डेलीबार्ता, प्रयागराज।प्रयागराज में आयोजित माघ मेला 2026 अब आध्यात्मिक आस्था के साथ-साथ प्रशासनिक सख्ती और विवादों का केंद्र बनता जा रहा है। इस बार मेला चर्चा में है ज्योतिषपीठ बद्रिकाश्रम से जुड़े स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को भेजे गए नोटिस। मेला प्राधिकरण द्वारा उन्हें एक नहीं, बल्कि दो नोटिस भेजे जाने की बात सामने आई है, जिसने पूरे मामले को और भी गंभीर बना दिया है। इन नोटिसों में न सिर्फ मेला नियमों के उल्लंघन का आरोप है, बल्कि यह चेतावनी भी दी गई है कि संत को दी गई जमीन और सुविधाएं निरस्त की जा सकती हैं। और उनके माघ मेला क्षेत्र में प्रवेश पर भी प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
माघ मेला और संतों की भूमिका
माघ मेला प्रयागराज की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का अहम हिस्सा है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु, संत-महात्मा और अखाड़े यहां कल्पवास और स्नान के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में संतों की गतिविधियों पर प्रशासन की नजर हमेशा बनी रहती है, ताकि श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्था प्रभावित न हो। इसी पृष्ठभूमि में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ जारी नोटिसों ने मेला प्रशासन और संत समाज के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर दी है।
दो नोटिस, लेकिन विवाद एक
मेला प्राधिकरण द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को भेजे गए नोटिसों में से दूसरा नोटिस ज्यादा चर्चा में आया, जिसमें उनसे शंकराचार्य होने से संबंधित प्रमाण मांगे गए थे। हालांकि, अब यह सामने आया है कि इससे पहले भी 18 जनवरी 2026 को, मौनी अमावस्या के दिन, उन्हें एक और नोटिस जारी किया गया था। इस पहले नोटिस की जानकारी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नहीं थी या उन्होंने इसके बारे में अनभिज्ञता जताई है।
प्रयागराज माघ मेले का तीसरा और महत्वपूर्ण शाही स्नान मौनी अमावस्या
पहला नोटिस,मौनी अमावस्या की घटना का जिक्र
पहले नोटिस में मेला प्रशासन ने आरोप लगाया है कि 18 जनवरी 2026 को मौनी अमावस्या के अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बिना पूर्व अनुमति के पांटून पुल नंबर-2 पर लगी बैरियर को तोड़कर संगम अपर मार्ग की ओर भीड़ के साथ आगे बढ़े। यह समय माघ मेले का सबसे संवेदनशील समय माना जाता है, जब लाखों श्रद्धालु संगम स्नान के लिए उमड़ते हैं।
नोटिस में कहा गया है कि भीड़ के चरम समय में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बग्घी में सवार होकर स्नान के लिए जाना चाह रहे थे, जिससे भगदड़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती थी। मेला प्रशासन का कहना है कि इस तरह की गतिविधियां न केवल नियमों का उल्लंघन हैं, बल्कि आम श्रद्धालुओं की जान के लिए भी खतरा बन सकती हैं।
नोटिस में सख्त चेतावनी
इस पहले नोटिस का सबसे अहम और गंभीर पहलू यह है कि इसमें 24 घंटे के भीतर जवाब न मिलने की स्थिति में कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। नोटिस में स्पष्ट लिखा गया है कि यदि समय पर संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया, तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को माघ मेला क्षेत्र में दी गई भूमि और अन्य सुविधाएं तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दी जाएंगी। साथ ही, उनके मेले में प्रवेश पर भी प्रतिबंध लगाया जा सकता है। यही कारण है कि इस नोटिस के सामने आने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या वास्तव में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर प्रतिबंध लगेगा और क्या उनका शिविर हटाया जा सकता है।
शंकराचार्य पद को लेकर भी सवाल
पहले नोटिस में एक और अहम बात का जिक्र किया गया है। इसमें ‘शंकराचार्य’ शब्द के प्रयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लेख किया गया है। मेला प्रशासन का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस विषय में रोक के बावजूद नोटिस में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के नाम के साथ शंकराचार्य लिखा गया है।
जानिये दूसरा नोटिस
इसके बाद भेजे गए दूसरे नोटिस में मेला प्राधिकरण ने उनसे शंकराचार्य होने के संबंध में वैधानिक और आधिकारिक दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है। प्रशासन का तर्क है कि बिना प्रमाण के किसी संवैधानिक या परंपरागत पद का प्रयोग करना नियमों के खिलाफ है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष
जब इस पहले नोटिस के बारे में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से पूछा गया, तो उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया। उनका कहना है कि उन्हें इस नोटिस की कोई जानकारी नहीं दी गई थी। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा कोई नोटिस जारी हुआ है, तो वह उसका भी जवाब देंगे।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद नें प्रशासन पर लगाये गंभीर आरोप
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार और प्रशासन के अधिकारी बौखला चुके हैं। उनके अनुसार, मौनी अमावस्या के दिन हुई घटना से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए नोटिसों का सहारा लिया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य हमेशा धर्म और समाज की सेवा रहा है और उन्होंने कभी जानबूझकर नियमों का उल्लंघन नहीं किया।
इधर प्रशासन का तर्क, सुरक्षा सर्वोपरि
मेला प्रशासन का कहना है कि माघ मेले में श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोपरि है। मौनी अमावस्या जैसे अवसरों पर स्थिति बेहद संवेदनशील हो जाती है। ऐसे में किसी भी व्यक्ति, चाहे वह संत ही क्यों न हो, को नियमों से ऊपर नहीं रखा जा सकता। प्रशासन का यह भी कहना है कि बिना अनुमति बैरियर तोड़ना और भीड़ के बीच आगे बढ़ना गंभीर लापरवाही है। यदि समय रहते कार्रवाई न की जाए, तो इससे भविष्य में और भी बड़ी घटनाएं हो सकती हैं।
संत समाज में नाराजगी
इस पूरे घटनाक्रम के बाद संत समाज में भी नाराजगी देखी जा रही है। कुछ संतों का कहना है कि प्रशासन संतों को जानबूझकर निशाना बना रहा है। उनका तर्क है कि माघ मेला संतों और आस्था का पर्व है, न कि सिर्फ प्रशासनिक नियमों का प्रदर्शन। वहीं, कुछ संत इस बात से सहमत हैं कि नियम सभी के लिए समान होने चाहिए और किसी भी तरह की लापरवाही से श्रद्धालुओं की जान को खतरे में नहीं डाला जा सकता।
राजनीतिक रंग भी लेने लगा मामला
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद ने अब राजनीतिक रंग भी लेना शुरू कर दिया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार धार्मिक संतों को दबाने का प्रयास कर रही है। वहीं, सत्तारूढ़ पक्ष का कहना है कि यह पूरी तरह से कानून-व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ा मामला है, इसमें राजनीति नहीं देखी जानी चाहिए।
आगे क्या?
फिलहाल सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इन दोनों नोटिसों का क्या जवाब देते हैं और मेला प्रशासन उस पर क्या कार्रवाई करता है। यदि प्रशासन अपने रुख पर कायम रहता है, तो यह मामला और भी बड़ा रूप ले सकता है। दूसरी ओर, यदि बातचीत और समझौते का रास्ता निकलता है, तो विवाद शांत भी हो सकता है।
आस्था, परंपरा, कानून और सुरक्षा के संतुलन पर सवाल
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और माघ मेला प्राधिकरण के बीच उपजा यह विवाद सिर्फ एक संत और प्रशासन तक सीमित नहीं है। यह आस्था, परंपरा, कानून और सुरक्षा के बीच संतुलन का सवाल भी खड़ा करता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन और संत समाज इस टकराव को किस दिशा में ले जाते हैं,संवाद की ओर या संघर्ष की ओर।







