देश भर में बिजली विभाग के कर्मियों और इंजीनियरों का आज एक बहुत बड़ा प्रदर्शन हुआ है। लगभग 27 लाख (2.7 मिलियन) कर्मचारियों ने National Coordination Committee of Electricity Employees and Engineers (NCCOEEE) की अगुवाई में विरोध-प्रदर्शन किया। उनका यह आंदोलन मुख्य रूप से Electricity (Amendment) Bill 2025 तथा बिजली क्षेत्र के निजीकरण (privatisation) के प्रस्ताव के खिलाफ है।

क्या है प्रोटेस्ट का कारण
- बिजली विभाग के कर्मचारी व इंजीनियर मानते हैं कि इस बिल में बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) को निजी हाथों में सौंपने की व्यवस्था है। इससे सार्वजनिक स्वामित्व समाप्त हो सकता है।
- बिल व प्रस्तावित नीतियाँ — कर्मचारियों के लिए — नौकरी की सुरक्षा, सेवा शर्तों, पेंशन और अन्य कल्याणात्मक विशेषाधिकारों को प्रभावित कर सकती हैं। विरोध-प्रदर्शन का उद्देश्य इन अधिकारों की रक्षा करना है।
- साथ ही, विरोधियों का कहना है कि निजीकरण से बिजली दरों में वृद्धि हो सकती है, खासकर किसानों और गरीब उपभोक्ताओं के लिए बिजली महंगी हो सकती है।
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कहां-कहां हुआ विरोध
आज देशव्यापी प्रदर्शन हुआ — प्रदर्शन कई राज्यों व शहरों में हुआ: लखनऊ, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, हैदराबाद, जयपुर, हैदराबाद, चण्डीगढ़, देहरादून, पटायल, पाटियाला, असम के गोलपारा सहित कई जगह।
उत्पादन क्षेत्र हों या वितरण — निजीकरण विरोधी लोग एक जुट दिखे। उदाहरण के लिए, पंजाब में Powercom and Transco Contract Employees Union Punjab ने भी स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन किया। उत्तराखंड में भी — जहाँ राज्य के बिजली अधिकारी–कर्मचारी यूनियन ने प्रदर्शन किया।
मथुरा में, जहां पूर्वांचल व दक्षिणांचल DISCOMs के खिलाफ पुरानी लड़ाई चल रही है — वहाँ भी कर्मचारी विरोध में निकले। कर्मचारियों की मुख्य मांगें
- Electricity (Amendment) Bill 2025 को वापस लेने की — ताकि निजीकरण की प्रक्रिया रोकी जाए।
- बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) के निजी हाथों में जाने की योजना बंद हो।
- नौकरी की सुरक्षा, सेवा शर्तों की गारंटी, पेंशन व अन्य कल्याण उपायों की रक्षा।
- आम उपभोक्ताओं, किसानों, गरीब-मध्यम वर्ग पर बिजली दरों में वृद्धि व सेवाओं की गुणवत्ता गिरने की संभावनाओं के प्रति समान चिंता।
सरकार की योजना और कर्मचारियों की चिंता
वर्तमान सरकार पूरे बिजली क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा दे रही है। DISCOMs को निजी कंपनी को सौंपने, फ्रैंचाइज़ देने, या लेस पर देकर बिजली वितरण व प्रबंधन निजी हाथों में देने की पहल है। विरोधियों का कहना है कि इससे बिजली
कंपनियाँ कॉर्पोरेट्स के नियंत्रण में आ जाएँगी — न कि जनता या कर्मचारियों के हित में। कर्मचारी व यूनियनों का यह भी कहना है कि निजीकरण से बिजली दरें बढ़ेंगी, खासकर ग्रामीण व किसान इलाकों में। पिछड़े व आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की बिजली पहुंच और सस्ती दरों की संभावना कम हो जाएगी। सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
- यदि निजीकरण हुआ — तो कर्मचारियों के लिए नौकरी की असुरक्षा और उनकी सामाजिक–आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।
- किसानों व गरीब–मध्यम वर्ग के लिए बिजली महँगी हो सकती है, जिससे खेती व रोजमर्रा की ज़िन्दगी प्रभावित होगी।
- सार्वजनिक कल्याणकारी सेवाओं के निजीकरण से जनहित की बजाय लाभ-केंद्रिक मॉडल को बढ़ावा मिल सकता है।
आगे की रणनीति
All India Power Engineers Federation (AIPEF) व NCCOEEE ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने बात नहीं सुनी, तो वे और भी बड़े आंदोलन करेंगे। एक राष्ट्रीय स्तर की रैली का एलान किया गया है — संभवतः 30 जनवरी 2026 को — राजधानी में। Tउनका इरादा है कि सभी राज्यों से कर्मचारी, इंजीनियर, पेंशनर्स, कामगार एकजुट होकर सरकार को वापस लेने पर मजबूर करें।

निष्कर्ष
बिजली एक ऐसी बुनियादी सुविधा है जो आम नागरिक, किसान, उद्योग — हर किसी की ज़िन्दगी से जुड़ी है। जब बिजली का क्षेत्र निजीकरण की ओर बढ़ेगा, तो सिर्फ आर्थिक गणित नहीं बदलने वाला — बल्कि जनता, कर्मचारियों और सामाजिक संरचना पर गहरा असर पड़ेगा।
आज 27 लाख से अधिक बिजली कर्मियों का यह प्रदर्शन सिर्फ एक हड़ताल नहीं — यह एक चेतावनी है। यह सरकार, नीति निर्माताओं, और आम जनता दोनों को सोचने के लिए मजबूर करता है: कितनी तेजी से विकास, निजीकरण और कमर्शियलाइजेशन के साथ समाज-कल्याण, सेवाओं की गारंटी, और आम जनता की भलाई की गारंटी खो रही है।






