हिंदुओं से कहा हमें इसे रोकने के लिए प्रयास पहले अपने घरों और परिवारों से शुरू करना होगा|
आरएसएस (RSS) प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के संबोधन और “लव जिहाद” जैसे संवेदनशील विषयों पर उनके विचारों को अक्सर पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक जागरूकता के दृष्टिकोण से देखा जाता है। आपने जिस विशिष्ट संदर्भ की बात की है वह मुख्य रूप से उनके द्वारा धर्म जागरण समन्वय और विभिन्न पारिवारिक प्रबोधन कार्यक्रमों के दौरान दिए गए संदेशों से प्रेरित है।
डॉ. मोहन भागवत का आह्वान – “परिवर्तन घर से शुरू होता है”
डॉ. मोहन भागवत ने कई अवसरों पर जैसे उत्तराखंड के हल्द्वानी में या नागपुर के विजयादशमी उत्सवों में यह स्पष्ट किया है कि समाज में होने वाली किसी भी विसंगति को केवल नारों या विरोध प्रदर्शनों से नहीं रोका जा सकता।
उन्होंने “लव जिहाद” जैसे मुद्दों पर हिंदू समाज को आत्मचिंतन करने की सलाह दी है।
यह कहाँ और क्यों कहा गया
डॉ. भागवत ने अक्सर ‘कुटुंब प्रबोधन’ (Family Awakening) कार्यक्रमों में इस बात पर जोर दिया है। उनका तर्क है कि जब तक हिंदू समाज अपने सांस्कृतिक मूल्यों को अगली पीढ़ी तक नहीं पहुँचाएगा तब तक युवा भ्रमित रहेंगे।
मुख्य कारण
संस्कारों का अभाव – भागवत जी का मानना है कि आधुनिकता की दौड़ में परिवार अपने बच्चों को ‘धर्म’ और ‘स्वत्व’ (Self-identity) की शिक्षा देना भूल गए हैं।
संवाद की कमी – माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद की कमी के कारण युवा बाहरी प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
“अपने घर से शुरू करें” कहने का अर्थ क्या है
जब डॉ. भागवत कहते हैं कि “हमें इसे अपने घरों से शुरू करना होगा” तो उनके कहने के गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ होते हैं
- मूल्यों का सुदृढ़ीकरण -हिंदू धर्म के प्रति गौरव और उसकी वैज्ञानिकता को बच्चों को घर पर ही सिखाया जाना चाहिए। यदि बच्चा अपनी जड़ों से जुड़ा है तो वह किसी भी प्रलोभन या ‘धर्मांतरण’ के प्रयासों के आगे नहीं झुकेगा।
- सप्ताह में एक बार पारिवारिक मिलन -उन्होंने सुझाव दिया है कि परिवारों को सप्ताह में कम से कम एक बार एक साथ बैठकर भोजन करना चाहिए और अपने पूर्वजों, इतिहास और संस्कृति पर चर्चा करनी चाहिए।
- स्वयं का आचरण -बच्चे उपदेश से नहीं बल्कि माता-पिता के आचरण से सीखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं अपनी संस्कृति का सम्मान करते हैं तो बच्चे स्वाभाविक रूप से उसका अनुसरण करेंगे।
हिंदुओं से पहले यह प्रयास करने को क्यों बोला गया?
भागवत जी का यह दृष्टिकोण ‘रक्षात्मक’ होने के बजाय ‘सुधारात्मक’ है। उन्होंने हिंदुओं को पहले यह प्रयास करने को इसलिए कहा क्योंकि
- जड़ें मजबूत करना-किसी बाहरी हमले (सांस्कृतिक या धार्मिक) को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका खुद को अंदर से मजबूत करना है।
- दोषारोपण बनाम समाधान -केवल दूसरों पर दोष मढ़ने से समस्या हल नहीं होती। यदि हमारे अपने घर के दरवाजे खुले हैं या वहां मूल्यों की कमी है तो सेंधमारी आसान हो जाती है।
- महिला सशक्तिकरण और जागरूकता -आरएसएस प्रमुख का मानना है कि हिंदू बेटियों को केवल पाबंदियों में नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें इतना जागरूक और शिक्षित बनाना चाहिए कि वे सही और गलत के बीच का अंतर स्वयं पहचान सकें।
- लव जिहाद और सामाजिक सुरक्षा लव जिहाद शब्द का प्रयोग अक्सर उस परिस्थिति के लिए किया जाता है जहाँ छल बल या प्रलोभन के माध्यम से विवाह के बहाने धर्मांतरण किया जाता है। डॉ. भागवत के अनुसार इसे रोकने के लिए कानून अपना काम करेंगे लेकिन समाज को अपनी भूमिका निभानी होगी।
सामाजिक समरसता और सुरक्षा का मॉडल
इस मॉडल के तीन मुख्य स्तंभ हैं-
- शिक्षा (Education) – केवल किताबी ज्ञान नहीं बल्कि नैतिक शिक्षा।
- संस्कार (Sanskar) – घर के बुजुर्गों द्वारा दी गई सीख।
- जागरूकता (Awareness) – इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में चल रहे खतरों के प्रति सचेत रहना।
मुख्य संदेश
- अपनी संस्कृति पर गर्व करें।
- परिवार को प्राथमिकता दें।
- बेटियों और बेटों दोनों को समान रूप से जागरूक करें।
- संवाद के माध्यम से विश्वास का वातावरण बनाएं।
आह्वान का उद्देश्य
डॉ. मोहन भागवत के इस आह्वान का उद्देश्य एक ऐसा समाज बनाना है जो मानसिक रूप से इतना स्वतंत्र और सांस्कृतिक रूप से इतना समृद्ध हो कि उसे किसी बाहरी प्रभाव से डरने की आवश्यकता न पड़े।
क्या यह किसी समुदाय के खिलाफ है
डॉ. भागवत ने बार-बार कहा है कि “हमारा किसी से विरोध नहीं है, बल्कि हम अपनी रक्षा के लिए संगठित हो रहे हैं।” उनके भाषणों का सार यह है कि हिंदू समाज को अपनी कमजोरी को दूर करना होगा ताकि कोई उसका अनुचित लाभ न उठा सके।






