आज, 8 दिसंबर 2025 को, वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में संसद में एक विशेष बहस का आयोजन किया गया है। Lok Sabha के शीतकालीन सत्र के दौरान यह बहस देश के इतिहास, संस्कृति और आज के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों में वंदे मातरम् के महत्व को फिर से सामने लाने की कोशिश है।

संसद में क्या हुआ: 10 घंटे की इस बहस की रूपरेखा
प्रदेशों और विचारधाराओं की विविधता वाले भारत में एकता और राष्ट्र-भावना का प्रतीक माना जाने वाला वंदे मातरम् — इसके 150 साल पूरे होने पर संसद ने आज इस गीत पर 10 घंटे की विशेष चर्चा निर्धारित की है।
- बहस की शुरुआत दोपहर 12 बजे हुई, और इसे Narendra Modi ने किया।
- इस बहस में सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री सक्रिय रूप से भाग लेंगे, वहीं विपक्षी दलों से भी कई नेता — जिसके अंतर्गत Indian National Congress (कांग्रेस) के कई वरिष्ठ नेता शामिल हैं — अपनी राय देंगे।
- चर्चा का एजेंडा केवल गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ही नहीं है; वंदे मातरम् की भूमिका, महत्व, उसके सामाजिक-संस्कृतिक अर्थ, और स्वतंत्रता संग्राम में उसका योगदान — इन सब पर विचार होगा।
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PM मोदी के प्रमुख बयाने — वंदे मातरम् का ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व
वंदे मातरम् को सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि उस दौर का “मोर्चा” कहा गया जो ब्रिटिश राज के खिलाफ कई मतभेदों और विचारधाराओं को एक सूत्र में बांधने में कामयाब रहा।
- मोदी ने कहा कि वंदे मातरम् ने विभाजन-नीति (divide and rule) के खिलाफ आवाज़ बुलंद की — खास तौर पर जब बंगाल विभाजन का समय था।
- उन्होंने बताया कि इस गीत ने स्वतंत्रता संघर्ष को एक साझा सांस्कृतिक और भावनात्मक आधार दिया, जिससे विभिन्न राष्ट्र-भक्त दलों और विचारधाराओं के लोग एकजुट हुए।
- इसके अलावा, मोदी ने कुछ हिस्सों — जिन्हें बाद में हटाया या “ओमिट” किया गया — को फिर से याद करने की कोशिश की। इन पंक्तियों को पुनर्जीवित करना उनके लिए symbolic था — एक ऐसा प्रयास जिससे गीत के पूर्ण इतिहास और उसकी मूल भावना को सामने लाया जा सके।
बहस के राजनीतिक आयाम — इतिहास, विरासत और विवाद
हालाँकि ज्यादातर वक्त वंदे मातरम् के गौरव और ऐतिहासिक महत्व पर रहा, लेकिन इस बहस के पीछे एक राजनीतिक सफर और भी नजर आया।
- सरकार की ओर से यह कहा गया कि कांग्रेस के शासनकाल में वंदे मातरम् के कुछ हिस्सों को “मुस्लिम लीग” या धार्मिक-सांप्रदायिक समीकरणों को देखते हुए कम महत्व दिया गया।
- विपक्षी दलों ने इस आरोप का पलटाव किया है। उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, और वंदे मातरम् को सिर्फ एक हिंदू-धार्मिक गीत के रूप में नहीं देखना चाहिए; बल्कि इसे सम्पूर्ण भारतीय पहचान का हिस्सा माना जाना चाहिए। (बहस अभी जारी है — देखना होगा कि ये वाद-विवाद कैसे आगे चलते हैं।)
- इस बहस में यह सवाल भी उठाया गया कि क्या सिर्फ “सांस्कृतिक प्रतीकों” के आधार पर इतिहास को देखा जाए, या हमें उन सभी पहलुओं — धर्म, भाषा, मूल स्वतंत्रता-संघर्ष, बहुलतावाद — को साथ लेकर चलना चाहिए।
वंदे मातरम् — इतिहास, गौरव और आज का संदर्भ
वंदे मातरम् की कहानी सिर्फ एक गीत की कहानी नहीं है — यह दशक दर दशक, पीढ़ी दर पीढ़ी गूँजने वाला संदेश है।
- यह गीत उस समय रचा गया था, जब ब्रिटिश साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी पकड़ मजबूत कर चुका था। उस शोषण, विभाजन और धार्मिक-सांप्रदायिक तनाव के बीच वंदे मातरम् ने एक साझा आवाज़ दी — “भारत माता की जय” — जिसने कई धर्मों और भाषाओं को जोड़ने की कोशिश की।
- 150 साल बाद, जब देश आज फिर नए राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संकटों तथा चुनौतियों से जूझ रहा है, वंदे मातरम् की यह बहस हमें याद दिलाती है कि एकता, सहिष्णुता, और राष्ट्रीय गौरव की भावना कितनी अहम है।
- संसद में आज की यह बहस इसीलिए महत्वपूर्ण है — क्योंकि यह सिर्फ अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के भारत की आत्म-पहचान को फिर से तय करने की कोशिश है।
निष्कर्ष: एक गीत, कई सवाल, और राष्ट्र की आत्म-पुनरावृत्ति
वंदे मातरम् के 150 साल — यह केवल एक सांकेतिक मोड़ है; लेकिन आज की बहस यह दिखाती है कि इतिहास और संस्कृति परिवर्तनशील नहीं — बल्कि सजीव हैं।
संसद की यह बहस हमें यह सोचने का अवसर देती है कि हम कौन हैं — कौन होना चाहते हैं। क्या हम सिर्फ इतिहास को याद करने वाले हैं, या उसकी जिम्मेदारी निभाने वाले भी? क्या हम वंदे मातरम् को सिर्फ गीत मानेंगे, या उसे एक मिशन — एक प्रतीक — समझेंगे जो हमें जोड़ने, समझने और आगे बढ़ने की प्रेरणा दे?
आज का दिन, वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ — सिर्फ एक तिथि नहीं; बल्कि राष्ट्रीय आत्म-चेतना, विचार-विमर्श और नवजीवन का प्रतीक है।






