कांग्रेस नेता और पूर्व राजनयिक शशि थरूर के एक बयान ने देश की राजनीति और कूटनीति दोनों हलकों में हलचल मचा दी है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रधानमंत्री की हार दरअसल भारत की हार होती है, क्योंकि विदेश नीति किसी एक राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि पूरे देश की साझा जिम्मेदारी होती है। थरूर का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत की विदेश नीति, वैश्विक नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय छवि को लेकर देश के भीतर तीखी बहस चल रही है।
थरूर लंबे समय तक संयुक्त राष्ट्र में उच्च पदों पर रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकार माने जाते हैं। उनके शब्दों को सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक अनुभवी राजनयिक की चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। उनका कहना है कि जब भारत का प्रधानमंत्री किसी वैश्विक मंच पर जाता है, तो वह किसी पार्टी का नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए वहां मिली सफलता या असफलता का असर देश की प्रतिष्ठा पर पड़ता है।
विदेश नीति पर दलगत राजनीति से ऊपर उठने की जरूरत
शशि थरूर ने अपने बयान में साफ तौर पर कहा कि विदेश नीति को घरेलू राजनीति का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में निरंतरता, स्थिरता और परिपक्वता सबसे अहम होती है। अगर हर सरकार अपनी विचारधारा के अनुसार विदेश नीति को पूरी तरह बदलने लगे, तो इससे दुनिया में भारत की विश्वसनीयता कमजोर होती है।
थरूर के अनुसार, लोकतंत्र में सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन राष्ट्र की पहचान और उसके हित स्थायी होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब विपक्ष विदेश नीति के मुद्दों पर सरकार की आलोचना करता है, तो उसे भी जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए। आलोचना होनी चाहिए, लेकिन वह राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर हो, न कि सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए। उनका मानना है कि विदेश नीति पर एक न्यूनतम राष्ट्रीय सहमति होनी चाहिए, जिससे दुनिया को यह संदेश जाए कि भारत अपने मूल कूटनीतिक सिद्धांतों पर एकजुट है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रधानमंत्री की भूमिका
थरूर ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि प्रधानमंत्री की भूमिका अंतरराष्ट्रीय मंच पर अत्यंत संवेदनशील होती है। जब प्रधानमंत्री किसी वैश्विक सम्मेलन, द्विपक्षीय बैठक या बहुपक्षीय मंच पर बोलते हैं, तो उनके शब्द पूरे देश की आवाज माने जाते हैं। ऐसे में अगर वहां किसी तरह की कूटनीतिक असफलता होती है, तो उसका असर केवल सरकार या प्रधानमंत्री तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भारत की साख पर पड़ता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि वैश्विक राजनीति में प्रतीकात्मकता का बहुत महत्व होता है। किसी प्रस्ताव का पास न होना, किसी पहल को पर्याप्त समर्थन न मिलना या किसी मुद्दे पर भारत का अलग-थलग पड़ जाना, ये सब बातें अंतरराष्ट्रीय समुदाय में संदेश देती हैं। थरूर के मुताबिक, ऐसे मामलों में यह कहना गलत होगा कि यह किसी एक नेता या पार्टी की हार है; वास्तव में यह भारत की सामूहिक स्थिति को कमजोर करता है।
बयान के मायने और भविष्य की दिशा
शशि थरूर का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत खुद को एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। आर्थिक विकास, सामरिक ताकत और कूटनीतिक सक्रियता के साथ भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में विदेश नीति को लेकर छोटी-छोटी राजनीतिक खींचतान देश के दीर्घकालिक हितों को नुकसान पहुंचा सकती है।
थरूर का संदेश साफ है कि विदेश नीति में परिपक्वता और राष्ट्रीय एकता जरूरी है। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी संकेत दिया कि सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को इस मुद्दे पर आत्ममंथन करना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन जब बात देश की अंतरराष्ट्रीय छवि की हो, तो एक साझा दृष्टिकोण अपनाना समय की मांग है।
कुल मिलाकर, “प्रधानमंत्री की हार, भारत की हार” वाला थरूर का बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह उस सोच को चुनौती देता है जिसमें विदेश नीति को दलगत चश्मे से देखा जाता है। यह बयान देश की राजनीति को यह याद दिलाता है कि वैश्विक मंच पर भारत की मजबूती तभी संभव है, जब उसकी कूटनीति दलों से ऊपर उठकर राष्ट्र के व्यापक हितों पर आधारित हो।







