पेरिस। रोलां गैरो का यह लाल बजरी वाला कोर्ट गवाह है कि टेनिस में प्रतिभा ही सब कुछ नहीं होती, कई बार किस्मत और वक्त का साथ होना भी उतना ही जरूरी है। जर्मनी के अलेक्जेंडर ज्वेरेव के लिए यह बात पत्थर की लकीर जैसी रही है। लेकिन इस बार कहानी कुछ अलग नजर आ रही है। फ्रेंच ओपन 2026 के मेंस सिंगल्स सेमीफाइनल में जिस तरह ज्वेरेव ने चेक रिपब्लिक के युवा खिलाड़ी याकुब मेंसिक को चार सेटों के कड़े मुकाबले में मात दी, उसने यह साफ कर दिया है कि यह खिलाड़ी अब रुकने के मूड में नहीं है। ज्वेरेव अब अपने पहले ग्रैंड स्लैम खिताब से महज एक कदम दूर खड़े हैं।
जब अनुभव ने थामी मैच की नब्ज
मैच की शुरुआत से ही कोर्ट पर एक अजीब सा तनाव था। एक तरफ ज्वेरेव का सालों का अनुभव था, तो दूसरी तरफ 20 साल के मेंसिक का बेखौफ अंदाज। ओपनिंग सेट में दोनों खिलाड़ियों ने बेसलाइन से एक-दूसरे को खूब छकाया। लंबी रैलियां चलीं और खेल पल-पल बदलता रहा। लेकिन कहते हैं ना कि बड़े मैचों का दबाव सिर्फ वही झेल सकता है जिसने वैसे उतार-चढ़ाव पहले देखे हों। ज्वेरेव ने ठीक वही किया। अहम मौकों पर अंक बटोरे और पहला सेट अपनी जेब में डाल लिया।इस बढ़त का असर दूसरे सेट में साफ दिखा। मेंसिक थोड़े नर्वस नजर आए और ज्वेरेव ने अपनी भारी-भरकम सर्विस और तेज तर्रार ग्राउंडस्ट्रोक्स के दम पर उन्हें कोर्ट के चारों कोनों में दौड़ाया। देखते ही देखते ज्वेरेव ने यह सेट भी जीतकर मैच पर 2-0 की मजबूत पकड़ बना ली।
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मेंसिक का पलटवार और ज्वेरेव की वो पुरानी कमजोरी
लेकिन कहानी में ट्विस्ट आना अभी बाकी था। दो सेट से पिछड़ रहा एक 20 साल का लड़का इतनी आसानी से हथियार डाल देगा, इसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। तीसरे सेट में मेंसिक ने अपनी रणनीति एकदम उलट दी। उन्होंने बेसलाइन पर रुकने के बजाय नेट पर आकर आक्रामक शॉट्स खेलने शुरू किए। इस अचानक हुए बदलाव के लिए ज्वेरेव शायद तैयार नहीं थे।यहाँ ज्वेरेव की वही पुरानी कमजोरी भी सामने आई, जहाँ वे लगातार दो सेट जीतने के बाद थोड़े रिलैक्स हो जाते हैं। उन्होंने कुछ आसान गलतियां कीं और मेंसिक ने उनकी सर्विस ब्रेक कर दी। रोलां गैरो का पूरा स्टेडियम इस युवा खिलाड़ी के जज्बे को देखकर खड़े होकर तालियां बजाने लगा। मेंसिक ने यह सेट 2-1 से जीतकर मैच में रोमांच वापस ला दिया।
चौथे सेट में ज्वेरेव का कमबैक: ऐसे दिखाया क्लास
चौथा सेट शुरू होते ही दर्शकों की सांसें थमी हुई थीं। डर था कि मुकाबला कहीं पांचवें सेट तक न खिंच जाए। लेकिन यहीं पर ज्वेरेव ने दिखाया कि आखिर क्यों वो वर्ल्ड क्लास खिलाड़ी हैं। उन्होंने पिछले सेट की कमियों को तुरंत सुधारा। चौथे सेट के तीसरे ही गेम में एक बेहतरीन ड्रॉप शॉट के सहारे ज्वेरेव ने ब्रेक पॉइंट हासिल किया। इसके बाद उन्होंने अपनी सर्विस पर कोई ढील नहीं दी। मेंसिक ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन ज्वेरेव के दमदार बैकहैंड का उनके पास कोई जवाब नहीं था।आखिरकार ज्वेरेव ने चौथा सेट जीतकर मैच अपने नाम कर लिया। मैच पॉइंट जीतते ही ज्वेरेव ने राहत की सांस लेते हुए आसमान की तरफ देखा—यह सिर्फ एक जीत नहीं थी, बल्कि सालों की चोटों और नाकामियों के दर्द से मिली मुक्ति का अहसास था।

किस्मत के साए से बाहर निकलने की चुनौती
ज्वेरेव का करियर रिकॉर्ड देखें तो ओलंपिक गोल्ड से लेकर एटीपी फाइनल्स तक, उनके पास सब कुछ है। कमी है तो बस उस एक ग्रैंड स्लैम ट्रॉफी की। साल 2020 के यूएस ओपन फाइनल की वो हार आज भी उनके फैंस को चुभती है, जहाँ वे जीत के मुहाने पर आकर हार गए थे। फिर इसी पेरिस के कोर्ट पर राफेल नडाल के खिलाफ खेलते हुए उनका टखना मुड़ना और व्हीलचेयर पर बाहर जाना—उनकी बदकिस्मती की गवाही देता है। इसलिए रविवार का दिन उनके लिए महज एक मैच नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराने का दिन है।
फाइनल का गणित: दबाव बनाम बेखौफ अंदाज
रविवार को खिताबी जंग में उनके सामने होंगे इटली के फ्लावियो कोबोली। कोबोली इस टूर्नामेंट के ‘जायंट किलर’ रहे हैं और पहली बार किसी ग्रैंड स्लैम के फाइनल का स्वाद चखेंगे। सबसे दिलचस्प बात यह है कि कोबोली के पास खोने को कुछ नहीं है, वे खुलकर खेलेंगे। जबकि ज्वेरेव पर उम्मीदों और इतिहास का वो भारी बोझ होगा, जो कई बार अच्छे-अच्छे खिलाड़ियों के हाथ-पैर फुला देता है। लाल मिट्टी पर होने वाला यह मुकाबला जितना टेनिस रैकेट का है, उतना ही दिमाग का भी होने वाला है।







