नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी सरकारी कोयला कंपनी, कोल इंडिया लिमिटेड ने अपने साल भर के कामकाज का ब्योरा यानी वित्तीय नतीजे पेश कर दिए हैं। कंपनी ने जनवरी से मार्च 2026 की आखिरी तिमाही में मुनाफे में बढ़त तो दिखाई है, लेकिन अगर हम पूरे साल की रिपोर्ट देखें, तो वहां स्थिति कुछ कमजोर नजर आती है।
आखिरी तीन महीनों ने बचाई लाज
साल की चौथी और आखिरी तिमाही यानी जनवरी, फरवरी और मार्च 2026 के दौरान कोल इंडिया का शुद्ध मुनाफा करीब 12 प्रतिशत बढ़ा है। कंपनी ने इन तीन महीनों में लगभग 10,900 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया है। अगर पिछले साल के इसी समय की तुलना करें, तो तब कंपनी को 9,700 करोड़ रुपये का फायदा हुआ था। मुनाफे के इस आंकड़े ने बाजार को एक बार के लिए चौंका दिया है, क्योंकि पिछले कुछ समय से कंपनी पर काम का काफी दबाव देखा जा रहा था। इस दौरान कंपनी की कुल कमाई यानी राजस्व भी बढ़कर 46 हजार करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गया है।
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मुख्य काम के बजाय ‘अन्य कमाई’ का सहारा
अब सवाल यह उठता है कि जब कोयले के उत्पादन में कोई बहुत बड़ी बढ़ोत्तरी नहीं हुई, तो फिर यह मुनाफा बढ़ा कैसे? इसका जवाब कंपनी की ‘अन्य आय’ में छिपा है। साधारण भाषा में समझें तो कोल इंडिया का असली काम जमीन से कोयला निकालना और उसे बिजली घरों या फैक्ट्रियों को बेचना है। लेकिन इस बार मुनाफे में बड़ी भूमिका उस पैसे ने निभाई है जो कंपनी को बैंक में जमा अपनी रकम पर ब्याज के रूप में मिला है या फिर उसने कहीं निवेश कर रखा था, वहां से कमाई हुई है।
साल भर के प्रदर्शन में रही गिरावट
जहां आखिरी तीन महीनों की तस्वीर गुलाबी नजर आ रही है, वहीं पूरे साल (वित्त वर्ष 2025-26) का प्रदर्शन थोड़ा फीका रहा है। अगर हम पूरे 12 महीनों के मुनाफे को जोड़ें, तो यह पिछले साल के मुकाबले करीब 12 प्रतिशत कम होकर 31 हजार करोड़ रुपये रह गया है। यह गिरावट चिंता का विषय है क्योंकि पिछले साल कंपनी ने इससे कहीं ज्यादा मुनाफा कमाया था। इसके साथ ही कंपनी की कुल कमाई यानी राजस्व में भी कोई बड़ी बढ़त नहीं देखी गई। ऐसा लग रहा है कि कंपनी एक जगह पर आकर ठहर गई है और आगे नहीं बढ़ पा रही है।
खर्चों ने बिगाड़ा कंपनी का बजट
आखिर कंपनी का सालाना मुनाफा कम क्यों हुआ? इसके पीछे सबसे बड़ी वजह बढ़ते हुए खर्चे हैं। पिछले एक साल में कंपनी को अपने कर्मचारियों के वेतन, पुरानी मशीनों के रखरखाव और खदानों के संचालन पर पहले से कहीं ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ा है। जब कमाई वैसी ही रहे और खर्चे बढ़ जाएं, तो सीधा असर मुनाफे पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि कोल इंडिया को अपनी फिजूलखर्ची रोकने और काम करने के पुराने तरीकों को बदलने की जरूरत है, वरना आने वाले समय में मार्जिन और भी कम हो सकता है।
निवेशकों को मिला डिविडेंड का तोहफा
भले ही साल भर का प्रदर्शन थोड़ा कमजोर रहा हो, लेकिन कोल इंडिया ने अपने निवेशकों को नाराज नहीं होने दिया। कंपनी ने 5.25 रुपये प्रति शेयर के अंतिम लाभांश (डिविडेंड) का ऐलान किया है। अगर हम पूरे साल की बात करें, तो कंपनी ने अपने शेयरधारकों को कुल मिलाकर लगभग 26.50 रुपये प्रति शेयर का डिविडेंड दिया है।कोल इंडिया की गिनती उन कंपनियों में होती है जो अपने मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा अपने निवेशकों में बांट देती हैं। खासकर उन लोगों के लिए जो जोखिम नहीं लेना चाहते और हर साल एक पक्की कमाई की उम्मीद रखते हैं, उनके लिए कोल इंडिया अभी भी एक भरोसेमंद नाम बना हुआ है। डिविडेंड की इस खबर ने शेयर बाजार में कंपनी के प्रति माहौल को सकारात्मक बनाए रखा है।
उत्पादन और मांग के बीच का अंतर
देश में बिजली की खपत जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उसे देखते हुए कोयले की मांग कभी कम नहीं होने वाली। भारत की ज्यादातर बिजली आज भी कोयले से ही बनती है। लेकिन समस्या यह है कि कोल इंडिया उस मांग के हिसाब से कोयले का उत्पादन नहीं बढ़ा पा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, चौथी तिमाही में कोयले के उत्पादन और उसकी बिक्री में हल्की गिरावट दर्ज की गई है। अगर सरकारी कंपनी मांग पूरी नहीं कर पाती, तो देश को विदेशों से महंगा कोयला खरीदना पड़ता है, जिसका असर आम आदमी की बिजली के बिल पर भी पड़ सकता है।
भविष्य की राह और चुनौतियां
कोल इंडिया के सामने आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण होने वाला है। एक तरफ उसे अपनी पुरानी खदानों से कोयला निकालने की लागत कम करनी है, तो दूसरी तरफ दुनिया भर में चल रहे प्रदूषण विरोधी अभियान और ‘ग्रीन एनर्जी’ (सौर और पवन ऊर्जा) के बढ़ते चलन से भी निपटना है। अब समय आ गया है कि कोल इंडिया केवल कोयले तक सीमित न रहे और खुद को ऊर्जा के नए क्षेत्रों में भी ढाले। कंपनी ने इस दिशा में कुछ छोटे कदम उठाए हैं, लेकिन उन्हें बड़े स्तर पर ले जाने की जरूरत है।







