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संसद पर आतंकी हमले की 24वीं बरसी: शहीदों को देश का नमन, लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प दोहराया

संसद पर आतंकी हमले की 24वीं बरसी
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 17, 2025 2:52 अपराह्न
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नई दिल्ली। आज देश ने संसद पर हुए आतंकी हमले की 24वीं बरसी पर उन वीर सपूतों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने 13 दिसंबर 2001 को अपने प्राणों की आहुति देकर भारतीय लोकतंत्र की रक्षा की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने शहीदों को नमन किया और आतंकवाद के खिलाफ एकजुट रहने का संदेश दिया। संसद परिसर सहित देशभर में स्मृति कार्यक्रमों के जरिए शहीदों की कुर्बानी को याद किया गया।

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लोकतंत्र पर हमला, देश की एकजुटता की परीक्षा

13 दिसंबर 2001 का दिन भारतीय इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। उस दिन आतंकियों ने देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था—संसद—को निशाना बनाया। उनका उद्देश्य केवल एक इमारत पर हमला करना नहीं था, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संप्रभुता को चुनौती देना था। सुरक्षा बलों की तत्परता और अदम्य साहस ने एक बड़े नुकसान को टाल दिया, लेकिन इस दौरान कई जांबाज़ शहीद हो गए। उनकी शहादत ने यह साबित कर दिया कि भारत अपने लोकतंत्र की रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार है।

पीएम मोदी का संदेश: शहीदो का बलिदान अमर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बरसी के अवसर पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि संसद पर हमला करने वालों का मंसूबा भारत की आत्मा को झकझोरना था, लेकिन देश के वीर सुरक्षाकर्मियों ने अपने साहस से उसे नाकाम कर दिया। उन्होंने कहा कि शहीदों का बलिदान आने वाली पीढ़ियों को लोकतंत्र, संविधान और राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए प्रेरित करता रहेगा। प्रधानमंत्री ने आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को दोहराते हुए देशवासियों से एकजुट रहने का आह्वान किया।

राहुल गांधी और विपक्ष का नमन

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी संसद हमले में शहीद हुए जवानों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि यह हमला सिर्फ संसद पर नहीं, बल्कि भारत के विचार और संविधान पर था। राहुल गांधी ने शहीदों के परिवारों के प्रति संवेदना जताते हुए कहा कि देश उनकी कुर्बानी को कभी नहीं भूलेगा। अन्य विपक्षी नेताओं ने भी सोशल मीडिया और सार्वजनिक वक्तव्यों के जरिए शहीदों को याद किया और आतंकवाद के खिलाफ साझा संकल्प की आवश्यकता पर बल दिया।

संसद परिसर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम

बरसी के मौके पर संसद परिसर में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों ने मौन रखकर शहीदों को नमन किया। इस दौरान संसद की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई गई। कार्यक्रम में यह संदेश स्पष्ट था कि राजनीतिक मतभेद चाहे जितने भी हों, राष्ट्र की सुरक्षा और लोकतंत्र की रक्षा के मुद्दे पर पूरा देश एक है।

सुरक्षा बलों का अद्वितीय साहस

संसद हमले के दौरान जिन सुरक्षाकर्मियों ने आतंकियों से मुकाबला किया, उनकी बहादुरी आज भी मिसाल है। सीमित समय में लिए गए निर्णय, त्वरित कार्रवाई और जान की परवाह किए बिना कर्तव्य निभाने का जज़्बा ही वह कारण था, जिसने देश को एक बड़े संकट से बचाया। आज उनकी शहादत को याद करते हुए यह बात फिर सामने आई कि सुरक्षा बल केवल सीमा पर ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की हर परत की रक्षा में तैनात रहते हैं।

हमले के बाद बदली सुरक्षा रणनीति

2001 के हमले ने देश की सुरक्षा रणनीति को नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया। इसके बाद संसद, सरकारी भवनों और महत्वपूर्ण संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव किए गए। इंटेलिजेंस समन्वय, तकनीकी निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया बलों को मजबूत किया गया। बरसी के मौके पर कई विशेषज्ञों ने कहा कि बीते वर्षों में सुरक्षा ढांचे में सुधार हुआ है, लेकिन बदलते खतरे के मद्देनज़र सतर्कता बनाए रखना जरूरी है।

आतंकवाद के खिलाफ राष्ट्रीय संकल्प

संसद हमले की बरसी केवल अतीत को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लिए संकल्प लेने का अवसर भी है। नेताओं ने अपने संदेशों में कहा कि आतंकवाद किसी एक दल या सरकार की चुनौती नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की साझा जिम्मेदारी है। लोकतांत्रिक मूल्यों, संविधान और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा तभी संभव है जब समाज आतंक के खिलाफ एकजुट रहे।

शहीदों की स्मृति और आने वाली पीढ़ियाँ

आज के दिन स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संगठनों ने भी स्मृति कार्यक्रम आयोजित किए। युवाओं को यह समझाने की कोशिश की गई कि लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं, बल्कि उसकी रक्षा के लिए निरंतर जागरूकता और जिम्मेदारी की जरूरत होती है। शहीदों की कहानियाँ आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाती हैं कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र की कीमत क्या होती है।

लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक

24वीं बरसी पर यह स्पष्ट संदेश उभरा कि संसद पर हमला करने वाले अपने इरादों में सफल नहीं हो सके। भारत का लोकतंत्र पहले से अधिक मजबूत होकर उभरा है। शहीदों की कुर्बानी ने देश को यह सिखाया कि संकट की घड़ी में एकता ही सबसे बड़ा हथियार है। आज जब देश उन्हें नमन कर रहा है, तो यह केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प भी है—एक ऐसा संकल्प, जो समय के साथ और मजबूत होता जाएगा।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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