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Parliament and Electoral Reforms: Growing Consensus in Indian Politics

Parliament and Electoral Reform
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 3, 2025 7:24 अपराह्न
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भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संसद और चुनावी प्रक्रिया है। समय के साथ देश की राजनीति, समाज और तकनीक में कई बदलाव आए हैं, जिनके अनुरूप चुनावी व्यवस्था और संसदीय प्रक्रियाओं में भी सुधार की मांग बढ़ी है। दिलचस्प यह है कि जहां राजनीतिक दल अनेक मुद्दों पर एक-दूसरे के विरोध में दिखते हैं, वहीं संसद और चुनावी सुधारों को लेकर एक बढ़ती सहमति भी देखने को मिल रही है। देशहित और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण के लिए सभी दलों में सुधार की आवश्यकता को लेकर एक साझा समझ विकसित होती दिख रही है।

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संसदीय सुधारों की आवश्यकता क्यों?

भारत की संसद विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्थाओं में से एक है, लेकिन समय के साथ इसकी कार्यप्रणाली से जुड़े कई मुद्दे सामने आए हैं—

  • सदन में लगातार होने वाला हंगामा
  • कार्यवाही का कम समय
  • स्थायी समिति प्रणाली का कम उपयोग
  • महत्वपूर्ण बिलों पर पर्याप्त चर्चा का अभाव
  • सदस्यों की जवाबदेही में कमी

इन चुनौतियों ने यह स्पष्ट किया है कि संसद को अधिक प्रभावी और जिम्मेदार बनाने के लिए व्यापक सुधार जरूरी हैं।

मुख्य संसदीय सुधार जिन पर सहमति बढ़ रही है

1. सदन की कार्यवाही बढ़ाने पर जोर

वर्तमान में संसद का औसत कार्य दिवस पहले की तुलना में काफी कम हो गया है।
राजनीतिक दल चाहते हैं कि—

  • अधिक सत्र बुलाए जाएं
  • सदन में चर्चा और बहस का समय बढ़ाया जाए
  • हंगामे की स्थिति में कार्यवाही बाधित न हो

सभी दलों में यह सहमति बन रही है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए संसद का सक्रिय संचालन जरूरी है।

2. समितियों की भूमिका मजबूत करना

संसदीय समितियाँ किसी भी बिल का गहराई से अध्ययन कर उसकी कमियाँ और सुधार सुझाती हैं।
राजनीति में यह मान्यता बढ़ रही है कि—

  • अधिक से अधिक बिल समिति को भेजे जाएं
  • विशेषज्ञों की राय ली जाए
  • समिति की रिपोर्ट को महत्व दिया जाए

इससे कानून निर्माण की गुणवत्ता में सुधार होगा।

3. सदस्यों की जवाबदेही बढ़ाना

कई दल चाहते हैं कि—

  • सांसदों की हाजिरी अनिवार्य हो
  • गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार पर दंड का प्रावधान हो
  • जनता के प्रति सांसदों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए

यह सुधार जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच विश्वास को मजबूत करेगा।

चुनावी सुधार: लोकतंत्र की पारदर्शिता के लिए आवश्यक

भारत में चुनाव दुनिया के सबसे बड़े और जटिल लोकतांत्रिक अभ्यासों में से एक है। जैसे-जैसे समाज में जागरूकता और तकनीक का विस्तार हो रहा है, चुनावी व्यवस्था में भी पारदर्शिता, विश्वसनीयता और आधुनिकता की मांग बढ़ रही है।

1. एक साथ चुनाव (One Nation, One Election)

हाल के वर्षों में यह विषय जोर पकड़ रहा है।

  • लोकसभा और विधानसभाओं के लगातार अलग-अलग चुनाव होने से खर्च बढ़ता है
  • प्रशासनिक व्यवस्था पर दबाव पड़ता है
  • लंबे समय तक आचार संहिता लागू रहने से विकास कार्य धीमे हो जाते हैं

कई राजनीतिक दल इस पर सकारात्मक राय देते दिख रहे हैं, हालांकि कुछ तकनीकी और संवैधानिक चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं।

2. चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता

काले धन और अपारदर्शी चंदे की समस्या को खत्म करने के लिए—

  • चुनावी बॉन्ड
  • डिजिटल फंडिंग
  • चंदे की सार्वजनिक जानकारी

जैसे प्रावधानों पर चर्चा तेज़ है। बहुत से दल मानते हैं कि पारदर्शी फंडिंग से राजनीति साफ और विश्वसनीय बनेगी।

3. अपराधीकरण को रोकना

राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को रोकना एक बड़ा मुद्दा है।

  • कई दल चाहते हैं कि गंभीर अपराधों में चार्जशीटेड लोगों को चुनाव लड़ने से रोका जाए
  • तेजी से ट्रायल हो
  • उम्मीदवारों की संपत्ति और केस की जानकारी अनिवार्य हो

इस विषय पर व्यापक सहमति बनती दिख रही है।

4. तकनीक का उपयोग बढ़ाना

चुनावी प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और आधुनिक Weapons बनाने के लिए—

  • EVM और VVPAT
  • ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण
  • डिजिटल प्रचार

जैसी तकनीकों को और मजबूत करने की मांग बढ़ी है।

EVM और VVPAT

राजनीति में बढ़ती सहमति—लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत

भारतीय राजनीति में यह कम ही देखने को मिलता है कि सभी दल किसी मुद्दे पर एक सुर में बात करें। लेकिन संसद और चुनावी सुधारों पर—

  • सत्तारूढ़ दल
  • विपक्ष
  • छोटे क्षेत्रीय दल
  • और स्वतंत्र सांसद

सभी इस बात पर सहमत हैं कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए सुधार जरूरी हैं। चाहे वह एक साथ चुनाव का विषय हो, फंडिंग का पारदर्शी तरीका, या संसद की कार्यक्षमता—सभी में सुधार की सोच मजबूत हो रही है। यह सहमति भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत है और लोकतंत्र को और मजबूत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम भी।

निष्कर्ष

संसद और चुनावी सुधार समय की मांग हैं। आज जब भारत विश्व मंच पर तेजी से उभरती ताकत बन रहा है, तब उसकी लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी आधुनिक, पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाना आवश्यक है।

राजनीति में बढ़ती सहमति इस प्रक्रिया को और गति दे सकती है। यदि सुधार सही दिशा में और सामूहिक प्रयासों से लागू होते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र आने वाले वर्षों में और अधिक मजबूत, पारदर्शी और जन-केंद्रित बनकर उभर सकता है।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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