनाडु बल्कि भारत की वैश्विक पहचान है।
- वैज्ञानिक महत्व – स्विट्जरलैंड स्थित CERN (यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन) के बाहर भी नटराज की एक विशाल मूर्ति स्थापित है, क्योंकि वैज्ञानिकों का मानना है कि नटराज का नृत्य आधुनिक भौतिकी के ‘सब-एटॉमिक पार्टिकल्स’ के नृत्य के समान है।
- कला का शिखर – चोल नटराज को दुनिया की सबसे संतुलित और ज्यामितीय रूप से सटीक मूर्तिकला माना जाता है।
- धार्मिक भावना – तमिलनाडु के लोगों के लिए ये मूर्तियां ‘विग्रह’ (जीवंत देवता) हैं। उनकी वापसी एक आध्यात्मिक पुनर्स्थापन है।
इन तीन मूर्तियों की वापसी भारत की सॉफ्ट पावर और अपनी विरासत को संरक्षित करने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। यह उन तस्करों के लिए एक कड़ा संदेश है जो भारत की आस्था को व्यापार समझते हैं। अब ये मूर्तियां दिल्ली पहुँचने के बाद पुनः तमिलनाडु के उन्हीं मंदिरों में स्थापित की जाएंगी, जहाँ से इन्हें दशकों पहले जुदा किया गया था।







