अक्षय तृतीया, जिसे ‘अखा तीज’ के नाम से भी जाना जाता है, सनातन धर्म में सबसे शुभ और मंगलकारी तिथियों में से एक है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व ‘अक्षय’ फल देने वाला माना गया है। ‘अक्षय’ का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो, यानी जो कभी नष्ट न हो। मान्यता है कि इस दिन किए गए दान, तप और व्रत का फल अनंत काल तक बना रहता है।
अक्षय तृतीया व्रत की संपूर्ण पूजन विधि
अक्षय तृतीया का व्रत मुख्य रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित है। इसकी विधि अत्यंत सरल परंतु श्रद्धा पर आधारित है
प्रातः काल की तैयारी
- ब्रह्म मुहूर्त में जागरण – सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त हों। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी (गंगा, यमुना आदि) में स्नान करें, अन्यथा घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
- संकल्प – स्वच्छ वस्त्र धारण करने के पश्चात हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें।
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पूजन स्थापना
- एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- भगवान के सामने घी का दीपक जलाएं और धूप-अगरबत्ती दिखाएं।
षोडशोपचार पूजन
- भगवान को पीले पुष्प, तुलसी दल (विष्णु जी के लिए अनिवार्य), और पीले चंदन का तिलक लगाएं।
- माता लक्ष्मी को कुमकुम, कमल का फूल और श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें।
- अभिषेक: इस दिन श्री हरि का केसर युक्त दूध या पंचामृत से अभिषेक करना अत्यंत फलदायी होता है।
कथा और आरती
- अक्षय तृतीया की व्रत कथा का श्रवण या वाचन करें। इसके बाद विष्णु चालीसा, लक्ष्मी अष्टकम का पाठ करें और अंत में सपरिवार आरती संपन्न करें।
क्या खाएं? (पथ्य)
उपवास के दौरान सात्विकता का पालन करना अनिवार्य है। यदि आप पूर्ण निर्जला व्रत नहीं रख रहे हैं, तो निम्नलिखित चीजों का सेवन किया जा सकता है
- फलाहार – केला, सेब, आम और खरबूजा जैसे मौसमी फलों का सेवन करें। विशेषकर खरबूजा इस दिन दान भी किया जाता है और प्रसाद रूप में ग्रहण भी किया जाता है।
- डेयरी उत्पाद – दूध, दही, छाछ और पनीर का सेवन ऊर्जा बनाए रखने के लिए किया जा सकता है।
- सत्तू – अक्षय तृतीया पर सत्तू (जौ या चने का) खाने और दान करने की परंपरा है। यह शीतल होता है और शरीर को ऊर्जा देता है।
- पंचामृत – पूजन के पश्चात प्रसाद के रूप में पंचामृत ग्रहण करें।
- कुट्टू या सिंघाड़ा – यदि आप कड़ा उपवास रख रहे हैं, तो शाम को फलाहारी भोजन में कुट्टू के आटे की पूड़ी या सिंघाड़े का हलवा ले सकते हैं।
क्या न खाएं? (अपथ्य)
व्रत की शुद्धता बनाए रखने के लिए कुछ चीजों से पूर्णतः परहेज करना चाहिए
- तामसिक भोजन – प्याज, लहसुन, मांस और मदिरा का भूलकर भी सेवन न करें।
- अन्न का त्याग – सामान्यतः व्रत में गेहूं, चावल और दालों का सेवन वर्जित होता है (जब तक कि पारण का समय न हो)।
- नमक – यदि संभव हो तो सादे नमक के स्थान पर सेंधा नमक का प्रयोग करें, या पूरी तरह नमक रहित रहें।
- बासी भोजन – सदैव ताजा और शुद्ध भोजन ही ग्रहण करें।
क्या करें? (विशेष शुभ कर्म)
- दान का महत्व – इस दिन दान का महत्व सबसे अधिक है। जल से भरे घड़े, पंखे, छाता, सत्तू, खरबूजा, वस्त्र और स्वर्ण-चांदी का दान ‘अक्षय’ पुण्य देता है।
- स्वर्ण/वस्तु क्रय – इस दिन नई वस्तुएं, विशेषकर सोना या चांदी खरीदना समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। यदि सामर्थ्य न हो, तो पीतल या तांबे का बर्तन खरीदना भी शुभ है।
- पितृ तर्पण – अक्षय तृतीया पर पितरों के नाम से जल दान और तर्पण करने से पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- मौन और जप – दिन भर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ या ‘श्री महालक्ष्म्यै नमः’ का मानसिक जप करते रहें।
क्या न करें? (सावधानियां)
- क्रोध और विवाद – इस दिन घर में शांति बनाए रखें। किसी से अपशब्द न बोलें और न ही किसी का अपमान करें।
- अंधेरा न रखें – शाम के समय घर के मुख्य द्वार और मंदिर में अंधेरा न रहने दें। दीप प्रज्वलित अवश्य करें।
- तुलसी की पत्तियां तोड़ना – भगवान विष्णु को तुलसी प्रिय है, लेकिन व्रत के दिन तुलसी की पत्तियां नहीं तोड़नी चाहिए। पूजन के लिए एक दिन पूर्व ही पत्तियां तोड़कर रख लें।
- लालच से बचें – खरीदारी करते समय सामर्थ्य से अधिक व्यय या प्रतिस्पर्धा की भावना न रखें।
अक्षय तृतीया का महत्व – एक संक्षिप्त दृष्टि
शास्त्रों के अनुसार, इसी दिन सतयुग और त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था। भगवान परशुराम का अवतार भी इसी तिथि को हुआ था। बद्रीनाथ धाम के कपाट भी इसी दिन खुलते हैं और वृंदावन में बांके बिहारी जी के चरणों के दर्शन वर्ष में केवल इसी दिन होते हैं। यह एक ‘अबूझ मुहूर्त’ है, जिसमें किसी भी मांगलिक कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती।
अक्षय तृतीया मात्र भौतिक समृद्धि का पर्व नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर के सद्गुणों को ‘अक्षय’ करने का दिन है। पूर्ण श्रद्धा से किया गया व्रत और निस्वार्थ भाव से किया गया दान आपके जीवन में सुख-शांति और लक्ष्मी का स्थायी वास सुनिश्चित करता है।







