कर्नाटक की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के आवास पर हुई मंत्रियों की ‘ब्रेकफास्ट मीटिंग’ महज एक बैठक नहीं, बल्कि राज्य के सियासी इतिहास का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। बैठक के दौरान जब उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भावुक होकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के पैर छुए और सिद्धारमैया ने उन्हें गले लगाया, तो यह साफ हो गया कि कर्नाटक कांग्रेस के भीतर सत्ता के हस्तांतरण (Power Transition) की स्क्रिप्ट पूरी तरह लिखी जा चुकी है। सिद्धारमैया ने अपने मंत्रियों के सामने पद छोड़ने का ऐलान कर दिया है।
इस ऐतिहासिक और भावनात्मक घटनाक्रम के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ‘आगे क्या होगा?’
डीके शिवकुमार की ताजपोशी का रास्ता साफ
सिद्धारमैया के इस्तीफे के ऐलान के बाद अब डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना तय माना जा रहा है। साल 2023 के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद से ही शिवकुमार के खेमे का दावा था कि आलाकमान के साथ ‘ढाई-ढाई साल’ (Rotational CM Formula) का समझौता हुआ था।
- विधायक दल की बैठक – जल्द ही कांग्रेस विधायक दल (CLP) की औपचारिक बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें डीके शिवकुमार को आधिकारिक तौर पर नया नेता चुना जाएगा।
- शपथ ग्रहण समारोह – राज्यपाल को सिद्धारमैया का इस्तीफा सौंपे जाने के बाद, डीके शिवकुमार नए मुख्यमंत्री के रूप में सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे और मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।
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सिद्धारमैया की नई भूमिका – ‘दिल्ली की राजनीति’ में एंट्री
77 वर्षीय कद्दावर नेता सिद्धारमैया को कांग्रेस आलाकमान किसी भी कीमत पर नाराज नहीं करना चाहता। इसलिए उनके इस्तीफे को ‘ज़बरदस्ती हटाने’ के बजाय एक ‘राजनीतिक पदोन्नति’ (Political Elevation) के रूप में पेश किया जा रहा है।
- राज्यसभा का टिकट – जून में होने वाले राज्यसभा चुनाव के जरिए सिद्धारमैया को संसद के उच्च सदन में भेजा जा रहा है।
- राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा रोल – कांग्रेस नेता राहुल गांधी के देशव्यापी जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय के एजेंडे को धार देने के लिए सिद्धारमैया को राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का मुख्य ओबीसी (OBC) चेहरा बनाया जाएगा।
चर्चा यह भी है कि उन्हें मल्लिकार्जुन खड़गे की जगह राज्यसभा में विपक्ष का नेता (LoP) या संगठन में कोई बड़ा राष्ट्रीय पद दिया जा सकता है।
नए मंत्रिमंडल का गठन और गुटीय संतुलन की चुनौती
डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनते ही कर्नाटक में नए मंत्रिमंडल का पुनर्गठन होगा। शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिद्धारमैया के वफादार मंत्रियों और विधायकों को संतुष्ट रखने की होगी।
- मंत्रियों में फेरबदल – शिवकुमार के करीबी विधायकों को कैबिनेट में अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी मिल सकती है।
- समझौता फॉर्मूला – सिद्धारमैया के बेटे यतीन्द्र सिद्धारमैया को कैबिनेट में शामिल करने या संगठन में बड़ा पद देने की चर्चाएं भी तेज हैं, ताकि सिद्धारमैया खेमे को शांत रखा जा सके।
- सियासी हलचल – डीके शिवकुमार के समर्थकों ने बेंगलुरु में उनके आवास के बाहर मिठाइयां बांटनी और आतिशबाजी शुरू कर दी है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि शिवकुमार ने पार्टी के लिए अपना जीवन समर्पित किया है और यह उनकी मेहनत का फल है।
विपक्ष (BJP और JDS) की रणनीति
कर्नाटक में इस बड़े बदलाव पर विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल सेक्युलर (JDS) पैनी नजर बनाए हुए हैं।
- भीतरी कलह को भुनाने की कोशिश: विपक्ष इस बदलाव को कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरी और सत्ता की मलाई के लिए की गई खींचतान के रूप में प्रचारित करेगा।
- सरकार पर दबाव – यदि नए मंत्रिमंडल के गठन में सिद्धारमैया गुट के विधायकों की अनदेखी होती है, तो बीजेपी असंतुष्ट विधायकों से संपर्क साधकर सरकार को घेरने की रणनीति अपना सकती है।
क्या आसान होगी डीके शिवकुमार की राह?
भले ही डीके शिवकुमार को ‘संकटमोचक’ कहा जाता है और संगठन पर उनकी मजबूत पकड़ है, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही उनके सामने चुनौतियां भी कम नहीं होंगी-
- गारंटी योजनाओं का क्रियान्वयन- चुनाव के दौरान कांग्रेस ने जो बड़ी वित्तीय गारंटियां दी थीं, उन्हें सुचारू रूप से जारी रखना और राज्य के खजाने को संतुलित करना बड़ी चुनौती होगी।
- गुटीय असंतोष – सिद्धारमैया के समर्थकों को हर फैसले में साथ लेकर चलना शिवकुमार के लिए ‘कांटों भरा ताज’ साबित हो सकता है।
कर्नाटक की राजनीति में पैर छूने और गले मिलने की इन तस्वीरों ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि कांग्रेस एकजुट है और सत्ता का यह परिवर्तन आपसी सहमति से हो रहा है। सिद्धारमैया का राष्ट्रीय राजनीति में जाना और डीके शिवकुमार का राज्य की कमान संभालना, कांग्रेस के लिए एक दूरगामी रणनीति का हिस्सा है। बहरहाल, आने वाले कुछ दिन कर्नाटक की नई सरकार के स्वरूप, मंत्रियों के विभागों के बंटवारे और भावी प्रशासनिक नीतियों की दिशा तय करने वाले होंगे। पूरा देश अब बेंगलुरु से आने वाली हर राजनीतिक अपडेट पर नजरें गड़ाए बैठा है।







