भारत और रूस के बीच ऊर्जा व्यापार 2025 के अंत तक चर्चा के सभी केंद्रों में है। विशेष रूप से दिसंबर 2025 में क्योंकि भारत ने रूस से कच्चे तेल का सबसे बड़ा मासिक आयात दर्ज किया है। पश्चिमी प्रतिबंधों, अमेरिकी दबाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार के उतार-चढ़ाव के बावजूद, इस घटना ने वैश्विक ऊर्जा भू-राजनीति, भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति, तथा अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नीतियों पर विशेष प्रभाव डाला है। इसी के साथ भारत समुद्र के रास्ते रूसी तेल का सबसे बड़ा इंपोर्टर भी बन गया है। यह तब हुआ है, जब भारत पर रूसी तेल खरीद बंद करने के लिए अमेरिका का भारी दबाव पड़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो भारत पर 25% का अतिरिक्त टैरिफ भी लगाया है, जिस कारण भारत को अमेरिका निर्यात पर कुल 50% का टैक्स भरना पड़ रहा है, जो पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है।

नए शिप ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, रूस से भारत का तेल इंपोर्ट दिसंबर में छह महीने के हाई पर पहुंचने वाला है, क्योंकि नई दिल्ली यूरेशियाई देश के कच्चे तेल उत्पादकों, रोसनेफ्ट और लुकोइल पर अमेरिकी प्रतिबंधों को नजरअंदाज़ कर रहा है। रियल-टाइम ग्लोबल कमोडिटी इंटेलिजेंस और एनालिटिक्स फर्म केपलर द्वारा जुटाए गए डेटा के अनुसार, दिसंबर में भारत में रूसी कच्चे तेल की आवक 1.85 मिलियन बैरल प्रति दिन (mbd) तक पहुंचने की उम्मीद है, जो पिछले महीने की तुलना में 0.2 mbd की बढ़ोतरी है, जब शिपमेंट 1.83 mbd दर्ज किया गया था।
लगातार तीसरे महीने बढ़ा आयात
दिसंबर में रूसी तेल इंपोर्ट में थोड़ी बढ़ोतरी के साथ, यह लगातार तीसरा महीना होगा जब इस काले सोने की रूस से भारत को सप्लाई में बढ़ोतरी देखी जाएगी। रिकॉर्ड केीि लिए, भारत ने अक्टूबर में रूस से 1.48 mbd कच्चे तेल का इंपोर्ट किया था, जिसमें नवंबर में काफी बढ़ोतरी हुई और यह 1.83 mbd हो गया। दिलचस्प बात यह है कि रूस से भारत का दिसंबर का इंपोर्ट अभी तक 1.85 mbd है, जो इसे जून 2025 के बाद सबसे ज़्यादा बनाता है, जब दक्षिण एशियाई देश ने मॉस्को से 2.10 मिलियन बैरल प्रति दिन खरीदा था।
भारत की ऊर्जा नीति इधर अमेरिकी दबाव
अमेरिका ने रूस के प्रमुख तेल उत्पादकों रोसनेफ्ट (Rosneft) और लुकॉइल (Lukoil) पर प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे उनका वैश्विक तेल बाजार में संचालन प्रभावित हुआ है। साथ ही अमेरिका ने भारत पर यह दबाव भी बनाया है कि वह रूसी तेल खरीद कम करे, और अमेरिकी कच्चे तेल को अपनाए। लेकिन भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के हितों को प्राथमिकता देगा, और किसी भी बाहरी दबाव के तहत अपनी तेल नीति को बदलने को तैयार नहीं दिख रहा है। इस दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप अमेरिका और भारत के बीच व्यापार वार्ताओं में कुछ तनाव पैदा हुआ है, क्योंकि अमेरिका व्यापार मसलों जैसे टैरिफों और कृषि उत्पादों के आयात पर कुछ समझौतों की अपेक्षा रखता है।
सस्ते तेल का क्या होगा लाभ
रूस से सस्ता तेल खरीदकर भारत ने पिछले वर्षों में तेल आयात खर्च में काफी बचत की है। उदाहरण के लिए, जनवरी-मार्च 2025 तक भारत ने रूस से लगभग 112 अरब यूरो के कच्चे तेल खरीदे। यह खर्च भारत के तेल आयात बिल के लिए एक बड़ा हिस्सा है और देश की मौद्रिक स्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। रूस से तेल खरीद समारोह ने भारत को महंगे मध्य पूर्व तेल पर निर्भरता कम करने में मदद की है और विदेशी मुद्रा के उपयोग में बचत की है।
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भारत-रूस संबंधों में नया आयाम, राजनीतिक व आर्थिक सहयोग भी बढ़ा
रूस और भारत के बीच राजनीतिक और आर्थिक सहयोग भी बढ़ रहा है। दिसंबर की शुरुआत में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए “बिना रुकावट” तेल आपूर्ति करने का आश्वासन दिया।
इस बयान से यह संकेत मिला कि भारत-रूस ऊर्जा साझेदारी केवल तेल के व्यापार से अधिक है। यह रणनीतिक मित्रता और लंबी-अवधि सहयोग का प्रतीक भी है। दोनों देशों ने ऊर्जा, रक्षा और तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में कई समझौतों और रोडमैप पर चर्चा की है।
वैश्विक तेल बाजार पर क्या होगा असर
भारत जैसे बड़े खरीदार का रूसी तेल खरीदना अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अगले कुछ महीनों में कई प्रभाव लाएगा। जैसे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जिससे रूस से छूट मिलने और भारत की बड़ी डिमांड के चलते बाजार अस्थिर हो सकते हैं। वहीं संयुक्त व्यापार जोखिम से प्रतिबंधित कंपनियों पर दवाब और वित्तीय जोखिम से वैश्विक तेल कंपनियों का रवैया बदल सकता है।
इसके ऊर्जा सुरक्षा रणनीति से कई देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा रणनीतियों पर पुनर्विचार कर सकते हैं।खासकर ऐसे समय में जब रूस जैसे बड़े उत्पादक को नए बाजार मिल रहे हैं।






