अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम समझौते ने इजरायल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। यह समझौता न केवल उनकी सुरक्षा रणनीति बल्कि उनकी राजनीतिक स्थिति और आगामी चुनावी चुनौतियों पर भी असर डाल सकता है।
नेतन्याहू ने लेबनान में सैन्य मौजूदगी पर दोहराया रुख
इजरायल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा कि वह और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हर मुद्दे पर एक जैसी राय नहीं रखते। उन्होंने स्पष्ट किया कि दक्षिणी लेबनान में इजरायली सेना तब तक बनी रहेगी, जब तक देश और उत्तरी क्षेत्र के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती।
उन्होंने कहा,
“हम आज़ाद और गौरवशाली देशों के नेता हैं. कभी-कभी हमारी राय एक-दूसरे से अलग होती है. हम अपने हितों के लिए खड़े होते हैं. मैं इसराइल के हितों और उसकी सुरक्षा के लिए खड़ा हूं.”
इसके साथ ही उन्होंने कहा,
“हम दक्षिणी लेबनान के सुरक्षा क्षेत्र में तब तक मौजूद रहेंगे, जब तक उत्तर में रहने वाले हमारे लोगों और पूरे देश के नागरिकों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी होगा.”
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अमेरिका-ईरान समझौते से क्यों बढ़ी चिंता?
जी-7 बैठक के दौरान अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम बढ़ाने पर समझौते पर हस्ताक्षर हुए। समझौते की एक प्रमुख शर्त लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई रोकना है।
हालांकि, समझौते के बाद भी लेबनान में इजरायली हमलों में कई लोगों की मौत हुई, जिसे ईरान ने समझौते का उल्लंघन बताया।
समझौते के पहले पैराग्राफ में अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगियों द्वारा “हर मोर्चे” पर सैन्य अभियान तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने की बात कही गई है।
1. अमेरिका ने इजरायल को वार्ता से रखा अलग
अमेरिका-ईरान समझौते को नेतन्याहू के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
नेतन्याहू लंबे समय से खुद को अमेरिका का करीबी सहयोगी बताते रहे हैं, लेकिन इस समझौते की प्रक्रिया में इजरायल को शामिल नहीं किया गया।
डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा,
“हमारे बिना इसराइल ही नहीं होता. मेरे बिना इसराइल नहीं होता, क्योंकि उनके लिए किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने वो किया ही नहीं, जो मैंने किया.”
इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्विर ने सोशल मीडिया पर लिखा,
“हम ट्रंप के समझौते से बंधे नहीं हैं. हम इस समझौते के साझेदार नहीं हैं, जो हमारी सुरक्षा पक्की नहीं करता.”
वहीं, यरूशलम पोस्ट के संपादक ज़विका क्लेइन ने इस समझौते को इजरायल के लिए खराब सौदा बताया।
2. ईरान अब भी मजबूत स्थिति में
नेतन्याहू लंबे समय से ईरान को इजरायल की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती बताते रहे हैं।
28 फरवरी को अमेरिका के साथ मिलकर इजरायल ने ईरान पर सैन्य अभियान शुरू किया, जो लगभग 100 दिनों तक चला। इससे पहले भी पिछले वर्ष दोनों देशों के बीच 12 दिनों तक संघर्ष हुआ था।
इसके बावजूद ईरान की स्थिति कमजोर होने के बजाय अधिक मजबूत मानी जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, वहां अब अधिक कट्टरपंथी नेताओं का प्रभाव बढ़ा है और होर्मुज़ स्ट्रेट के कारण उसकी रणनीतिक स्थिति भी मजबूत बनी हुई है।

3. चुनाव से पहले बढ़ा राजनीतिक दबाव
इजरायल में कुछ महीनों बाद आम चुनाव होने हैं।
यदि अमेरिका और ईरान की मांग के अनुसार इजरायल लेबनान में सैन्य कार्रवाई रोकता है, तो नेतन्याहू की “मिस्टर सिक्योरिटी” वाली छवि प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा पिछले पांच वर्षों से वे रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात से जुड़े मामलों का सामना कर रहे हैं। हालांकि, नेतन्याहू इन सभी आरोपों से लगातार इनकार करते रहे हैं।
पिछले वर्ष उन्होंने राष्ट्रपति आइज़ैक हरज़ोग से अपने खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार मामलों में औपचारिक माफी की भी मांग की थी और कहा था कि “राष्ट्रीय हित” को देखते हुए ऐसा करना उचित होगा।
4. परमाणु कार्यक्रम पर बनी हुई है अनिश्चितता
ईरान का परमाणु कार्यक्रम अब भी अमेरिका और इजरायल के लिए प्रमुख चिंता का विषय बना हुआ है।
डोनाल्ड ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि संवर्धित यूरेनियम को जब्त करने की उन्हें कोई जल्दबाजी नहीं है।
दूसरी ओर नेतन्याहू का कहना है कि उनके प्रधानमंत्री रहते ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा।
समझौते के मसौदे के अनुसार ईरान ने दोहराया है कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा, लेकिन संवर्धित यूरेनियम के मौजूदा भंडार जैसे अहम मुद्दों पर अंतिम फैसला भविष्य की वार्ता में होगा।
5. आर्थिक मोर्चे पर ईरान को मिल सकती है बढ़त
समझौते के मसौदे में संकेत दिए गए हैं कि ईरान को अमेरिकी छूट मिल सकती है, जिससे वह फिर से तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों का निर्यात शुरू कर सकेगा।
इसके अलावा उसकी फ्रीज की गई परिसंपत्तियां जारी करने और लगभग 300 अरब डॉलर तक के दीर्घकालिक विकास ढांचे पर भी चर्चा का उल्लेख है।
हालांकि अमेरिका ने स्पष्ट नहीं किया है कि यह संभावित फंड किस प्रकार उपलब्ध कराया जाएगा।
संघर्ष के दौरान ईरान यह भी दिखा चुका है कि वह होर्मुज़ स्ट्रेट के जरिए वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है और युद्ध समाप्त होने के बाद भी यह क्षमता बरकरार है।
Conclusion
अमेरिका और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम समझौता इजरायल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के सामने कई नई राजनीतिक और रणनीतिक चुनौतियां लेकर आया है। लेबनान नीति, ईरान का परमाणु कार्यक्रम, आगामी चुनाव और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन जैसे मुद्दे आने वाले समय में उनकी सरकार के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकते हैं।







