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प्रयागराज में माघ मेला 2026 का पांचवां स्नान आज माघी पूर्णिमा पर

प्रयागराज में माघ मेला 2026 का पांचवां स्नान आज माघी पूर्णिमा पर
नवजोत कौर सिद्धू
On: फ़रवरी 1, 2026 4:30 अपराह्न
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प्रयागराज की पावन धरा पर गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम के तट पर आयोजित माघ मेला 2026 का आज एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है। माघी पूर्णिमा का यह अवसर न केवल एक स्नान पर्व है, बल्कि यह श्रद्धा, तप और भारतीय संस्कृति के उस अनूठे समागम का प्रतीक है जो सदियों से विश्व को शांति और आध्यात्मिकता का संदेश देता आ रहा है।

माघी पूर्णिमा 2026 –  एक आध्यात्मिक उत्सव का चरमोत्कर्ष

आज, 1 फरवरी 2026 को प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर माघी पूर्णिमा का पांचवां मुख्य स्नान पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ मास की पूर्णिमा का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। माना जाता है कि आज के दिन स्वयं देवता गण स्वर्ग से उतरकर संगम के पावन जल में स्नान करते हैं।

माघ मेले की शुरुआत 3 जनवरी 2026 को पौष पूर्णिमा से हुई थी, और आज माघी पूर्णिमा के साथ ही एक महीने से चले आ रहे कठिन कल्पवास का औपचारिक समापन भी हो रहा है। संगम की रेती पर जो आध्यात्मिक ऊर्जा पिछले एक माह से संचित हो रही थी, वह आज अपने चरमोत्कर्ष पर है।

माघ पूर्णिमा का पौराणिक और ऐतिहासिक इतिहास

प्रयागराज में माघ मेले का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि भारतीय सभ्यता। वेदों, पुराणों और महाभारत में भी ‘तीर्थराज’ प्रयाग और माघ स्नान की महिमा का गुणगान मिलता है।

  • ब्रह्मा जी की यज्ञ स्थली –  पौराणिक मान्यता है कि सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि के निर्माण के पश्चात पहला ‘अश्वमेध यज्ञ’ इसी स्थान पर किया था। इसीलिए इसे ‘प्रयाग’ (प्र + याग) कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘उत्कृष्ट यज्ञ का स्थान’।
  • अमृत की बूंदें –  समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश को लेकर जब देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष चल रहा था, तब भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ अमृत कलश लेकर उड़े थे। उस दौरान अमृत की कुछ बूंदें चार स्थानों पर गिरी थीं: हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयागराज। प्रयागराज में यह अमृत संगम के जल में समाहित हुआ, इसी कारण यहाँ के जल को अमरता और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है।
  • ऐतिहासिक संदर्भ –  सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान प्रयाग का भ्रमण किया था। उन्होंने अपने वृत्तांत में यहाँ लगने वाले विशाल मेले और दान उत्सव का वर्णन किया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि यह परंपरा हजारों वर्षों से निर्बाध रूप से चली आ रही है।
  • श्रद्धालुओं का सैलाब –  कितने भक्तों ने लगाई डुबकी?
  • माघ मेला 2026 के इस पांचवें स्नान पर्व पर संगम तट आस्था के समुद्र में डूबा नजर आया। कड़ाके की ठंड के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी।
  •  श्रद्धालुओं की संख्या –  प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, माघी पूर्णिमा के अवसर पर सुबह से लेकर शाम तक लगभग 60 से 70 लाख श्रद्धालुओं ने पवित्र संगम में आस्था की डुबकी लगाई। (यह संख्या बदलती रहती है, लेकिन अनुमान इसी दायरे में है)।
  • भक्तों का आगमन –  न केवल उत्तर प्रदेश और भारत के कोने-कोने से, बल्कि विदेशी पर्यटक और आध्यात्मिक जिज्ञासु भी आज के दिन संगम पर उपस्थित रहे।
  • विविधता – घाटों पर संन्यासी, नागा साधु, कल्पवासी और गृहस्थ श्रद्धालु एक साथ एक ही जल में अपनी श्रद्धा समर्पित करते दिखे, जो भारतीय एकता का जीवंत उदाहरण है।

माघ मेला में माघी पूर्णिमा का विशेष महत्व

यूं तो माघ मेले का हर दिन पवित्र है, लेकिन माघी पूर्णिमा को “सिद्धियों की तिथि” माना जाता है। 

  • देवताओं का वास –  मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ उदित होता है और समस्त तीर्थ, नदियाँ और देवता संगम में वास करते हैं। आज के दिन किया गया स्नान करोड़ों अश्वमेध यज्ञों के समान फलदायी माना गया है।
  • दान का महत्व –  माघी पूर्णिमा पर अन्न, वस्त्र, तिल और स्वर्ण दान का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि आज के दिन किया गया दान ‘अक्षय’ (कभी न समाप्त होने वाला) होता है।
  •  ज्योतिषीय महत्व –  इस समय सूर्य मकर राशि में और चंद्रमा अपनी पूर्ण स्थिति में होते हैं, जो मानव मस्तिष्क और शरीर पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।

कल्पवासियों के लिए माघी पूर्णिमा का महत्व

माघ मेले की सबसे कठिन और श्रद्धापूर्ण साधना कल्पवास है। ‘कल्प’ का अर्थ है समय का एक चक्र और ‘वास’ का अर्थ है निवास।

  • तपस्या का समापन –  कल्पवासी पौष पूर्णिमा से संगम की रेती पर झोपड़ियों (तंबुओं) में रहकर एक महीने का व्रत रखते हैं। आज माघी पूर्णिमा के स्नान के साथ उनकी यह 30 दिनों की कठिन साधना पूर्ण होती है।
  •   जीवनशैली –  कल्पवासी दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं, जमीन पर सोते हैं और त्रिकाल (तीन बार) स्नान करते हैं। आज वे अपने शिविरों से निकलकर अंतिम मुख्य स्नान करते हैं और अपने आराध्य का पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
  •  विदाई का क्षण –  माघी पूर्णिमा के स्नान के बाद कल्पवासी अपने घरों की ओर प्रस्थान करते हैं। यह क्षण उनके लिए भावनात्मक होता है, क्योंकि वे एक माह तक जिस आध्यात्मिक वातावरण में रहे, उसे पीछे छोड़कर सांसारिक जीवन में लौटते हैं।

 प्रशासन द्वारा की गई व्यापक व्यवस्थाएं

उत्तर प्रदेश सरकार और माघ मेला प्राधिकरण ने इस विशाल जनसमूह को नियंत्रित करने और सुविधा प्रदान करने के लिए व्यापक प्रबंध किए हैं

  • सुरक्षा व्यवस्था – पूरे मेला क्षेत्र को कई सेक्टरों में विभाजित किया गया है। एटीएस (ATS), आरएएफ (RAF) और स्थानीय पुलिस के हजारों जवान तैनात हैं। ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों से भीड़ की निगरानी की जा रही है।
  • स्नान घाट – श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए संगम और गंगा तट पर लगभग 12 विशाल घाट बनाए गए हैं। घाटों पर कपड़े बदलने के लिए अस्थाई कमरों (Changing Rooms) और सुरक्षित स्नान के लिए जालियों (Barricading) की व्यवस्था की गई है।
  • यातायात प्रबंधन – शहर में भारी वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है। श्रद्धालुओं को मेला क्षेत्र तक पहुँचाने के लिए सैकड़ों ‘शटल बसें’ और ई-रिक्शा चलाए जा रहे हैं। पार्किंग के लिए बड़े मैदान आरक्षित किए गए हैं।
  •  स्वास्थ्य और स्वच्छता –  मेला क्षेत्र में अस्थाई अस्पताल, एम्बुलेंस और सैकड़ों स्वास्थ्य कर्मी तैनात हैं। ‘स्वच्छ कुंभ, सुरक्षित कुंभ’ की तर्ज पर हजारों सफाई कर्मियों को नियुक्त किया गया है ताकि नदी और रेती की स्वच्छता बनी रहे।
  •  आश्रय स्थल – गरीब और दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सरकार ने नाममात्र शुल्क (₹20-₹50) पर रैन बसेरों और मुफ्त भोजन की व्यवस्था की है।

 माघ मेले से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण जानकारी

माघ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक महाकुंभ है।

  • अखाड़े और शिविर – यहाँ विभिन्न अखाड़ों के संतों के प्रवचन और भजन-कीर्तन चलते रहते हैं।
  • धार्मिक प्रदर्शनी –  मेला क्षेत्र में विभिन्न सरकारी और धार्मिक संस्थाओं द्वारा प्रदर्शनी लगाई गई है, जो भारतीय संस्कृति और विकास की झलक दिखाती हैं।
  •  पर्यटन –  यह मेला फोटोग्राफी के शौकीनों और विदेशी शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र है। संगम का विहंगम दृश्य, विशेष रूप से सुबह की आरती, मनमोहक होती है।

प्रयागराज का माघ मेला और आज की माघी पूर्णिमा मनुष्य को आत्म-अनुशासन, त्याग और समर्पण की सीख देती है। संगम का यह पावन जल हमें यह याद दिलाता है कि जिस प्रकार विभिन्न नदियाँ एक होकर सागर में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हम सभी का मूल एक ही है। माघ मेला 2026 का यह भव्य आयोजन भारतीय सनातन धर्म की अजेय शक्ति और प्रशासन की कार्यकुशलता का उत्कृष्ट प्रमाण है।

Swati Pandey

A versatile writer mainly works on trending news, daily updates from politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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