नदियों में सिक्के डालकर मनोकामना मांगने की परंपरा भारत सहित कई संस्कृतियों में लंबे समय से प्रचलित है। हालांकि, इस विषय पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में प्रेमानंद महाराज ने स्पष्ट किया कि पवित्र नदियों में सिक्के डालने की कोई शास्त्रीय अनिवार्यता नहीं है। उन्होंने श्रद्धा के साथ-साथ विवेकपूर्ण दान पर भी जोर दिया।
सदियों पुरानी परंपरा पर उठता सवाल
गंगा, यमुना, कुओं और झरनों में सिक्के डालकर इच्छा मांगने की परंपरा को अक्सर श्रद्धा और आस्था से जोड़कर देखा जाता है। कई लोग इसे अपनी मनोकामना पूरी होने की उम्मीद के रूप में अपनाते हैं।
हालांकि धार्मिक ग्रंथों में ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था या अनिवार्य नियम नहीं बताया गया है, जिसके तहत नदियों में सिक्के डालना जरूरी माना गया हो। इसे अधिकतर व्यक्तिगत विश्वास और परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
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प्रेमानंद महाराज से पूछा गया सवाल
मथुरा-वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज से एक भक्त ने प्रश्न किया कि क्या पवित्र नदियों में सिक्के डालना उचित है।
इस सवाल का जवाब देते हुए महाराज ने कहा:
“गंगा जी हो या यमुना जी हो, उनके लिए 1 रुपये का आटा ले लो और फिर उस आटे से छोटी छोटी गोलियां बनाकर नदियों में डाल दो. उससे नदियों में रह रहे जीव जैसे मछली या कछुआ, वह ये सब खा लेंगे. रुपये गंगाजी में डालने से कुछ नहीं होगा, ऐसी कोई शास्त्र आज्ञा नहीं है. ये सब मनमानी आचरण है.”
नदियों में सिक्के डालने पर क्या बोले महाराज?
प्रेमानंद महाराज के अनुसार सिक्के जल में डालने से किसी प्रकार का विशेष लाभ नहीं होता। उन्होंने कहा कि लोगों ने समय के साथ अपनी सुविधानुसार कई आचरण अपना लिए हैं, जिनका शास्त्रों से कोई सीधा संबंध नहीं है।
उन्होंने कहा:
“लोगों में आजकल अपनी मनमर्जी करना शुरू कर दिया है. सिक्के डालने से कुछ नहीं होता है. उससे हमारी नदियां सिर्फ प्रदूषित हो रही हैं. हमने केसी घाट पर देखा है कि वहां छोटे छोटे लड़के नदियों में चुंबक डालकर सारे सिक्के निकाल लेते हैं. उससे किसी का भला नहीं हो रहा है. जहां ज्यादा यात्रियों का आवागमन होता है, वहां ये लड़के पहुंच जाते हैं.”
पर्यावरण और उपयोगिता पर जोर
महाराज ने अपने वक्तव्य में यह भी संकेत दिया कि नदियों में डाले गए सिक्के अंततः किसी सार्थक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कई स्थानों पर लोग चुंबक की मदद से नदी में पड़े सिक्कों को निकाल लेते हैं।
दान का बेहतर तरीका क्या है?
प्रेमानंद महाराज ने श्रद्धालुओं को सलाह दी कि यदि वे धन खर्च करना चाहते हैं तो उसे ऐसे कार्यों में लगाएं जिससे किसी जीव या जरूरतमंद व्यक्ति को वास्तविक लाभ मिल सके।
उन्होंने कहा:
“अगर दान में तुम 100 रुपये देना ही चाहते हो तो 100 रुपये देने के बजाय उसका चारा खरीदकर गाय को दे दो या 100 रुपये किसी बीमार आदमी के काम में दे दो या 100 रुपये का भोजन किसी को खिला दो. ऐसा रुपये फेंकने से कुछ हासिल नहीं होगा. इसलिए, आस्था के साथ-साथ विवेक का इस्तेमाल करना भी जरूरी है, ताकि हमारी श्रद्धा का सही और सार्थक उपयोग हो सके.”
Conclusion
नदियों में सिक्के डालने की परंपरा को लेकर प्रेमानंद महाराज ने स्पष्ट रूप से कहा कि इसके समर्थन में कोई शास्त्रीय आदेश नहीं है। उनके अनुसार श्रद्धा का सर्वोत्तम उपयोग वही है, जिससे किसी जीव, जरूरतमंद व्यक्ति या समाज को वास्तविक लाभ पहुंचे। उन्होंने आस्था के साथ विवेकपूर्ण निर्णय लेने का संदेश दिया।







