व्यापारभारतविदेशी समाचारखेलजीवन शैलीराजनीतिधर्मभौगोलिकसेलिब्रेटीज़शिक्षास्वास्थ्य

Khushi Kumari Football Player-Driver कि बेटी का अब IWL  दिखाएगी दमखम

Khushi Kumari Football Player-Driver कि बेटी का अब IWL  दिखाएगी दमखम
नवजोत कौर सिद्धू
On: फ़रवरी 27, 2026 3:42 अपराह्न
Follow Us:

डेलीबार्ता,भोपाल/रायसेन

एक कहावत है ना कि “जहां चाह – वहां राह” जी हां ऐसा कहा जाता है ना कि यदि आपनें कुछ ठान लिया मन बना लिया तो आपके सामनें चाहे संघर्षों की कितनी भी दीवारें आये आप उन्हें लांघकर अपनी मंजिल तक पहुंच ही जाते हैं। जी, हां कुछ ऐसा ही कर दिखाया है मध्यप्रदेश की एक बेटी नें जिसके संघर्षों की कहानी नें इस कहावत को साबित कर दिया है। दरअसल 

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से आनें वाली 21 वर्षीय बेटी खुशी गहलोत (फुटबॉलर) ने इस बात को साबित कर दिखाया है, कि आर्थिक चुनौतियों, सीमित संसाधनों, और तमाम संघर्षों के बाद भी अपनें लक्ष्य को हासिल कर दिखाया। 

खुशी का हौसला कभी कमजोर नहीं पड़ा। और इसी हौशले की वजह से आज वह वक्त आ गया कि खुशी नें एक छोटी सी जगह के धूल भरे मैदानों से फुटबॉल खेलना शुरु किया और अपनी प्रतिभा, लगन और खेल समर्पण से इंडियन वुमेंस लीग (IWL) में अपनी प्रतिभा  दिखाने के लिए तैयार हो गई है।खुशी का यह सफर भले ही आज सबको खुशियों से भर दिया हो, लेकिन यह सफर बेहद जटिल और कठिन परिश्रमों का परिणाम रहा है। खुशी के इस सफर में तमाम चुनौतियां आईं, कई मुश्किलों का उन्होंने सामना किया और यह मुकाम हासिल किया। 

ड्राईवर की बेटी तमाम आर्थिक परेशानियां

एक ड्राइवर की बेटी होने के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद साधारण थी, लेकिन खुशी के सपने असाधारण थे। लेकिन अपनी लगन, अनुशासनशीलता, और आत्मविश्वास से खुशी नें आज उस मंच में स्थान बना लिया जो सहज नहीं है। 

Latest published : India Women vs Australia Women T20 – घरेलू मैदान में ऑस्ट्रेलिया ने गवाई T20 मैच

असाधारण सपना, साधारण परिवार

चलिए आपको खुशी के बारे में बताते हैं।  खुशी गहलोत का जन्म और पालन-पोषण रायसेन जिले में हुआ। उनके पिता पेशे से ड्राइवर हैं और परिवार की आय शुरु से ही पिता के आय पर सीमित रही। जानकारी के मुताबिक रोजाना की  मेहनत करने के बाद जो कमाई होती थी, उससे घर का खर्च चलाना  पहले ही किसी चुनौती से कम नहीं था, वहीं बेटी के फुटबॉली जुनून को पूरा करना बेहद मुश्किल था।फुटबॉल जैसे खेल को अपनाना, जिसमें किट, स्पोर्ट्स शूज़,एक संतुलित आहार और जगह जगह जानें आनें होनें वाले यात्रा खर्च जैसी कई जरूरतें थी जिसे पूरा करना आसान नहीं था। 

लेकिन खुशी के परिवार ने उसका हौसला कभी कमजोर पड़ने नहीं दिया। खुशी के लिए फुटबॉल सिर्फ खेल नहीं, बल्कि अपनी पहचान बनाने का वह जनून था जिसे वह हर हाल में पूरा करना चाहती थी।खुशी को बचपन से ही उन्हें खेलों में रुचि थी, और स्कूल में जब वह फुटबॉल के खेल से जुड़ी तो उनका जीवन पूरी तरह बदल गया।

स्कूल के मैदान से शुरू हुआ यह  सफर, IWL तक पहुंचा

खुशी ने फुटबॉल की शुरुआत वर्ष 2017 से की, और स्कूल स्तर पर इस खेल को शुरु किया। शुरुआती दौर में उन्हें खेल की बारीकियों की ज्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन मैदान पर उनका आत्मविश्वास और उनकी प्रतिभा जोश के साथ नजर आती थी। वक्त के साथ कोच और अन्य खिलाड़ियों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। और उनके रास्तों को आसान बनाने में मदद की। 

हालांकि शुरुआती दौर बेहद कठिन रहा। उनके पास प्रोफेशनल स्पोर्ट्स किट नहीं थी। कई बार सामान्य जूतों में ही अभ्यास करना पड़ता था। मैदान की कठिन परिस्थितियों और संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने अभ्यास नहीं छोड़ा।

Read more :

वक्त ऐसा भी आया‌ कि जूते खरीदने के लिए करनी पड़ी नौकरी

खुशी की कठिनाइयों में एक हिस्सा बेहद प्रेरणादायी है। बताया कि खुशी के इस सफर में एक हिस्सा ऐसा भी आया कि जब उन्होंने अपने सपने को पूरा करने के लिए खुद नौकरी करने का फैसला लिया। परिवार पर लगातार आर्थिक बोझ बढ़ रहा था, जिसे कम करनें खुशी नें एक निजी स्थान पर नौकरी करनें का फैसला लिया। और करीब डेढ़ साल तक निजी नौकरी की, और उससे मिलने वाले पैसों से अपनी खेल जरूरतों को पूरा किया। यहां तक की महंगे जूते और अन्य सामग्री के लिये उनके पास आर्थिक संकट था, जिसे दूर करनें के लिये उन्हें यह फैसला उठाना पड़ा।

दिन में करती थी काम और रात में खेलती थी फुटबॉल 

एक दौर ऐसा भी यहा कि खुशी दिन में काम करती थी और रात में फुटबॉल की प्रैक्टिस करती थी, जो उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गई। ज्यादा से ज्यादा प्रैक्टिस करते वह बुरी तरह थक जाती थी। लेकिन उन्होनें अपनी ट्रेनिंग जारी रखी। छोटी-छोटी बचत करके उन्होंने आखिरकार अपने लिए स्पाइक्ड फुटबॉल शूज़ खरीदे। यह उनके जीवन का भावनात्मक पल था, क्योंकि यह सिर्फ जूते नहीं बल्कि उनके संघर्ष की पहली जीत थी।

संघर्ष का ‌दौर लगातार जारी

खुशी का कहना है कि सफलता की राह आसान नहीं है; यह सफर लंबा है। सीनियर नेशनल चैंपियनशिप की तैयारी के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी क्योंकि वे पूरा ध्यान खेल पर दे सकें। आर्थिक चुनौतियां अब भी मौजूद हैं। महंगे स्पोर्ट्स उपकरण और बेहतर डाइट की व्यवस्था करना आज भी आसान नहीं है।

इसके बावजूद उनका आत्मविश्वास अडिग है। उनका कहना है कि संसाधनों की कमी कभी भी मेहनत की कमी नहीं बन सकती। सीमित साधनों में भी उन्होंने अपनी फिटनेस और अभ्यास को लगातार बनाए रखा है।

अब उनकी खेल शैली ही बनी पहचान

मैदान पर सेंट्रल मिडफील्डर की  भूमिका निभाने वाली खुशी गहलोत बताती है कि हर क्षण चुनौतीपूर्ण है। यह पोजिशन टीम की रीढ़ मानी जाती है, जहां खिलाड़ी को आक्रमण और बचाव दोनों में बराबर योगदान देना होता है। उनकी तेज रफ्तार, शानदार स्टैमिना और खेल को पढ़ने की क्षमता ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।

स्थानीय टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन के दौरान उन्हें स्काउट किया गया। इसके बाद उन्होंने क्षेत्रीय टीम में जगह बनाई और लगातार बेहतर प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ती रहीं। कोचों के अनुसार, खुशी की सबसे बड़ी ताकत उनका फिटनेस लेवल और मैदान पर कभी हार न मानने वाला रवैया है।

कड़ी मेहनत के बाद इंडियन वुमेंस लीग तक पहुंचने का सपना हुआ पूरा

खुशी गहलोत अपनी टीम DFA रायसेन का प्रतिनिधित्व करते हुए इंडियन वुमेंस लीग में खेलने जा रही हैं। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उनकी टीम ने पहली बार इस प्रतिष्ठित लीग के लिए क्वालीफाई किया है। गौरतलब है कि (IWL) भारतीय महिला फुटबॉल का सबसे बड़ा मंच माना जाता है, जहां देशभर की प्रतिभाशाली खिलाड़ी हिस्सा लेती हैं। इस स्तर पर खेलना किसी भी खिलाड़ी के करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। खुशी के लिए यह सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि उनके जिले और राज्य के लिए गर्व का क्षण है।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनी खुशी

खुशी गहलोत की कहानी उन हजारों युवा खिलाडियों के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को अधूरा छोड़ देते हैं। उन्होंने साबित किया कि यदि आपनें मेहनत, धैर्य और जुनून है तो परिस्थितियां भी रास्ता नहीं रोक सकतीं और एक न एक दिन आपको सफलता मिलकर रहेगी।

अब वह वक्त आ गया है कि रायसेन जैसे छोटे से जिले की यह बेटी सिर्फ फुटबॉल नहीं खेल रही, बल्कि यह संदेश भी दे रही है कि छोटे शहरों से निकलकर भी बड़े सपने पूरे किए जा सकते हैं। आने वाले समय में उनका लक्ष्य राष्ट्रीय टीम में जगह बनाना और देश का नाम रोशन करना है। संघर्ष से सफलता तक की मिसाल धूल भरे मैदानों से लेकर राष्ट्रीय मंच तक का यह सफर संघर्ष, त्याग और आत्मविश्वास की कहानी है। खुशी की यह सफर नें यह दिखाया है कि एक ड्राइवर की बेटी से इंडियन वुमेंस लीग की खिलाड़ी बनने तक में असली ताकत परिस्थितियों में नहीं, बल्कि इंसान के इरादों में होती है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि उनका यही जज्बा जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में भारतीय महिला फुटबॉल को एक मजबूत मिडफील्डर मिल सकती है,और खुशी के रुप में देश को एक नई स्टार खिलाड़ी भी मिल सकती है।

Swati Pandey

A versatile writer mainly works on trending news, daily updates from politics, business, crime, current affairs and entertainment.

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment