केरल के एक इलाके से सामने आई यह घटना न सिर्फ राज्य, बल्कि पूरे देश को झकझोर देने वाली है। छत्तीसगढ़ से रोज़गार की तलाश में आए एक छत्तीसगढ़ के मज़दूर की कथित तौर पर भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। मृतक के परिवार का आरोप है कि उसे बांग्लादेशी समझकर निशाना बनाया गया और बिना किसी पुष्टि के लोगों ने कानून अपने हाथ में ले लिया।

बताया जा रहा है कि मज़दूर रोज़ की तरह अपने काम से लौट रहा था, तभी कुछ लोगों ने उसकी पहचान पर सवाल उठाए। भाषा, पहनावे और बाहरी होने के शक के आधार पर उसे घेर लिया गया। परिवार का कहना है कि उसने बार-बार खुद को भारतीय और छत्तीसगढ़ का निवासी बताया, लेकिन भीड़ ने उसकी एक नहीं सुनी। देखते ही देखते यह शक हिंसा में बदल गया और बेरहमी से की गई पिटाई के बाद उसकी मौत हो गई।
इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल है। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसी स्थिति कैसे बन गई, जहां एक आम मज़दूर को सिर्फ शक के आधार पर अपनी जान गंवानी पड़ी।
परिवार का दर्द और इंसाफ की गुहार
मृतक के परिवार पर इस घटना ने दुखों का पहाड़ तोड़ दिया है। छत्तीसगढ़ में बैठे परिजन अभी भी इस सदमे से उबर नहीं पाए हैं कि रोज़ी-रोटी के लिए घर से निकला उनका बेटा या भाई इस तरह वापस लौटेगा। परिवार का कहना है कि वह कई सालों से अलग-अलग राज्यों में मज़दूरी करता रहा, लेकिन कभी ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा।
परिजनों का आरोप है कि यह सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह और नफरत का नतीजा है। उनका कहना है कि अगर भीड़ ने थोड़ी भी समझदारी दिखाई होती और पुलिस को सूचना दी होती, तो आज उनका अपना जिंदा होता। परिवार ने मांग की है कि इस मामले में दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में कोई और मजदूर इस तरह की हिंसा का शिकार न बने।
परिवार यह भी सवाल उठा रहा है कि आखिर देश के भीतर ही एक नागरिक को “विदेशी” कहकर मार देना किस मानसिकता को दर्शाता है। उनका कहना है कि प्रवासी मज़दूर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन उन्हें आज भी शक और नफरत की नजर से देखा जाता है।
कानून-व्यवस्था, पहचान और बढ़ती भीड़ हिंसा पर बहस
यह घटना एक बार फिर देश में बढ़ती भीड़ हिंसा और पहचान के संकट पर गंभीर सवाल खड़े करती है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जहां लोगों को उनकी भाषा, पहनावे या शक के आधार पर निशाना बनाया गया। केरल जैसे शिक्षित और सामाजिक रूप से जागरूक राज्य में ऐसी घटना का होना कई लोगों के लिए चौंकाने वाला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अफवाहें, सोशल मीडिया पर फैलती गलत जानकारियां और अवैध घुसपैठ को लेकर बढ़ता डर, आम लोगों की सोच को प्रभावित कर रहा है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि लोग कानून को दरकिनार कर खुद ही न्याय करने लगते हैं, जो एक खतरनाक प्रवृत्ति है।
पुलिस का कहना है कि मामले की हर एंगल से जांच की जा रही है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। वहीं, मानवाधिकार संगठनों ने भी इस घटना पर चिंता जताई है और इसे कानून के राज के लिए गंभीर खतरा बताया है। उनका कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में शक के आधार पर हिंसा की कोई जगह नहीं हो सकती।
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश में काम करने वाले लाखों प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा से जुड़ा सवाल है। अगर ऐसी घटनाओं पर सख्ती से लगाम नहीं लगाई गई, तो सामाजिक ताना-बाना कमजोर होगा और डर का माहौल और गहरा सकता है।
फिलहाल मृतक का परिवार इंसाफ की राह देख रहा है और पूरा देश यह सोचने पर मजबूर है कि आखिर कब तक पहचान और अफवाहों के नाम पर निर्दोष लोगों की जान जाती रहेगी।






