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नक्सलवाद के खात्मे की दिशा- मध्य प्रदेश के जंगलों में बदल रहा समीकरण,नक्सल मोर्चे पर ऐतिहासिक पलटवार

नक्सलवाद
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 7, 2025 6:27 अपराह्न
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मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी जिलों बालाघाट, मंडला और सिवनी के घने जंगल इन दिनों एक बड़े बदलाव के गवाह बन रहे हैं। सालों तक गोलियों की गूँज, धमाकों की प्रतिध्वनि और डर की परछाइयों में जीने वाले इन इलाकों में अचानक एक नए दौर की शुरुआत दिखने लगी है। नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में सुरक्षा बलों ने जितना दबाव पिछले कुछ महीनों में बनाया है, उसके परिणाम अब खुलकर सामने आने लगे हैं।

MP नक्सलवाद

सबसे बड़ी बात यह है कि जिन चेहरों के बारे में सुरक्षा एजेंसियाँ वर्षों से फाइलें पलटती रहीं, जिन पर लाखों का इनाम था और जिनकी तलाश में जंगल की पगडंडियाँ चप्पे-चप्पे तक खंगाली गईं—वे अब खुद हथियार डालने को मजबूर होते दिख रहे हैं। 77 लाख तक के इनामी हार्डकोर नक्सलियों का सरेंडर करने का निर्णय इस पूरे क्षेत्र को एक नई कहानी की ओर ले जा रहा है।

जंगल की खामोशी में छिपी हलचल,सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क

पिछले कुछ महीनों में सुरक्षा बलों ने ऑपरेशन की रणनीति पूरी तरह बदल दी है। जहाँ पहले सिर्फ परंपरागत सर्च ऑपरेशन होते थे, वहीं अब आधुनिक ड्रोन सर्विलांस, रूट मैपिंग, थर्मल सेंसर और स्थानीय मुखबिर नेटवर्क को एक साथ जोड़ा गया है। जंगल की गहराई में नक्सलियों की हर एक गतिविधि पर नज़र रखी जा रही है, कि कौन किस दिशा में जा रहा है, किस इलाके में मीटिंग हुई, कहाँ अस्थायी शिविर लगाया गया, किस रास्ते से राशन पहुँचता था इन सबका एक विस्तृत डेटा तैयार किया गया।

क्या निकला नतीजा

नतीजा यह हुआ कि नक्सली कैडर खुद को घिरा हुआ महसूस करने लगा। सप्लाई लाइन टूटने लगी, दवाइयाँ और राशन मिलना मुश्किल होने लगा और जमीनी नेटवर्क कमजोर पड़ता गया।

ग्रामीणों की बदली दुनिया, ‘अब रात के बाद दहशत नहीं’

जिस इलाके में सूर्य ढलते ही अजीब सा सन्नाटा उतर आता था, वहाँ अब लोग रात में भी निश्चिंत होकर निकलते दिख जाते हैं। गाँवों के चौक-चौराहों पर अब विकास की बातें होती हैं—कहाँ सड़क बन रही है, किस दिन स्वास्थ्य शिविर लगा था, अगले महीने किस गाँव में बिजली लाइन जाएगा।

कई ग्रामीणों ने बताया कि पहले नक्सलियों के डर से वे सरकारी योजनाओं का लाभ लेने भी हिचकते थे। स्कूलों पर कब्ज़ा, पंचायत भवनों में रात के ठिकाने, और जरूरी वस्तुओं की जबरन वसूली जैसे काम आम थे। लेकिन पिछले कुछ महीनों में हालात इतने बदल गए कि स्कूलों की उपस्थिति बढ़ गई है, टीचर भी नियमित आने लगे हैं और पंचायतों की बैठकों में पहले से ज्यादा लोग हिस्सा लेते हैं।

सरेंडर करने वाले नक्सलियों की कहानी‘अब जंगल में नहीं बचा जीवन

जब आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को पुलिस लाइन में पेश किया गया, तो उनके चेहरों पर कई वर्षों की थकान साफ झलक रही थी। उनमें से कई ने खुलकर माना कि जंगल की जिंदगी अब पहले जैसी नहीं रही। “सप्लाई टूट गई खाना नहीं मिलता था। ऊपर के नेताओं का व्यवहार बदल गया। आदिवासी परिवार हमें अब शरण देने को तैयार नहीं होते थे। कोई रास्ता नहीं बचा था…” एक सरेंडर किए नक्सली ने धीमी आवाज़ में इतना भर कहा।

इन नक्सलियों में वे नाम भी शामिल हैं जिन पर लाखों का इनाम था और जो पिछले वर्षों में सुरक्षा बलों को कई बार चकमा दे चुके थे। लेकिन अब उन्होंने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला कर लिया है। इसके साथ ही सरकार की तरफ से मिलने वाले पुनर्वास पैकेज कौशल प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और बेहतर जीवन की संभावना ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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जंगल में सर्च ऑपरेशन अभी भी जारी ‘मुठभेड़ों का खतरा बरकरार’

हालाँकि आत्मसमर्पण की इस लहर ने सुरक्षा एजेंसियों की पीठ थपथपाई है, लेकिन खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। जानकारी के अनुसार जंगल के कुछ गहरे हिस्सों में 20–25 सदस्यों की छोटी-छोटी टीमें अब भी सक्रिय हैं।

कुछ हिस्सों में अब भी अवशेष

ताज़ा पदचिन्ह,रात में जलाए गए छोटे चूल्हे,छिपाए गए राशन के पैकेट और हथियारों के अस्थायी ठिकाने बरामद हुए हैं। इससे स्पष्ट है कि नक्सलवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि कुछ हिस्सों में उसका अवशेष अब भी छुपा बैठा है और मौक़ा मिलने पर वापस सक्रिय होने की कोशिश कर सकता है।
इसी कारण सुरक्षा बलों ने अपने ऑपरेशनों की गति और बढ़ा दी है। कोबरा, STF और स्थानीय पुलिस की संयुक्त टीमें लगातार जंगलों में घूम रही हैं। रात के समय मूवमेंट को रोकने के लिए ड्रोन और थर्मल तकनीक सक्रिय रूप से इस्तेमाल की जा रही है।

राज्य सरकार की घोषणा,‘टयह निर्णायक जीत की है शुरुआत

राज्य सरकार इसे नक्सल मोर्चे पर निर्णायक मोड़ मान रही है। अधिकारियों का दावा है कि आने वाले महीनों में और भी नक्सली हथियार डालने को मजबूर होंगे।

सरकार का यह है तर्क-

सड़कें,पुल,मोबाइल,टावर.बिजली,स्वास्थ्य योजनाएँऔर.शिक्षाका तेजी से विस्तार ही नक्सलवाद के ताबूत में अंतिम कील साबित होगा। वहीं मुख्यमंत्री कार्यालय ने साफ कहा है कि आत्मसमर्पण सिर्फ शुरुआत है। लक्ष्य है इस पूरे इलाके को स्थायी शांति देना और विकास को हर गाँव तक पहुँचाना।

मध्यप्रदेश की ‘त्रिकोण रणनीति’ सुरक्षा, विकास और संवाद

विशेषज्ञ इसे “त्रिकोण रणनीति” कहते हैं, जिसके तीन स्तंभ हैं लगातार सुरक्षा दबाव, तेज़ विकास कार्य,मुख्यधारा में शामिल होने के लिए आसान और विश्वसनीय रास्ता।

इन्हीं तीन मोर्चों पर प्रदेश समान गति से काम कर रहा है। यही कारण है कि मध्यप्रदेश कानक्सल-प्रभावित क्षेत्र आज अपने इतिहास के सबसे अहम मोड़ पर पहुँच गया है।

अगर आने वाले महीनों में यह गति बनी रहती है, तो संभव है कि बालाघाट-मंडला का यह पूरा इलाका नक्सलवाद की पकड़ से हमेशा के लिए मुक्त हो जाए। जंगल बदल रहे हैं।और उम्मीद है कि इस बदलाव की गूंज आने वाली पीढ़ियाँ भी सुनेंगी।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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