जलवायु परिवर्तन आज मानवता के सामने खड़ी सबसे चुनौतीपूर्ण और खतरनाक वास्तविकताओं में से एक बन चुका है। पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है, समुद्र का स्तर तेजी से ऊपर उठ रहा है, अनियमित बारिश, सूखा, बाढ़ और चक्रवात जैसी चरम मौसमी घटनाएँ आम होती जा रही हैं। इसी गंभीर परिदृश्य के बीच आयोजित Climate Summit 2025 ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस वैश्विक बैठक में विश्व के 150 से अधिक देशों के नेता, वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक में जलवायु संकट से निपटने के लिए सामूहिक रणनीति और कड़े कदमों पर चर्चा की गई।

जलवायु कार्रवाई पर दुनिया की एकजुटता
बैठक की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र महासचिव के कठोर और भावनात्मक संबोधन के साथ हुई। उन्होंने कहा कि दुनिया “जलवायु संकट की आपात स्थिति” से गुजर रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि वर्तमान उत्सर्जन की गति जारी रही, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भारी खतरे में होगा। महासचिव ने देशों से तुरंत कार्रवाई करने और वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर सीमित रखने की प्रतिबद्धता दिखाने की अपील की।
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उन्होंने कहा—“समय हमारे हाथों से रेत की तरह फिसल रहा है। अब फैसले कल नहीं, आज लेने होंगे।”
कार्बन उत्सर्जन घटाने पर नए वैश्विक वादे
सम्मेलन में अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान और कनाडा जैसे कई विकसित देशों ने 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में बड़ी कटौती का वादा किया। अमेरिका ने घोषणा की कि वह 2050 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन हासिल करेगा और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार पर 300 अरब डॉलर का निवेश करेगा।
चीन ने 2060 तक कार्बन-न्यूट्रल बनने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, लेकिन विशेषज्ञों ने कहा कि चीन को कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए और अधिक तीव्र कदम उठाने होंगे।
यूरोपीय संघ ने 2040 तक कार्बन उत्सर्जन में 90% कमी लाने का लक्ष्य रखा है, जो अब तक का सबसे महत्वाकांक्षी कदम माना जा रहा है।
विकासशील देशों की मांग—लॉस एंड डैमेज फंड को मजबूत करें
अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव उन्हीं क्षेत्रों पर पड़ रहा है—
लेकिन वे उत्सर्जन के लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं।
इसी मुद्दे पर ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ (Loss & Damage Fund) को मजबूत करने की मांग तेजी से उठी। विकासशील देशों ने कहा कि बढ़ती बाढ़, सूखा, समुद्र तटों का कटाव और कृषि हानि से उन्हें भारी नुकसान हो रहा है, जिसकी भरपाई के लिए आर्थिक सहायता अत्यंत आवश्यक है।
इस पर सहमति बनी कि विकसित देश इस फंड में अधिक योगदान देंगे, ताकि जलवायु आपदाओं से नुकसान झेल रहे देशों की सहायता की जा सके।
भारत की मजबूत और संतुलित भूमिका
भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी रणनीतिक और पर्यावरणीय प्रतिबद्धता को रखते हुए साफ कहा कि वह विकास और पर्यावरण संरक्षण—दोनों को समान गति से आगे बढ़ाने का पक्षधर है।
भारत ने बताया कि—
- वह 2030 तक 500 गीगावाट नॉन-फॉसिल ऊर्जा क्षमता हासिल करेगा।
- 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य प्राप्त करेगा।
- देश में सौर ऊर्जा मिशन और हरित हाइड्रोजन नीति को तेजी से लागू किया जा रहा है।
भारत ने यह भी कहा कि विकसित देशों को विकासशील राष्ट्रों की तकनीकी और वित्तीय मदद के प्रति और अधिक जिम्मेदार होना चाहिए।
वैज्ञानिकों की चेतावनी—2025 सबसे गर्म वर्ष होने की आशंका
बैठक में प्रस्तुत रिपोर्टों ने सबको चौंका दिया। वैज्ञानिकों ने बताया कि—
- 2025 अब तक का सबसे गर्म वर्ष हो सकता है।
- पृथ्वी का तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में 1.3°C बढ़ चुका है।
- आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ दो दशक में 40% तक पिघल चुकी है।
- महासागरों का तापमान इतिहास में सबसे अधिक स्तर पर है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम किए बिना जलवायु संकट को नियंत्रित करना संभव नहीं है।
सम्मेलन का निष्कर्ष—साझा भविष्य के लिए साझा कार्रवाई
बैठक के अंत में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि दुनिया अब जलवायु परिवर्तन पर पिछली गति से काम नहीं कर सकती। बल्कि कठोर, तेज और सामूहिक कार्रवाई अनिवार्य हो चुकी है। सभी देशों ने स्वीकार किया कि जलवायु संकट किसी एक देश, एक महाद्वीप या एक समुदाय की समस्या नहीं है—यह पूरी पृथ्वी का संकट है।
अंततः दुनिया ने यह संदेश दिया—
“Climate crisis needs climate justice.”
और यह तभी संभव है जब विकास, आर्थिक वृद्धि और पर्यावरण संरक्षण—तीनों का संतुलन बनाया जाए।
Climate Summit 2025 ने दुनिया को एक बार फिर यह एहसास दिलाया कि पृथ्वी को बचाने का समय अभी है—और निर्णय भी अभी लेने होंगे।






