सनातन धर्म में संक्रांति तिथि का विशेष महत्व है। जब भगवान सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं तो उस खगोलीय और ज्योतिषीय घटना को ‘संक्रांति’ कहा जाता है। सालभर में कुल 12 संक्रांतियां होती हैं जिनमें से आषाढ़ मास में आने वाली मिथुन संक्रांति (Mithuna Sankranti) का अपना एक अलग और अनूठा धार्मिक महत्व है। इस दिन सूर्य देव वृषभ राशि से निकलकर अपने मित्र ग्रह बुध की राशि ‘मिथुन’ में प्रवेश करते हैं।
यह दिन मुख्य रूप से प्रकृति, पृथ्वी और कृषि को समर्पित माना जाता है। आइए मिथुन संक्रांति की तिथि, शुभ मुहूर्त, धार्मिक-ज्योतिषीय महत्व और इस दिन क्या करना चाहिए तथा क्या नहीं इसकी संपूर्ण जानकारी विस्तार से जानते हैं।
मिथुन संक्रांति 2026- तिथि एवं शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में मिथुन संक्रांति 15 जून दिन सोमवार को मनाई जाएगी। शास्त्रों के अनुसार संक्रांति के समय पुण्य काल और महापुण्य काल में किए गए दान-पुण्य का फल अक्षय होता है।
- संक्रांति का क्षण- दोपहर 12-49 बजे (15 जून 2026)
- पुण्य काल मुहूर्त- दोपहर 12-49 बजे से शाम 07-09 बजे तक
- महापुण्य काल मुहूर्त- दोपहर 12-49 बजे से दोपहर 03-05 बजे तक
यह दिन क्यों खास है? (धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व)
मिथुन संक्रांति का दिन मानवीय जीवन और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है। उड़ीसा (ओडिशा) में इस त्योहार को ‘राजा पर्व’ (Raja Parba) या ‘रज पर्व’ के रूप में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्योहार चार दिनों तक चलता है।
- धरती माता की पूजा- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मिथुन संक्रांति के दौरान धरती माता यानी भूदेवी (भगवान विष्णु की पत्नी) मासिक धर्म के चक्र से गुजरती हैं। यह समय पृथ्वी की उर्वरता और नए सृजन का प्रतीक है।
- नारीत्व का सम्मान- इस पर्व के माध्यम से समाज में महिलाओं और उनके प्राकृतिक चक्र का सम्मान किया जाता है। लड़कियां और महिलाएं इन दिनों नए वस्त्र पहनती हैं झूला झूलती हैं और पारंपरिक पकवान बनाती हैं।
- कृषि वर्ष की शुरुआत- भारत के कई हिस्सों में इस दिन से आधिकारिक रूप से मानसूनी खेती और नए कृषि वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। लोग अच्छी फसल के लिए इंद्र देव और वासुमति (धरती) माता की प्रार्थना करते हैं।
ज्योतिषीय महत्व
वैदिक ज्योतिष में सूर्य को आत्मा, पिता, मान-सम्मान और मानिसक तेज का कारक माना गया है। वहीं मिथुन राशि के स्वामी ‘बुध’ हैं जो बुद्धि, व्यापार और संवाद के कारक हैं। जब सूर्य का गोचर मिथुन राशि में होता है तो यह योग जातकों की बौद्धिक क्षमता, तार्किक शक्ति और संवाद शैली को प्रभावित करता है। इस गोचर से व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आती है और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों को नए अवसर प्राप्त होते हैं।
मिथुन संक्रांति पर क्या करें? (करणीय कार्य)
इस पवित्र दिन पर कुछ विशेष नियमों और अनुष्ठानों का पालन करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है
- पवित्र स्नान- इस दिन किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि ऐसा संभव न हो तो घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
- सूर्य देव को अर्घ्य- सुबह स्नान के बाद तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन, अक्षत और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें और ‘ॐ सूर्याय नमः’ मंत्र का जाप करें।
- महादान का संकल्प- मिथुन संक्रांति पर दान का विशेष महत्व है। इस दिन विशेष रूप से वस्त्र (कपड़े), छाता, जूता, पंखा, पानी से भरा घड़ा (कलश) और मौसमी फल दान करने चाहिए क्योंकि इस समय ग्रीष्म ऋतु का प्रभाव अधिक होता है।
- सिल-बट्टे की पूजा- राजा पर्व के चौथे दिन (वासुमति स्नान) पर घर के सिल-बट्टे को धरती माता का स्वरूप मानकर हल्दी और सिंदूर से पूजा जाता है और उन्हें फल अर्पित किए जाते हैं।
तिरुपति दर्शन के लिए ऑनलाइन टिकट व्यवस्था शुरू श्रद्धालुओं को मिलेगी बड़ी राहत
मिथुन संक्रांति पर क्या न करें? (वर्जित कार्य)
चूंकि यह समय धरती माता के विश्राम का होता है इसलिए शास्त्रों में कुछ कार्यों की सख्त मनाही है
- भूमि की खुदाई न करें- इस दिन खेती का कोई काम नहीं किया जाता। हल चलाना, भूमि खोदना या वृक्ष काटना इस दिन पूरी तरह वर्जित माना गया है ताकि धरती माता को विश्राम मिल सके।
- तामसिक भोजन से बचें- संक्रांति के पावन दिन पर लहसुन, प्याज, मांस या मदिरा जैसे तामसिक पदार्थों का सेवन भूलकर भी न करें। इस दिन पूर्णतः सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।
- मांगलिक कार्य- संक्रांति के संक्रमण काल के दौरान शादी-विवाह, मुंडन या गृह प्रवेश जैसे शुभ व मांगलिक कार्यों की शुरुआत नहीं की जाती है।
- कटु वचन न बोलें- इस दिन किसी के प्रति मन में द्वेष न लाएं, न ही किसी का अपमान करें। अपने व्यवहार को संयमित रखें।
मिथुन संक्रांति मात्र एक खगोलीय घटना नहीं बल्कि प्रकृति, नारीत्व और कृषि संस्कृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक अनुपम पर्व है। यह दिन हमें सिखाता है कि प्रकृति के नियमों का सम्मान करना और धरती माता को संजोना ही मानव कल्याण का एकमात्र मार्ग है। इस दिन श्रद्धापूर्वक किया गया दान और सूर्य उपासना जीवन के कष्टों को दूर कर सुख, शांति और आरोग्य प्रदान करती है।







