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“नागरिकता के शक ने छीना सपना” — बांग्लादेश भेजी गई और फिर भारत लौटी सुनाली ख़ातून की आपबीती

भारत लौटी सुनाली ख़ातून की आपबीती
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 20, 2025 12:12 अपराह्न
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सुनाली ख़ातून की ज़िंदगी बीते कुछ महीनों में ऐसे मोड़ से गुज़री है, जिसकी कल्पना उन्होंने कभी नहीं की थी। दिल्ली की गलियों में रोज़गार की तलाश, अचानक हिरासत, फिर बांग्लादेश भेजे जाने का दर्द और उसके बाद दोबारा भारत वापसी—यह कहानी सिर्फ़ एक महिला की नहीं, बल्कि पहचान, नागरिकता और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े उस संकट की है, जो आज भी कई लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित कर रहा है। सुनाली अब साफ़ शब्दों में कहती हैं—“मैं कभी दिल्ली वापस नहीं जाऊँगी।”

भारत लौटी सुनाली ख़ातून की आपबीती

दिल्ली में सपनों की तलाश और अचानक बदली ज़िंदगी

सुनाली ख़ातून मूल रूप से पूर्वी भारत के सीमावर्ती क्षेत्र से ताल्लुक रखती हैं। रोज़गार और बेहतर भविष्य की उम्मीद में वह कुछ साल पहले दिल्ली पहुँची थीं। घरेलू काम और छोटे-मोटे रोज़गार के ज़रिये उन्होंने अपनी ज़िंदगी को किसी तरह पटरी पर लाने की कोशिश की। दिल्ली उनके लिए सिर्फ़ एक शहर नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भर बनने का सपना था।

लेकिन यह सपना अचानक उस दिन टूट गया, जब एक नियमित जांच के दौरान उनसे दस्तावेज़ मांगे गए। सुनाली के पास जो काग़ज़ात थे, उन्हें पर्याप्त नहीं माना गया। कुछ ही घंटों में उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल गई। उन्हें हिरासत में लिया गया और यह कहा गया कि वह अवैध रूप से भारत में रह रही हैं। सुनाली बार-बार कहती रहीं कि वह भारतीय हैं, यहीं पैदा हुईं, यहीं पली-बढ़ीं, लेकिन उनकी बात सुनी नहीं गई। उनके लिए सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब उन्हें बताया गया कि उन्हें बांग्लादेश भेजा जाएगा। सुनाली के शब्दों में, “मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं बांग्लादेश कैसे हो सकती हूँ। मैंने तो कभी वह देश देखा भी नहीं था।”

बांग्लादेश की ज़मीन पर अजनबी होने का दर्द

सुनाली ख़ातून को जब बांग्लादेश भेजा गया, तो वहां की ज़मीन उनके लिए पूरी तरह अजनबी थी। भाषा मिलती-जुलती थी, चेहरे भी जाने-पहचाने जैसे लगते थे, लेकिन अपनापन बिल्कुल नहीं था। न कोई पहचान, न कोई सहारा। स्थानीय प्रशासन ने भी साफ़ कर दिया कि वह बांग्लादेश की नागरिक नहीं हैं।

उन दिनों को याद करते हुए सुनाली की आंखें भर आती हैं। वह कहती हैं कि सबसे ज़्यादा डर उन्हें रातों में लगता था, जब यह समझ नहीं आता था कि अगली सुबह क्या होगा। उनके पास न पैसा था, न कोई अपना। कई बार उन्हें लगा कि शायद उनकी ज़िंदगी यहीं खत्म हो जाएगी।

मानवाधिकार संगठनों और कुछ स्थानीय लोगों की मदद से उनकी बात अधिकारियों तक पहुँची। धीरे-धीरे यह साफ़ होने लगा कि सुनाली को ग़लत तरीके से बांग्लादेश भेजा गया है। जांच-पड़ताल के बाद यह स्वीकार किया गया कि वह बांग्लादेश की नागरिक नहीं हैं और उन्हें भारत लौटने की अनुमति दी जानी चाहिए।

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भारत वापसी, लेकिन डर और टूटे भरोसे के साथ

काग़ज़ी प्रक्रिया पूरी होने के बाद सुनाली ख़ातून की भारत वापसी संभव हो पाई। सीमा पार करते समय उन्हें राहत भी थी और डर भी। राहत इसलिए कि वह उस देश में लौट रही थीं, जिसे वह अपना मानती थीं, और डर इसलिए कि कहीं वही कहानी फिर न दोहराई जाए। भारत लौटने के बाद भी उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। हिरासत का डर, पूछताछ और पहचान साबित करने की लंबी प्रक्रिया—इन सबने उन्हें अंदर से तोड़ दिया। सुनाली कहती हैं, “मैं ज़िंदा तो लौट आई, लेकिन मेरा भरोसा कहीं खो गया।”

इसी अनुभव के बाद उन्होंने तय किया कि वह दोबारा दिल्ली नहीं जाएँगी। दिल्ली उनके लिए अब रोज़गार या सपनों का शहर नहीं, बल्कि उस दर्द की याद बन चुका है, जहां उनकी पहचान पर सवाल उठाया गया। वह अब किसी छोटे शहर या गांव में रहकर साधारण ज़िंदगी जीना चाहती हैं, जहाँ कम से कम उन्हें रोज़-रोज़ अपनी नागरिकता साबित न करनी पड़े।

सुनाली की कहानी और बड़ा सवाल

सुनाली ख़ातून की कहानी कई बड़े सवाल खड़े करती है। आखिर पहचान और नागरिकता के नाम पर किसी व्यक्ति को इतनी आसानी से कैसे बेदखल किया जा सकता है? क्या दस्तावेज़ों की कमी का मतलब यह होना चाहिए कि किसी इंसान की पूरी ज़िंदगी ही संदिग्ध मान ली जाए?

विशेषज्ञों का कहना है कि सीमावर्ती इलाकों से आने वाले गरीब और कम पढ़े-लिखे लोग अक्सर ऐसी प्रक्रियाओं में फंस जाते हैं। उनके पास न तो मजबूत काग़ज़ात होते हैं और न ही कानूनी लड़ाई लड़ने के साधन। ऐसे में प्रशासनिक गलती की कीमत उन्हें अपनी आज़ादी और सम्मान से चुकानी पड़ती है।

सुनाली अब चाहती हैं कि उनकी कहानी सिर्फ़ एक खबर बनकर न रह जाए, बल्कि इससे सिस्टम में बदलाव की पहल हो। वह कहती हैं, “अगर मेरी वजह से किसी और के साथ ऐसा न हो, तो शायद मेरा दर्द थोड़ा कम हो जाए।” आज सुनाली ख़ातून अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित जरूर हैं, लेकिन एक बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट हैं—वह उस शहर में वापस नहीं जाएँगी, जहां उन्होंने खुद को सबसे ज़्यादा बेबस महसूस किया। उनकी कहानी हमें यह याद दिलाती है कि नागरिकता सिर्फ़ काग़ज़ों का सवाल नहीं, बल्कि इंसान की पहचान, सम्मान और सुरक्षा से जुड़ा बुनियादी अधिकार है।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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