रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के हालिया भारत दौरे ने वैसे तो कई कूटनीतिक घटनाओं को जन्म दिया, लेकिन इनमें सबसे ज़्यादा चर्चा जिस बात की हुई, वह था—पुतिन के सम्मान में आयोजित आधिकारिक डिनर में कांग्रेस सांसद और जाने-माने लेखक-कूटनीतिज्ञ डॉ. शशि थरूर को आमंत्रित किया जाना। यह निमंत्रण एक ओर राजनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा बताया गया, तो दूसरी ओर इसने सियासी हलकों में बड़ी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर दी। सवाल यह उठने लगा कि आखिर एक विपक्षी नेता, वह भी सरकार के कट्टर आलोचक, को इतने महत्वपूर्ण और रणनीतिक डिनर में क्यों बुलाया गया?

घटना धीरे-धीरे विवाद का रूप लेती गई और सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट तक राजनीति गरमाती रही। आइए समझते हैं कि इस विवाद के पीछे क्या कारण थे, किन वर्गों ने आपत्ति जताई और सरकार तथा विदेश मंत्रालय ने इस पर क्या संकेत दिए।
पुतिन के सम्मान में राष्ट्रपति भवन में आयोजित यह डिनर बेहद चयनित अतिथियों के लिए था। इसमें प्रधानमंत्री मोदी, कैबिनेट मंत्री, शीर्ष नौकरशाह, सुरक्षा अधिकारी, उद्योगजगत के चुनिंदा प्रतिनिधि और कुछ विशिष्ट राजनीतिक व्यक्तित्व शामिल थे। इसी सूची में शशि थरूर का नाम शामिल होना कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था।
कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने कहा कि यह कोई साधारण निमंत्रण नहीं था, बल्कि थरूर की कूटनीतिक विशेषज्ञता और रूस-भारत संबंधों पर उनकी समझ को देखते हुए यह फैसला लिया गया। लेकिन विपक्ष के कुछ वर्गों ने इसे अलग नजर से देखा और सवाल उठा दिए।
विवाद की पहली वजह: कांग्रेस के भीतर असहजता
सबसे पहले विवाद कांग्रेस के भीतर ही शुरू हो गया। पार्टी के कुछ नेताओं को लगा कि शशि थरूर को विशेष आमंत्रण देना सरकार द्वारा विपक्ष में “चयनित नेताओं” को प्राथमिकता देने की रणनीति का हिस्सा है।
कुछ कांग्रेसियों ने निजी तौर पर यह चिंता जताई कि: थरूर पहले से ही पार्टी के ‘लिबरल चेहरों’ में गिने जाते हैं। वे अक्सर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार की कूटनीति की आलोचना करते हुए भी संतुलित रुख अपनाते हैं। ऐसे में उनका सरकारी कार्यक्रम में जाना भाजपा के हाथ में एक नया राजनीतिक संदेश दे सकता है। हालाँकि आधिकारिक स्तर पर कांग्रेस ने कुछ नहीं कहा, लेकिन पार्टी के अंदरूनी हल्कों में असहजता ज़रूर बनी रही।
दूसरी वजह: विपक्ष के अन्य नेताओं की अनदेखी का आरोप
डिनर की सूची में विपक्ष से सिर्फ चुनिंदा लोगों को बुलाया गया था। इस पर समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे दलों ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि: सरकार विपक्ष को बराबर का सम्मान नहीं देती।
जिन दलों की संसद में बड़ी उपस्थिति है, उनके नेताओं को नजरअंदाज किया गया। सिर्फ एक-दो ‘अनुकूल’ नेताओं को बुलाना लोकतांत्रिक परंपरा के खिलाफ है। कुछ टिप्पणीकारों ने इस कदम को “राजनीतिक चयनात्मकता” कहा, जिसने विवाद को और हवा दी।
तीसरी वजह: थरूर की कूटनीतिक हैसियत
शशि थरूर न केवल कांग्रेस के दिग्गज नेता हैं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि और अंडर-सेक्रेटरी जनरल रह चुके कूटनीतिज्ञ भी हैं। वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति, रक्षा, वैश्विक रणनीति और रूस-भारत संबंधों पर गहरी पकड़ रखते हैं।
सरकार के समर्थकों ने कहा कि: थरूर को बुलाना शुद्ध रूप से कूटनीतिक कारणों से लिया गया निर्णय था। विदेश नीति पर भारत की एकता दिखाने के लिए ऐसे प्रतिनिधित्व की जरूरत होती है। दुनिया को यह संदेश देना था कि भारत रूस के साथ रिश्तों को लेकर आंतरिक सहमति रखता है,लेकिन विरोधियों ने इसे राजनीतिक ‘संदेश की राजनीति’ कहा।
चौथी वजह: सोशल मीडिया पर ‘राजनीतिक ध्रुवीकरण’
सोशल मीडिया पर यह मुद्दा तुरंत विवाद का विषय बन गया। कुछ लोगों ने कहा कि: सरकार विपक्ष को बांटने की कोशिश कर रही है। कुछ खास लेफ्ट-लिबरल चेहरों को सरकारी मंच पर बुलाकर “विचारधारात्मक संतुलन” दिखाया जा रहा है।
यह कदम पुतिन के सामने भारत की लोकतांत्रिक बहुलता को प्रदर्शित करने का प्रयास हो सकता है।वहीं थरूर समर्थकों ने लिखा कि यह उनकी ‘बौद्धिक प्रतिष्ठा’ का सम्मान है और सरकार यह मानती है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर उनकी समझ उपयोगी हो सकती है।
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क्या थरूर के रूस से पुराने संबंध कारण बने?
यह भी चर्चा चली कि शशि थरूर रूस से जुड़े कूटनीतिक मुद्दों पर लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने रूसी अधिकारियों के साथ कई संवाद किए। उनकी किताबें और भाषण भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर केंद्रित होते हैं।
कूटनीतिक गलियारों में यह माना गया कि: रूस के लिए थरूर भारत के एक ‘परिचित और भरोसेमंद’ चेहरे हैं।
पुतिन के भारत दौरे में ऐसे लोगों की उपस्थिति रूस को सहज महसूस कराती है। इसलिए विदेश मंत्रालय ने सूची में उनका नाम रखा।
सरकार ने विवाद को कैसे संभाला?
सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया, लेकिन विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने यह संकेत दिया कि: डिनर की सूची पूरी तरह कूटनीतिक शिष्टाचार और विशेषज्ञता को ध्यान में रखकर तैयार की गई थी।इसमें राजनीति से अधिक राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी गई।
कुछ लोगों को बुलाना और कुछ को न बुलाना कोई राजनीतिक संदेश नहीं था, बल्कि पारंपरिक ‘सेलेक्टिव प्रोटोकॉल’ के तहत हुआ।
लेकिन विपक्ष इससे संतुष्ट नहीं दिखा।
थरूर खुद क्या बोले?
शशि थरूर ने विवाद को शांत करने की कोशिश करते हुए कहा: उन्हें यह निमंत्रण देश की कूटनीतिक परंपरा के तहत मिला। ऐसे कार्यक्रमों में विपक्ष की सीमित भागीदारी सामान्य बात है। यह राष्ट्र के सम्मान का अवसर है, न कि किसी दल का कार्यक्रम।उनका संतुलित बयान कुछ हद तक तनाव कम करने वाला रहा, लेकिन बहस पूरी तरह नहीं थमी।
विवाद के पीछे छिपा बड़ा संदेश
पुतिन का दौरा बेहद संवेदनशील समय पर हुआ जब यूक्रेन युद्ध जारी है,पश्चिम–रूस टकराव चरम पर है। भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, ऐसे में सरकार चाहती थी कि दुनिया को यह दिखाया जाए कि भारत की विदेश नीति सिर्फ सत्ता पक्ष की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की नीति है। लेकिन भारत की आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियाँ इतनी सरल नहीं कि ऐसा संदेश बिना विवाद के निकल सके।
एक डिनर, कई राजनीतिक संदेश
पुतिन के सम्मान में आयोजित डिनर ने यह दिखा दिया कि भारत की राजनीति किस प्रकार छोटी-छोटी घटनाओं पर भी ध्रुवीकृत हो जाती है।
शशि थरूर को बुलाने पर शुरू हुआ विवाद तीन बातें स्पष्ट करता है:
- सरकार और विपक्ष के बीच विश्वास की कमी गहरी है।
- विदेश नीति जैसे गंभीर विषय पर भी राजनीतिक व्याख्याएँ तुरंत सामने आ जाती हैं।
- शशि थरूर की कूटनीतिक छवि आज भी उन्हें भारतीय राजनीति में एक ‘अलग पोज़िशन’ देती है—और यही विवाद की जड़ भी बन जाती है।







