महाभारत का प्रत्येक पात्र अपने भीतर गहरी दार्शनिक और नैतिक अर्थवत्ता समेटे हुए है, लेकिन उनमें भीष्म पितामह का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। त्याग, कर्तव्य, व्रत और धर्म की पराकाष्ठा के रूप में भीष्म को स्मरण किया जाता है। उनका जीवन जितना अनुकरणीय था, उतना ही करुण भी। भीष्म को प्राप्त ‘इच्छा मृत्यु’ का वरदान आज भी लोगों के मन में जिज्ञासा जगाता है। यह वरदान न केवल उनकी असाधारण तपस्या और पिता-भक्ति का परिणाम था, बल्कि यह महाभारत की कथा को दिशा देने वाला एक महत्वपूर्ण तत्व भी बना।
देवव्रत से भीष्म बनने की कथा
भीष्म का जन्म हस्तिनापुर के प्रतापी राजा शांतनु और गंगा के पुत्र के रूप में हुआ था। जन्म के समय उनका नाम देवव्रत रखा गया। बाल्यकाल से ही देवव्रत असाधारण बुद्धि, बल और शास्त्र ज्ञान से युक्त थे। महर्षि वशिष्ठ और परशुराम जैसे महान गुरुओं से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। देवव्रत में एक आदर्श राजकुमार के सभी गुण विद्यमान थे, जिसके कारण वे प्रजा और दरबार दोनों के प्रिय थे।
राजा शांतनु अपने पुत्र देवव्रत से अत्यंत स्नेह करते थे और उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। किंतु नियति को कुछ और ही स्वीकार था। राजा शांतनु का मन एक मछुआरे की कन्या सत्यवती पर आसक्त हो गया। सत्यवती के पिता ने विवाह की शर्त यह रखी कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा। इस शर्त ने राजा शांतनु को भीतर से तोड़ दिया, क्योंकि वे देवव्रत को सिंहासन से वंचित नहीं करना चाहते थे।
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कठोर प्रतिज्ञा और अद्भुत वरदान
जब देवव्रत को अपने पिता के मनोव्यथा का कारण ज्ञात हुआ, तो उन्होंने बिना किसी संकोच के त्याग का मार्ग चुना। देवव्रत स्वयं सत्यवती के पिता के पास पहुंचे और न केवल राज्य का त्याग करने की प्रतिज्ञा ली, बल्कि आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत भी धारण किया। यह प्रतिज्ञा इतनी कठोर और असाधारण थी कि तीनों लोकों में इसकी गूंज सुनाई दी। देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और तभी देवव्रत को ‘भीष्म’ की उपाधि मिली, जिसका अर्थ है भयंकर या कठोर प्रतिज्ञा करने वाला।
अपने पुत्र के इस महान त्याग से राजा शांतनु अत्यंत भावुक हो उठे। उन्होंने देवव्रत से वर मांगने को कहा। तब राजा शांतनु ने उन्हें वह अद्वितीय वरदान प्रदान किया, जिसे ‘इच्छा मृत्यु’ कहा गया। इस वरदान के अनुसार भीष्म अपनी मृत्यु का समय स्वयं चुन सकते थे। जब तक वे न चाहें, मृत्यु उन्हें स्पर्श नहीं कर सकती थी। यह वरदान किसी देवता से नहीं, बल्कि स्वयं पिता से प्राप्त हुआ, जिसने इसे और भी पवित्र और प्रभावशाली बना दिया।
महाभारत युद्ध और इच्छामृत्यु का महत्व
महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की ओर से सेनापति बने। यद्यपि उनका हृदय पांडवों के प्रति सहानुभूति रखता था, फिर भी उन्होंने कर्तव्य के पालन को सर्वोपरि माना। युद्धभूमि में भीष्म का पराक्रम अद्वितीय था। उनके रहते हुए कौरव सेना अजेय प्रतीत होती थी। यही कारण था कि पांडवों को उन्हें पराजित करने के लिए विशेष रणनीति बनानी पड़ी।
दशवें दिन अर्जुन ने शिखंडी को आगे रखकर भीष्म पर बाणों की वर्षा की। शिखंडी को पूर्वजन्म की कथा के कारण भीष्म शस्त्र नहीं उठाते थे। परिणामस्वरूप भीष्म बाणों की शय्या पर गिर पड़े, लेकिन उनकी मृत्यु नहीं हुई। इच्छा मृत्यु के वरदान के कारण वे जीवित रहे और सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करने लगे। शरशय्या पर लेटे हुए भी भीष्म ने युधिष्ठिर को राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्ष से संबंधित गूढ़ उपदेश दिए, जो आज भी भारतीय दर्शन की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं।
जब सूर्य उत्तरायण हुआ, तब भीष्म ने अपने प्राण त्यागे। यह क्षण केवल एक महान योद्धा की मृत्यु नहीं था, बल्कि धर्म, त्याग और कर्तव्य के सर्वोच्च आदर्श का साक्षात्कार भी था। इच्छामृत्यु का यह वरदान भीष्म के जीवन को अमर बना गया और उन्हें पौराणिक इतिहास में एक अद्वितीय स्थान प्रदान किया।
इच्छामृत्यु का प्रतीकात्मक अर्थ
भीष्म को मिला इच्छामृत्यु का वरदान केवल शारीरिक मृत्यु पर नियंत्रण का संकेत नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम और जीवन पर अधिकार का प्रतीक भी है। उन्होंने अपने जीवन के हर क्षण को धर्म के अनुसार जिया और अंत भी अपनी इच्छा से चुना। यही कारण है कि भीष्म पितामह को केवल महाभारत का पात्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में आदर्श मनुष्य के रूप में देखा जाता है।
उनकी कथा यह सिखाती है कि त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता और कर्तव्य का पालन ही जीवन का सर्वोच्च धर्म है। भीष्म का जीवन और उनकी इच्छामृत्यु आज भी मानव को आत्मबल, संयम और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।







