डेलीबार्ता,करियर न्यूज-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने शोध की गुणवत्ता और शैक्षणिक ईमानदारी को लेकर बड़ा और सख्त कदम उठाया है। बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (बीआरएबीयू) के दर्जनों शोधार्थियों की पीएचडी थीसिस यूजीसी ने यह कहते हुए वापस कर दी है कि उनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार सामग्री को सीधे कॉपी-पेस्ट किया गया है। जांच में इन थीसिस में 40 प्रतिशत से अधिक प्लेगरिज्म (साहित्यिक चोरी) पाया गया है, जो यूजीसी के मानकों का गंभीर उल्लंघन है।
AI के बढ़ते इस्तेमाल पर UGC की पैनी नजर
बीते कुछ वर्षों में शोध लेखन में एआई टूल्स का चलन तेजी से बढ़ा है। जहां एक ओर ये टूल्स भाषा सुधार और प्रारंभिक संदर्भ के लिए सहायक माने जाते हैं, वहीं कई शोधार्थियों द्वारा इनका गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। यूजीसी के अनुसार, शोध का मूल उद्देश्य मौलिकता और नवाचार है, न कि तकनीक के सहारे तैयार सामग्री को बिना श्रेय दिए प्रस्तुत करना।
इसी क्रम में बीआरएबीयू से भेजी गई पीएचडी थीसिस की जांच के दौरान यह सामने आया कि कई शोधार्थियों ने एआई जनरेटेड कंटेंट को ज्यों-का-त्यों अपनी थीसिस में शामिल कर लिया, जिससे उनकी शोध की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए।
40 प्रतिशत से अधिक प्लेगरिज्म, इसलिए लौटी थीसिस
विश्वविद्यालय सूत्रों के अनुसार, यूजीसी द्वारा अपनाए गए प्लेगरिज्म डिटेक्शन सॉफ्टवेयर में जब इन थीसिस की जांच की गई तो 40 प्रतिशत से अधिक समानता (Similarity Index) पाई गई। यूजीसी के नियमों के मुताबिक, शोध कार्य में सीमित सीमा तक समानता स्वीकार्य हो सकती है, लेकिन 40 प्रतिशत से अधिक चोरी को गंभीर अपराध माना जाता है।
इसी आधार पर यूजीसी ने बीआरएबीयू के दर्जनों शोधार्थियों की थीसिस अस्वीकार करते हुए उन्हें वापस भेज दिया और दोबारा संशोधित एवं मौलिक थीसिस जमा करने का निर्देश दिया।
अब दोबारा लिखनी होगी थीसिस
बीआरएबीयू के प्लेगरिज्म सेल के प्रभारी प्रो. संजय कुमार ने बताया कि जिन शोधार्थियों की थीसिस लौटी है, उन्हें नए सिरे से थीसिस लिखने के लिए कहा गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कदम शोधार्थियों को दंडित करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि शोध की गुणवत्ता सुधारने और अकादमिक ईमानदारी सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
प्रो. संजय कुमार के अनुसार, “यूजीसी के दिशा-निर्देशों का पालन करना सभी विश्वविद्यालयों और शोधार्थियों के लिए अनिवार्य है। जो भी थीसिस प्लेगरिज्म की सीमा पार करती पाई गई है, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।”
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विश्वविद्यालय में बना अलग प्लेगरिज्म सेल
इस पूरे प्रकरण के बाद बीआरएबीयू प्रशासन भी सतर्क हो गया है। कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय ने शोध कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय स्तर पर एक अलग प्लेगरिज्म सेल का गठन किया है। यह सेल अब यूजीसी को भेजे जाने से पहले ही सभी पीएचडी थीसिस को आधुनिक प्लेगरिज्म सॉफ्टवेयर से जांच रहा है।
कुलपति का मानना है कि पहले स्तर पर ही जांच होने से भविष्य में ऐसी स्थिति से बचा जा सकेगा और शोधार्थियों को समय रहते अपनी गलतियां सुधारने का अवसर मिलेगा।
अंग्रेजी थीसिस में ज्यादा पकड़ी गई चोरी
जांच में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। सूत्रों के अनुसार, एआई से सामग्री की सबसे ज्यादा कॉपी अंग्रेजी भाषा में लिखी गई थीसिस में पाई गई है। प्लेगरिज्म सॉफ्टवेयर अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध वैश्विक कंटेंट से तेजी से मिलान कर लेता है, जिससे चोरी तुरंत पकड़ में आ जाती है।
वहीं, हिंदी में लिखी गई थीसिस में अपेक्षाकृत कम प्लेगरिज्म सामने आया है। शिक्षकों का कहना है कि इसका एक कारण यह भी है कि हिंदी में डिजिटल कंटेंट का डेटाबेस अभी अंग्रेजी जितना व्यापक नहीं है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह कोई सुरक्षा कवच नहीं है और भविष्य में हिंदी कंटेंट की जांच भी और सख्त होगी।
UGC के पास है देशभर की थीसिस का रिकॉर्ड
शिक्षकों और प्लेगरिज्म सेल के अनुसार, यूजीसी के पास देशभर के विश्वविद्यालयों से जमा की गई थीसिस का विस्तृत डिजिटल रिकॉर्ड मौजूद है। यही कारण है कि एक विश्वविद्यालय में तैयार की गई थीसिस अगर किसी अन्य शोध से मेल खाती है, तो वह तुरंत पकड़ में आ जाती है।
सेल का कहना है कि जो शोधार्थी वास्तव में मौलिक शोध कर रहे हैं, उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है। कार्रवाई केवल उन्हीं पर हो रही है, जिन्होंने कॉपी-पेस्ट या एआई जनरेटेड कंटेंट को बिना उचित संदर्भ के इस्तेमाल किया है।
शोध की भाषा नहीं, चोरी पर कार्रवाई
इस मामले में एक अहम संदेश यह भी सामने आया है कि यूजीसी की कार्रवाई किसी विशेष भाषा के खिलाफ नहीं है। शिक्षकों के अनुसार, यह धारणा गलत है कि हिंदी में लिखने पर चोरी नहीं पकड़ी जाएगी। असल में कार्रवाई भाषा के आधार पर नहीं, बल्कि प्लेगरिज्म की मात्रा के आधार पर की जा रही है।
जो छात्र अपनी भाषा में मौलिक लेखन कर रहे हैं, वे सुरक्षित हैं, जबकि जो भी किसी भी भाषा में कॉपी-पेस्ट का सहारा ले रहे हैं, उनकी थीसिस अस्वीकृत की जा रही है।
शोधार्थियों के लिए चेतावनी और सीख
यह पूरा घटनाक्रम देशभर के शोधार्थियों के लिए एक चेतावनी की तरह देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि एआई टूल्स का इस्तेमाल केवल सहायक के रूप में किया जाना चाहिए, न कि शोध का विकल्प बनाकर।
शोधार्थियों को चाहिए कि वे अपने विषय पर गहन अध्ययन करें, प्राथमिक स्रोतों का उपयोग करें और यदि किसी संदर्भ या विचार को लिया जाए, तो उसका उचित उल्लेख करें। इससे न केवल उनकी थीसिस स्वीकार होगी, बल्कि शोध की विश्वसनीयता भी बनी रहेगी।
भविष्य में और सख्त होगी जांच
यूजीसी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आने वाले समय में प्लेगरिज्म और एआई के दुरुपयोग पर और सख्त निगरानी रखी जाएगी। नए सॉफ्टवेयर और तकनीकी टूल्स के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि शोध कार्य पूरी तरह मौलिक और गुणवत्ता-युक्त हो।
बीआरएबीयू जैसे विश्वविद्यालयों द्वारा पहले स्तर पर जांच की पहल को भी सकारात्मक कदम माना जा रहा है। इससे न केवल यूजीसी का बोझ कम होगा, बल्कि शोधार्थियों को समय रहते सुधार का अवसर मिलेगा। ऐसे में बीआरएबीयू के दर्जनों शोधार्थियों की पीएचडी थीसिस का यूजीसी द्वारा लौटाया जाना एक स्पष्ट संकेत है कि अब शोध में लापरवाही और तकनीक के गलत इस्तेमाल को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह कदम भले ही कुछ छात्रों के लिए कठिनाई लेकर आया हो, लेकिन दीर्घकाल में यह भारतीय उच्च शिक्षा और शोध की गुणवत्ता को मजबूत करने की दिशा में एक अहम पहल साबित होगा।
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