न्यूयार्क। संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए बेहद दिलचस्प चुनाव के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को पांच नए अस्थायी सदस्य मिल गए हैं। वर्ष 2027-28 के कार्यकाल के लिए इस बार ऑस्ट्रिया, पुर्तगाल, किर्गिस्तान, जिम्बाब्वे और त्रिनिदाद एवं टोबैगो ने बाजी मारी है। लेकिन इस पूरे चुनाव का सबसे बड़ा उलटफेर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के ‘पावरहाउस’ कहे जाने वाले जर्मनी की हार रहा, जिसे बर्लिन के लिए एक बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है।महासभा के 193 सदस्य देशों ने गुप्त मतदान के जरिए इन नए सदस्यों को चुना है। निर्वाचित हुए ये पांचों देश अगले साल 1 जनवरी 2027 से अपना दो वर्षीय कार्यकाल शुरू करेंगे। ध्यान देने वाली बात यह है कि इन देशों की एंट्री ऐसे नाजुक वक्त पर हो रही है, जब दुनिया यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के भीषण तनाव जैसे कई गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकटों से जूझ रही है।
बर्लिन की साख पर सवाल: आखिर क्यों हारा जर्मनी?
इस चुनाव में सबसे कड़ा मुकाबला ‘पश्चिमी यूरोपीय और अन्य देशों’ के समूह में था, जहां दो सीटों के लिए ऑस्ट्रिया, पुर्तगाल और जर्मनी मैदान में थे। कूटनीतिक गलियारों में माना जा रहा था कि जर्मनी अपनी मजबूत वैश्विक स्थिति के कारण आसानी से सीट निकाल लेगा। लेकिन नतीजों ने सबको चौंका दिया। पुर्तगाल और ऑस्ट्रिया ने शुरुआत से ही बढ़त बना ली, जबकि जर्मनी जरूरी समर्थन जुटाने में पूरी तरह नाकाम रहा।ग्लोबल अफेयर्स के जानकारों के मुताबिक, यह शिकस्त जर्मनी को लंबे समय तक चुभने वाली है। इसकी बड़ी वजह यह है कि जर्मनी पिछले काफी समय से जी-4 देशों के साथ मिलकर सुरक्षा परिषद में बड़े सुधारों और खुद के लिए स्थायी सदस्यता की मांग उठाता रहा है। ऐसे में एक अस्थायी सीट का चुनाव हार जाना उसकी मौजूदा कूटनीतिक रणनीति और लॉबिंग पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
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किर्गिस्तान का इतिहास और ग्लोबल साउथ की आवाज
इस चुनावी दंगल की दूसरी सबसे बड़ी खबर मध्य एशियाई देश किर्गिस्तान की रही। एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सीट के लिए उसका सीधा मुकाबला फिलीपींस से था। दोनों के बीच कूटनीतिक शह-मात का खेल इतना करीबी रहा कि विजेता का फैसला करने के लिए कई दौर की वोटिंग करानी पड़ी। आखिरकार बाजी किर्गिस्तान के हाथ लगी और वह पहली बार सुरक्षा परिषद की टेबल पर बैठने में सफल रहा।इसके अलावा, अफ्रीकी कोटे से जिम्बाब्वे और कैरेबियाई क्षेत्र से त्रिनिदाद एवं टोबैगो भी आसानी से अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे। रणनीतिकारों का मानना है कि इन देशों के आने से परिषद के भीतर ‘ग्लोबल साउथ’ यानी विकासशील और छोटे द्वीपीय देशों की आवाज को एक नया मंच मिलेगा।
क्यों इतनी रसूखदार है संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद?
जो लोग वैश्विक राजनीति को करीब से नहीं समझते, उनके लिए यह जानना जरूरी है कि आखिर इस परिषद के लिए इतनी मारामारी क्यों होती है। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को दुनिया में अमन-चैन और सुरक्षा बनाए रखने वाली सबसे ताकतवर संस्था माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र का यह इकलौता ऐसा अंग है जिसके फैसले सभी सदस्य देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं। इस परिषद के पास किसी भी विद्रोही देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने, सैन्य कार्रवाई की मंजूरी देने और दुनिया के अशांत क्षेत्रों में यूएन की शांति सेना भेजने का विशेष अधिकार होता है।इस शक्तिशाली परिषद में कुल 15 सदस्य देश बैठते हैं। इनमें से 5 देश (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन) स्थायी सदस्य हैं, जिन्हें ‘पी-5’ कहा जाता है और इनके पास किसी भी प्रस्ताव को रोकने की जादुई ताकत यानी ‘वीटो पावर’ होती है। बाकी बचे 10 सदस्यों को अस्थायी रूप से केवल दो-दो साल के लिए दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व के आधार पर चुना जाता है।
चुनौतियों का पहाड़ और बदलती ग्लोबल पॉलिटिक्स
1 जनवरी 2027 से जब ये पांचों नए देश अपनी कुर्सियां संभालेंगे, तो उनके सामने चुनौतियों का एक बड़ा पहाड़ होगा। गाजा और इजरायल का विवाद, यूक्रेन के मैदान में खिंचता जा रहा युद्ध, ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएं, अफ्रीका के देशों में तख्तापलट की घटनाएं और ग्लोबल वार्मिंग इस चुनाव के नतीजों ने एक बात साफ कर दी है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की हवा बदल रही है। जर्मनी जैसी महाशक्ति की हार यह साफ इशारा करती है कि अब सिर्फ रसूख या आर्थिक ताकत के दम पर वैश्विक चुनाव नहीं जीते जा सकते। छोटे और विकासशील देश अब कूटनीति के केंद्र में आ रहे हैं, और महाशक्तियों को भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए अपनी पुरानी और घिसी-पिटी रणनीतियों को बदलना होगा।से पैदा हो रहे सुरक्षा खतरे— ये सब कुछ ऐसे मसले हैं जो अगले दो साल तक सुरक्षा परिषद के एजेंडे में सबसे ऊपर रहने वाले हैं।







