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ओशो (Osho) जन्मदिवस पर विशेष : अवतरण से समाधि तक का पूरा सफर

ओशो जन्मदिवस
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 11, 2025 10:02 पूर्वाह्न
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प्रारंभिक जीवन : कुशीनगर के पास एक छोटे गाँव से शुरुआत

    आचार्य रजनीश, जिन्हें बाद में पूरी दुनिया ओशो के नाम से जानने लगी, का जन्म 11 दिसंबर 1931 को मध्यप्रदेश के रायसेन ज़िले के एक छोटे से गाँव कुचवाड़ा में हुआ। संयुक्त परिवार में जन्मे ओशो नौ भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। बचपन से ही वे असाधारण जिज्ञासा, अक्खड़ स्वतंत्रता और समाज के बने-बनाए नियमों को चुनौती देने वाली आदतों के लिए पहचाने जाते थे।
    कहते हैं कि बचपन में ही वे मृत्यु, आत्मा, स्वतंत्रता और अस्तित्व जैसे सवालों पर गहराई से विचार करते थे, और इन्हीं सवालों ने आगे चलकर उनकी दर्शन-यात्रा की दिशा तय की।

    ओशो आचार्य रजनीश

    किशोरावस्था : मौत के अनुभव ने बदल दिया जीवन

      जब ओशो नौ वर्ष के थे, उनकी दादी का देहांत हुआ। इस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया और मृत्यु के रहस्य को जानने की प्यास उनमें और गहरी हो गई। यही समय था जब वे घंटों अकेले बैठकर ध्यान लगाते, नदी किनारे घूमते और प्रकृति के प्रश्नों से संवाद करते।
      स्कूल-कॉलेज के दिनों में भी वे बहसों में अजेय माने जाते। परंपरा के विरुद्ध तर्क रखने में उनका कोई जोड़ नहीं था। उनके शिक्षक भी मानते थे कि यह छात्र साधारण नहीं है।

      विश्वविद्यालय काल : विद्रोह और बुद्धि का विस्फोट

        ओशो ने जबलपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र की पढ़ाई की। इस दौरान उनके विचारों ने पहली बार शक्तिशाली रूप लिया। कॉलेजों में वे धर्म, समाज और राजनीति की रूढ़ियों पर खुलकर प्रहार करते।
        उन्होंने लगभग हर विचारधारा—मार्क्सवाद, फ्रीडम, आत्मा, ध्यान, विज्ञान—पर खुली बहसें कीं। 1957 में वे रायपुर के एक कॉलेज में दर्शनशास्त्र के व्याख्याता बने और अपने साहसी विचारों से जल्दी ही चर्चित (और विवादित) हो गए।

        आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत : वक्तृत्व से विश्व-परिवर्तन तक

          1960 का दशक ओशो की ज़िंदगी में क्रांतिकारी रहा। वे देशभर में यात्रा कर उपनिषदों, गीता, वेदांत, जीवन-कला और प्रेम के विषय पर प्रवचन देने लगे। उनके भाषणों में तार्किकता, काव्यात्मकता और आध्यात्मिक क्रांति का अनोखा मेल था।
          ओशो कहते थे—“धर्म कोई बंधन नहीं, बल्कि स्वतंत्रता है।” उनके प्रवचनों में हजारों लोग उमड़ने लगे। वे अपने विचारों में अद्भुत पारदर्शिता और बौद्धिक साहस रखते थे,जो उन्हें सामान्य आध्यात्मिक गुरुओं से बिल्कुल अलग बनाता था।

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          पुणे आश्रम की स्थापना : नई आध्यात्मिक प्रयोगशाला

            1974 में ओशो पुणे आए और यहाँ शिविर, ध्यान तकनीक और नयी आध्यात्मिक पद्धतियों की शुरुआत की।
            इन्हीं वर्षों में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध डायनेमिक मेडिटेशन का विकास किया—एक ऐसी तकनीक जिसमें शरीर, भावनाएँ, श्वास और ऊर्जा को मुक्त कर मन को गहन मौन की अवस्था तक ले जाया जाता है।
            पुणे आश्रम शीघ्र ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध होने लगा। यहाँ पश्चिमी देशों से हजारों साधक आने लगे। ध्यान को आधुनिक, वैज्ञानिक और सहज बनाने का श्रेय ओशो को ही दिया जाता है।

            अमेरिका प्रस्थान : रजनीशपुरम का निर्माण और विवाद

              1981 में ओशो स्वास्थ्य कारणों से अमेरिका गए और वहाँ ओरेगॉन में उनका विशाल कम्यून रजनीशपुरम स्थापित किया गया। यह एक अनोखा प्रयोग था—एक ऐसा शहर जहाँ लोग ध्यान, प्रेम, स्वतंत्रता और आत्म-अन्वेषण के साथ रहते थे। रजनीशपुरम तेज़ी से बढ़ा और इसकी लोकप्रियता ने अमेरिकी राजनीति, मीडिया और स्थानीय प्रशासन को चिंतित कर दिया। जल्दी ही कम्यून विवादों में घिर गया—भूमि, राजनीति और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर गंभीर मतभेद उत्पन्न हुए। आख़िरकार 1985 में अमेरिकी सरकार ने ओशो को गिरफ्तार किया। कई महीनों के कानूनी संघर्ष के बाद उन्हें देश छोड़ने का आदेश मिला।

              विश्व-यात्रा : निर्वासन से आध्यात्मिक संदेश तक

                अमेरिका से निर्वासित होने के बाद ओशो कई देशों में गए, लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण उन्हें स्थायी रूप से कहीं ठहरने नहीं दिया गया। फिर भी हर देश में उनके विचारों को सुनने वाले लाखों लोग थे। इस अवधि में उनका भाषण और भी गहरा, शांत और अस्तित्व के अनुभव से भरा हुआ दिखाई देता है।

                पुणे वापसी और अंतिम वर्ष : मौन की गहराई

                  1987 में ओशो फिर से पुणे लौटे। यहाँ उन्होंने अपने प्रवचनों को नया रूप दिया—उनके भाषण सरल होते गए, लेकिन अनुभवात्मक और ध्यानपूर्ण। इस समय उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा। वे अक्सर कहते—“मेरा काम अब शब्दों में नहीं, ऊर्जा में है।”
                  उनकी उपस्थिति ही एक प्रकार का मौन-ध्यान बन चुकी थी।पुणे आश्रम फिर से अंतरराष्ट्रीय ध्यान-केंद्र बन गया।

                  अंतिम क्षण : ओशो की विदाई, लेकिन विचारों की अमरता

                    19 जनवरी 1990 को ओशो का शरीर छोड़ गया। उनकी अंतिम वसीयत जैसे शब्द माने जाते हैं—
                    “मैंने अपना काम कर दिया है। अब तुम स्वयं प्रकाश बनो।”उनकी समाधि पर एक प्रसिद्ध पंक्ति लिखी है—
                    “कभी पैदा नहीं हुए, कभी मरे नहीं। बस इस पृथ्वी पर कुछ समय के लिए आए।”आज ओशो की पुस्तकों का अनुवाद दुनिया की 60 से अधिक भाषाओं में उपलब्ध है। ध्यान, स्वतंत्रता और प्रेम पर उनके विचार आज भी वैश्विक स्तर पर लाखों लोगों को प्रेरित करते हैं।

                    ओशो—एक विचार, जो समय से परे है

                    ओशो का जीवन संघर्ष, विद्रोह, मौन और आत्म-अन्वेषण की अनूठी यात्रा थी।वे एक गुरु भी थे और एक विद्रोही भी।वे आध्यात्मिक थे लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि रखते थे।उनका संदेश आज भी यही है—
                    “अपने भीतर झाँको, तुम्हें वही मिलेगा जिसकी तुम तलाश कर रहे हो।”

                    Dr Pankaj Sharma

                    fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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