विशेष संवाददाता | नई दिल्ली
अगस्त 1947 का वह सप्ताह मानव इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया, जब सदियों पुराने भारतीय उपमहाद्वीप के भूगोल को एक स्याही की लकीर ने दो हिस्सों में चीर दिया। ब्रिटिश राज के अंतिम वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन के नेतृत्व में सत्ता हस्तांतरण की जो प्रक्रिया शुरू हुई, उसने न केवल ब्रिटिश साम्राज्य के अंत की घोषणा की, बल्कि आधुनिक युग के सबसे बड़े और खूनी विस्थापन की नींव भी रख दी। यह रिपोर्ट उस दौर के राजनीतिक निर्णयों, प्रशासनिक विफलताओं और मानवीय त्रासदियों का एक विस्तृत लेखा-जोखा है।
माउंटबेटन का आगमन और संक्रमणकालीन चुनौतियाँ
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटेन की आर्थिक कमर टूट चुकी थी। लंदन में बैठी एटली सरकार यह समझ चुकी थी कि अब भारत पर लंबे समय तक शासन करना असंभव है। मार्च 1947 में, लॉर्ड लुई माउंटबेटन को एक विशेष मिशन के साथ भारत भेजा गया—”भारत को सत्ता सौंपना और ब्रिटिश सेना की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करना।” माउंटबेटन जब दिल्ली पहुँचे, तो देश सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। अंतरिम सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच का गतिरोध चरम पर था।
जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और महात्मा गांधी जहाँ एक ओर अखंड भारत के लिए प्रयासरत थे, वहीं मोहम्मद अली जिन्ना ‘दो राष्ट्रों के सिद्धांत’ पर अडिग थे। माउंटबेटन ने अपनी प्रारंभिक बैठकों के बाद ही यह निष्कर्ष निकाल लिया कि गृहयुद्ध को टालने का एकमात्र रास्ता विभाजन ही है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे समाज को बाँटने की थी, जो पिछले कई सौ वर्षों से सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से एक-दूसरे में रचे-बसे थे। राजनीतिक ध्रुवीकरण इतना गहरा चुका था कि समझौतों की गुंजाइश खत्म हो गई थी।
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समयसीमा का संकुचन: 15 अगस्त की जल्दबाजी और राजनैतिक दबाव
माउंटबेटन के कार्यकाल का सबसे विवादास्पद और महत्वपूर्ण निर्णय था—स्वतंत्रता की तिथि को समय से पहले तय करना। मूल रूप से ब्रिटिश संसद ने जून 1948 तक भारत को स्वतंत्र करने का लक्ष्य रखा था। लेकिन माउंटबेटन ने परिस्थितियों की संवेदनशीलता और बढ़ती हिंसा का हवाला देते हुए इस तिथि को लगभग दस महीने पहले खिसकाकर 15 अगस्त 1947 कर दिया। 3 जून 1947 को रेडियो पर इस योजना की घोषणा की गई, जिसे ‘3 जून प्लान’ या ‘माउंटबेटन योजना’ के नाम से जाना गया।
इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग इस जल्दबाजी को भारी तबाही का मुख्य कारण मानता है। मात्र 72 दिनों के भीतर एक विशाल देश की सेना, रेलवे, पुलिस, खजाना और यहाँ तक कि सरकारी दफ्तरों की टाइपराइटर मशीनों तक का बँटवारा करना असंभव कार्य था। इस त्वरित समयसीमा ने प्रशासनिक तंत्र को तैयारी का कोई अवसर नहीं दिया। सीमाओं का निर्धारण करने वाले अधिकारियों से लेकर सुरक्षा बलों तक, हर कोई अनिश्चितता के साये में था। इस निर्णय ने शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण के बजाय एक अराजक भगदड़ की स्थिति पैदा कर दी।
रेडक्लिफ की लकीर: अनिश्चितता के साये में सीमांकन का खेल
जब सर सिरिल रेडक्लिफ को भारत और पाकिस्तान की सीमाओं को खींचने का जिम्मा सौंपा गया, तो उनके पास न तो यहाँ का कोई पूर्व अनुभव था और न ही भौगोलिक समझ। उन्हें पंजाब और बंगाल के उन हिस्सों को अलग करना था जहाँ आबादी मिश्रित थी। बंद कमरों में पुराने नक्शों और अधूरी जनगणना के आँकड़ों के आधार पर रेडक्लिफ ने जो लकीरें खींचीं, उन्होंने लाखों परिवारों के भविष्य को अंधकार में डाल दिया।
सबसे बड़ी प्रशासनिक विफलता यह रही कि सीमा आयोग के निर्णय (रेडक्लिफ अवार्ड) को स्वतंत्रता दिवस के दो दिन बाद, यानी 17 अगस्त 1947 को सार्वजनिक किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि 15 अगस्त को जब लोग आजादी का जश्न मना रहे थे, तब पंजाब और बंगाल के लाखों लोगों को यह पता ही नहीं था कि वे किस देश के नागरिक हैं। कई गाँवों में लोग अपने घरों के बाहर खड़े होकर यह पूछ रहे थे कि वे भारत में हैं या पाकिस्तान में। इस गोपनीयता और देरी ने अफवाहों को जन्म दिया, जिससे उन क्षेत्रों में असुरक्षा और भय का ऐसा वातावरण बना कि पड़ोसी ही पड़ोसी का दुश्मन बन गया।
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मानवीय पलायन और इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी के परिणाम
जैसे ही विभाजन की लकीरें स्पष्ट हुईं, आधुनिक मानव इतिहास का सबसे बड़ा और दर्दनाक विस्थापन शुरू हो गया। लगभग 1.5 करोड़ लोगों ने अपनी जड़ों, अपनी जमीन और अपनी यादों को छोड़कर अनिश्चित भविष्य की ओर कदम बढ़ाए। लोग बैलगाड़ियों, पैदल और ट्रेनों के जरिए सीमाओं के पार जाने लगे। सुरक्षा के नाम पर तैनात बल इस विशाल मानवीय प्रवाह के सामने असहाय और कई जगहों पर पक्षपाती नजर आए।
अमृतसर से लाहौर और लाहौर से दिल्ली जाने वाली ट्रेनें ‘लाशों की गाड़ियाँ’ बन गईं। पंजाब और बंगाल के खेतों में फसलें लहलहा रही थीं, लेकिन उन्हें काटने वाले लोग या तो मार दिए गए थे या शरणार्थी शिविरों में अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हुई हिंसा ने मानवता को शर्मसार कर दिया। माउंटबेटन की भूमिका पर आज भी यह गंभीर सवाल उठता है कि क्या इस भीषण मानवीय क्षति को एक सुव्यवस्थित और लंबी योजना के साथ कम नहीं किया जा सकता था?
विभाजन का प्रभाव केवल 1947 तक सीमित नहीं रहा। इसने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। कश्मीर जैसे अनसुलझे विवाद, संसाधनों के बँटवारे की कड़वाहट और विस्थापन का दर्द आज भी दोनों देशों के रिश्तों में महसूस किया जाता है। माउंटबेटन द्वारा खींची गई वह जल्दबाजी की लकीर आज भी दो राष्ट्रों के बीच एक ऐसी खाई बनी हुई है, जिसे पाटना आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ी चुनौती है। 1947 का यह अध्याय स्वतंत्रता के गौरव और विभाजन की पीड़ा—दोनों का अमिट प्रतीक बना हुआ है।







