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बारूद के ढेर पर शांति की कोशिश – अमेरिका ने ईरान के साथ युद्धविराम बढ़ाया पाकिस्तान की अहम भूमिका 

बारूद के ढेर पर शांति की कोशिश - अमेरिका ने ईरान के साथ युद्धविराम बढ़ाया पाकिस्तान की अहम भूमिका 
नवजोत कौर सिद्धू
On: अप्रैल 22, 2026 2:33 अपराह्न
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पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच में एक ऐसा मोड़ आया जिसकी उम्मीद बड़े-बड़े विशेषज्ञों को भी नहीं थी। महीनों से एक-दूसरे की ओर मिसाइलें ताने खड़े अमेरिका और ईरान के बीच जारी ‘डेडलॉक’ फिलहाल टूटता नजर आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नाटकीय घटनाक्रम में एलान किया है कि अमेरिका, ईरान के साथ चल रहे युद्धविराम की मियाद को आगे बढ़ा रहा है। ट्रंप के इस फैसले ने न केवल खाड़ी में युद्ध की आहटों को धीमा कर दिया है, बल्कि कूटनीति की मेज पर एक नई बिसात बिछा दी है इस फैसले के पीछे सबसे चौंकाने वाला पहलू पाकिस्तान की भूमिका रही है। 

अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि यह निर्णय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के विशेष अनुरोध और कूटनीतिक दखल के बाद लिया गया है,यह फैसला ऐसे समय में आया है जब युद्धविराम की पुरानी अवधि समाप्त होने के कगार पर थी और पूरी दुनिया को डर था कि शायद अब कूटनीति के दरवाजे बंद हो जाएंगे। पिछले कुछ हफ्तों में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में सैन्य गतिविधियां और दोनों देशों की ओर से दी जा रही धमकियों ने कच्चे तेल की कीमतों को भी आसमान पर पहुंचा दिया था। 

विशेषज्ञों का मानना था कि अगर युद्धविराम नहीं बढ़ाया गया, तो एक छोटा सा ‘ट्रिगर’ भी महायुद्ध की शुरुआत कर सकता था।हालांकि, अचानक लिए गए इस निर्णय ने संकेत दिया कि अमेरिका फिलहाल सैन्य विकल्प के बजाय कूटनीतिक रास्ता अपनाना चाहता है। इस फैसले के पीछे यह भी कारण बताया जा रहा है कि ईरान के भीतर राजनीतिक मतभेद उभरकर सामने आए हैं, जिससे वार्ता की संभावनाएं बनी हुई हैं। 

ईरान के बोल : अमरीका का फैसला एकतरफा

ईरान ने सीजफायर के फैसले को एकतरफा बताते हुए ठुकरा दिया है. हालांकि, जमीन पर सीजफायर ही है. ईरानी संसद स्पीकर के सलाहकार महदी मोहम्मदी ने कहा, “ट्रंप का सीजफायर एक्सटेंशन कोई मायने नहीं रखता. हारने वाला देश शर्तें नहीं थोप सकता है”।ईरान के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान यात्रा को लेकर स्पष्ट किया कि फिलहाल इस्लामाबाद जाने की कोई योजना नहीं है. इसका कारण अमेरिकी पक्ष की ओर से मिल रहे विरोधाभासी संदेश और व्यवहार को बताया गया।तेहरान टाइम्‍स के अनुसार, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा, ”तेहरान की फिलहाल इस्लामाबाद जाने की कोई योजना नहीं है. वहीं, ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा कि अमेरिका की “उकसाने वाली कार्रवाइयां” और युद्धविराम उल्लंघन दोनों देशों के बीच शांति वार्ता को जारी रखने में बड़ी बाधाएं हैं।

वार्ता में अड़चनें अब भी बरकरार

अमेरिका और ईरान के बीच की इस दुश्मनी का सबसे बड़ा कांटा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह रोक दे और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को अपनी सभी साइट्स की जांच करने दे। वहीं, ईरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम केवल ऊर्जा की जरूरतों के लिए है।इस समीकरण में इज़राइल की भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। इजरायल लगातार अमेरिका पर दबाव बना रहा है कि ईरान को किसी भी तरह की ढील देना आत्मघाती साबित होगा। इजरायली खुफिया एजेंसियों का दावा है कि ईरान परमाणु बम बनाने के बेहद करीब है। ऐसे में अमेरिका द्वारा युद्धविराम बढ़ाना इजरायल को रास नहीं आ रहा है।

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अमेरिका का दोहरा रुख

युद्धविराम खत्म होने से ठीक पहले लिया गया यह फैसला कई लोगों के लिए चौंकाने वाला है। अभी कुछ दिन पहले तक डोनाल्ड ट्रंप बेहद सख्त लहजे में सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दे रहे थे। लेकिन आखिरी वक्त में रुख नरम करना उनकी ‘दोहरी रणनीति’ का हिस्सा माना जा रहा है—एक तरफ दबाव की राजनीति और दूसरी तरफ संवाद का दरवाजा खुला रखना।

आगे की राह आसान नहीं

युद्धविराम का विस्तार निश्चित रूप से तत्काल तनाव को कम करने में मदद करेगा, लेकिन इससे स्थाई समाधान की गारंटी नहीं मिलती। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर दोनों पक्ष अपने रुख में नरमी नहीं लाते, तो स्थिति फिर से बिगड़ सकती है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता ने फिलहाल एक अवसर जरूर पैदा किया है, लेकिन इसे नतीजे तक पहुंचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी।

अमेरिका का यह फैसला निस्संदेह सराहनीय है, लेकिन सवाल वही है—क्या यह स्थाई शांति की ओर बढ़ता कदम है या फिर केवल आने वाले बड़े तूफान से पहले की खामोशी? पाकिस्तान की मध्यस्थता ने एक खिड़की तो खोली है, लेकिन उस खिड़की से कितनी ठंडी हवा आएगी, यह कहना अभी मुश्किल है।आने वाले हफ्ते कूटनीतिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं। यदि अमेरिका अपनी शर्तों में थोड़ा लचीलापन दिखाता है और ईरान अपनी जिद छोड़कर बातचीत की मेज पर आता है, तो शायद खाड़ी का नक्शा बदल जाए। फिलहाल, दुनिया की निगाहें इस ‘डेडलाइन’ पर टिकी हैं कि युद्धविराम की यह बढ़ी हुई मियाद क्या कोई ठोस नतीजा दे पाएगी।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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