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Workers Protest — नए लेबर कोड के खिलाफ मजदूर-कामगारों का आक्रोश

Workers Protest
नवजोत कौर सिद्धू
On: नवम्बर 27, 2025 1:35 पूर्वाह्न
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भारत में 26 नवंबर 2025 को देशभर में हजारों मजदूरों और कामगारों ने 2025 New Labour Codes के विरोध में सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। यह नया श्रम कानून — जिसमें 29 पुरानी श्रम संबंधी धाराओं को हटाकर चार नए कोड बनाए गए हैं — लागू होते ही मजदूर संघों की तीखी प्रतिक्रिया का विषय बन गया। 

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विरोध की गुहार: मजदूरों की क्या मांगें हैं?

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने इन नए कोड्स को “मजदूर-विरोधी” और “नियोक्ता-समर्थक” करार दिया है। उनका तर्क है कि कोड्स—

  • नौकरी की सुरक्षा को कमजोर करते हैं, क्योंकि छोटे या मध्यम उद्योगों के लिए कर्मचारियों की छंटनी (layoff) पहले की तुलना में सरल हो गई है।
  • सामूहिक सत्याग्रह, हड़ताल या यूनियन बनाने में बाधाएँ बढ़ा दी हैं — जिससे मजदूरों की श्रमिक एकता, हकदार आवाज़ और Bargaining क्षमता प्रभावित होगी।
  • 8 घंटे के कामकाजी दिन के बजाय 12 घंटे काम, अस्थाई (fixed-term) या अस्थायी रोजगार, न्यूनतम वेतन व सामाजिक सुरक्षा की गारंटी को अस्पष्ट बनाते हैं।

यूनियनों का कहना है कि यह व्यवस्था देश को औपनिवेशिक युग की मजदूर-निरपेक्षता की ओर ले जा सकती है — जहाँ कामगार की गरिमा व अधिकारों की अनदेखी होती थी। 

2025 New Labour Codes
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देशभर में विरोध — प्रदर्शन कहाँ-कहाँ हुए

आज, 26 नवंबर को, प्रदर्शन केवल एक शहर तक सीमित नहीं रहे। नीचे कुछ प्रमुख स्थानों की झलक है:

  • दक्षिण भारत से लेकर कोच्चि, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु — कई राज्यों में बड़ी संख्या में कामगार यूनियनों ने सड़कों पर उतर कर विरोध किया।
  • औद्योगिक केन्द्रों, सार्वजनिक क्षेत्र, कोयला, परिवहन, ऑटो, वस्त्र मिलों आदि क्षेत्रों में यूनियनों ने रैलियाँ, धरने व ज्ञापन प्रदर्शन किया। कुछ जगहों पर शांतिपूर्ण रैलियाँ रही, जबकि विरोध की चेतावनी दी गई है कि यदि कोड्स वापस न हुए — तो आंदोलन बढ़ाया जाएगा।

कुल मिलाकर, यह पहली बार है जब इतने बड़े पैमाने पर मजदूरों ने एक ही दिन में विरोध जताया — जिससे स्पष्ट हो गया है कि कोड्स लागू होते ही व्यापक असंतोष फूटा है। 

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सरकार का रुख: फायदे या बदलाव?

वहीं, सरकार व न्याय विभाग का कहना है कि ये नए कोड्स पुराने जटिल, ब्रिटिश-कालीन आणि ध्यान से टिकने वाले कानूनों को आधुनिक ढांचे में लाने की कोशिश है। इनका उद्देश्य है:

  • विभिन्न राज्य कानूनों व उद्योगों में समन्वय (uniform framework) लाना।
  • प्लेटफार्म व गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना, क्योंकि आज की बदलती रोजगार संरचनाओं में पारंपरिक श्रमिक वर्ग के अलावा इनका दायरा भी बढ़ गया है।
  • उद्योगपतियों के लिए कानूनी प्रक्रियाओं को सरल बनाना, जिससे निवेश, उत्पादन और रोजगार के अवसर बढ़ सकें।

श्रम मंत्रालय की ओर से यह दावा किया गया है कि निम्नलिखित सुधार मिलेंगे: न्यूनतम वेतन, समय पर मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक सुरक्षा और औपचारिक नियुक्ति पत्र — जिससे कामगारों को भविष्य की अस्थिरता से बचाया जा सके। 

विरोधियों की चिंता — आखिर क्यों भारी असंतोष?

हालांकि सरकार ने अच्छे इरादे बताए हैं, लेकिन विरोधी कह रहे हैं कि—

  • अधिकांश मजदूर भारत के अनगठित क्षेत्र (informal sector) में काम करते हैं, और नए कोड सर्टेन श्रमिकों तक ही सीमित हैं — 90% से अधिक मजदूर कोड के दायरे से बाहर रह सकते हैं।
  • जब तक राज्य स्तर पर नए नियम और अधिसूचनाएँ (notification) नहीं आतीं, तब तक स्थिति अस्पष्ट है — यानी कामगारों का भविष्य अनिश्चित बना रहेगा।
  • यूनियन-संघ, हड़ताल, सामूहिक Bargaining जैसे अधिकार कमजोर होंगे, जिससे मजदूरों की शक्ति कम हो जाएगी।

इसलिए, कई विरोधियों ने इसे “ब्रिटिश-कालीन नव-उपनिवेशी श्रम व्यवस्था” की तरह बताया है, जिसमें कामगारों को सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि अस्थिरता, अनुबंध, अनिश्चितता और असुरक्षा के दौर में भेजा जाएगा।

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अगला कदम — मजदूरों की एकता व भविष्य

उल्लेखनीय है कि इन विरोधों के बावजूद सरकार ने कोड्स लागू कर दिए हैं — लेकिन उसकी पूरी रूपरेखा और नियम अभी राज्य स्तर पर तय होने बाकी हैं।

मजदूर संगठन व ट्रेड यूनियन अब यह मांग कर रहे हैं कि—

  • इन कोड्स को वापस लिया जाए, या कम से कम संशोधन करके मजदूर-हित सुनिश्चित किया जाए।
  • अनौपचारिक श्रमिकों, प्लेटफार्म व गिग वर्कर्स को पूर्ण सुरक्षा मिले।
  • हड़ताल, यूनियन बनाने, Bargaining जैसे बुनियादी अधिकार सुरक्षित रहें।

यदि सरकार ने उनकी बात न मानी, तो मजदूर आंदोलन, बंद या संगठित विरोध की योजना बार-बार हो सकती है — जो देश के कामगारों के भविष्य को प्रभावित कर सकती है।

निष्कर्ष — विकास या शोषण? सवाल खुला

नए लेबर कोड्स और उनके विरोध ने एक बार फिर यह दिखाया है कि भारत में आर्थिक सुधार और श्रमिकों के अधिकार — दोनों के बीच संतुलन बनाना कितना चुनौतीपूर्ण है।

सरकार का दावा है कि कोड्स रोजगार, निवेश, सामाजिक सुरक्षा और औद्योगिक विकास को गति देंगे। दूसरी ओर, मजदूरों का कहना है कि ये बदलाव उनके अधिकार व सुरक्षा के लिए खतरा हैं।

वास्तव में, असली परीक्षा अब शुरू होगी — जब ये क़ानून लागू होंगे, और असल ज़मीन पर कामगारों की स्थिति बदलेगी। अगर सुधार सिर्फ कागज़ पर रह गया, और मजदूर असुरक्षित, अस्थिर व अनुबंधित श्रम की श्रेणी में चले गए — तो नए कोड विकास का नहीं, बल्कि वंचना का कारण बनेंगे।

इसलिए, यह जरूरी है कि चाहे सरकार हो, उद्योग हो या मजदूर — सभी पक्ष बातचीत, पारदर्शिता और न्याय पर ज़ोर दें। तभी भारत में श्रमिक-हितों व आर्थिक विकास के बीच संतुलन कायम रह पाएगा।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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