नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने देश की मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों पर तीखी और स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि “अब ‘तेरे टुकड़े होंगे’ जैसी भाषा नहीं चलेगी। यह भारत के लिए लड़ने या टूटने का नहीं, बल्कि जीने और आगे बढ़ने का समय है।” उनके इस बयान को सामाजिक सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और सकारात्मक राष्ट्र निर्माण के संदेश के रूप में देखा जा रहा है। भागवत ने कहा कि हिंसा, नफरत और विभाजन की सोच से देश का भविष्य नहीं बन सकता।

विभाजनकारी भाषा पर सख़्त रुख
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में साफ शब्दों में कहा कि ऐसी भाषा, जो समाज को तोड़ने या डराने का काम करती है, लोकतांत्रिक भारत की आत्मा के खिलाफ है। उन्होंने संकेत दिया कि पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक विमर्श में उग्र और धमकी भरी भाषा बढ़ी है, जो न तो समाज के लिए अच्छी है और न ही आने वाली पीढ़ियों के लिए।
उनका कहना था कि असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन असहमति को हिंसा या नफरत के रूप में व्यक्त करना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
यह भारत के लिए जीने का समय है
भागवत ने ज़ोर देकर कहा कि आज भारत एक ऐसे दौर में खड़ा है, जहां दुनिया उसकी ओर उम्मीद भरी नज़रों से देख रही है। आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक क्षेत्रों में देश नई ऊंचाइयों को छू रहा है। उन्होंने कहा कि यह समय देश को कमजोर करने वाली सोच में उलझने का नहीं, बल्कि राष्ट्र को मजबूत करने में योगदान देने का है। “जीने का समय” से उनका आशय था—सकारात्मक सोच, रचनात्मक प्रयास और सामूहिक प्रगति।
राष्ट्र निर्माण में समाज की भूमिका
अपने वक्तव्य में मोहन भागवत ने यह भी कहा कि राष्ट्र केवल सरकार या किसी एक संस्था से नहीं बनता, बल्कि समाज के हर वर्ग की भागीदारी से बनता है।
उन्होंने युवाओं, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों से आह्वान किया कि वे भाषा और व्यवहार में संयम रखें और समाज को जोड़ने का काम करें। उनका मानना है कि शब्दों की ताकत बहुत बड़ी होती है—वे या तो घाव भर सकते हैं या नए घाव दे सकते हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी
भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियाद है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।उन्होंने कहा कि बोलने का अधिकार किसी को भी समाज में ज़हर घोलने का लाइसेंस नहीं देता। आलोचना हो, सवाल हों, बहस हो—लेकिन मर्यादा और संवैधानिक मूल्यों के दायरे में।
युवाओं को दिया विशेष संदेश
अपने संबोधन में सरसंघचालक ने युवाओं का विशेष रूप से ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि आज का युवा भारत का भविष्य है और उसकी सोच ही आने वाले दशकों की दिशा तय करेगी। भागवत ने युवाओं से आग्रह किया कि वे सोशल मीडिया या भीड़ की मानसिकता से प्रभावित होकर उग्र भाषा का हिस्सा न बनें। उन्होंने कहा कि साहस का अर्थ केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सही और गलत के बीच फर्क समझना भी है।
सामाजिक समरसता पर जोर
मोहन भागवत ने कहा कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता और समरसता में है। भाषा, धर्म, जाति और क्षेत्र के आधार पर समाज को बांटना देश की आत्मा को कमजोर करता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की संस्कृति संवाद, सह-अस्तित्व और सहिष्णुता की रही है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
राजनीति और समाज के लिए संकेत
भागवत के इस बयान को केवल वैचारिक वक्तव्य नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह टिप्पणी उन सभी वर्गों के लिए है जो सार्वजनिक मंचों पर उग्र और धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल करते हैं।
उन्होंने यह संकेत भी दिया कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए।
बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत
अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि आज जब दुनिया कई स्तरों पर अस्थिरता का सामना कर रही है, भारत के पास नेतृत्व दिखाने का अवसर है। ऐसे में आंतरिक कलह, नफरत और विभाजन देश की संभावनाओं को सीमित कर सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि देश के भीतर सकारात्मक माहौल बने, जिससे भारत वैश्विक मंच पर मजबूती से खड़ा हो सके।
समाज में संवाद की संस्कृति
भागवत ने संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि असहमति का समाधान टकराव नहीं, संवाद है।
उनके अनुसार, अगर समाज के विभिन्न वर्ग आपस में खुलकर, सम्मान के साथ बात करें, तो कई समस्याओं का समाधान अपने आप निकल सकता है।
संदेश का व्यापक अर्थ
“‘तेरे टुकड़े होंगे’ जैसी भाषा नहीं चलेगी” — यह वाक्य केवल एक नारा नहीं, बल्कि उस मानसिकता के खिलाफ चेतावनी है जो भारत को कमजोर करना चाहती है।
मोहन भागवत का कहना है कि भारत को आगे बढ़ाने के लिए डर और नफरत नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग और सकारात्मक ऊर्जा की जरूरत है। मोहन भागवत का यह बयान मौजूदा समय में एक स्पष्ट और सशक्त संदेश देता है। यह न केवल उग्र भाषा के खिलाफ चेतावनी है, बल्कि देश को एकजुट होकर आगे बढ़ने का आह्वान भी है। यह भारत के लिए “जीने का समय” है—अर्थात विकास, समरसता और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का समय। अगर समाज इस संदेश को आत्मसात करता है, तो भारत न केवल आंतरिक रूप से मजबूत होगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक सकारात्मक उदाहरण बनकर उभरेगा।






