तेहरान। मिडिल ईस्ट में अभी शांति की बातचीत चल ही रही थी कि इस बीच ईरान ने अमेरिका को लेकर अपने तेवर एकदम कड़े कर लिए हैं। दोनों देशों के बीच अभी हाल ही में जो अंतरिम समझौता हुआ था, उससे लग रहा था कि शायद अब तनाव कुछ कम होगा। लेकिन ईरान ने साफ कह दिया है कि वाशिंगटन की कोई भी मनमानी अब नहीं चलने वाली।
तेहरान ने बिल्कुल कड़े लहजे में चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने समझौते की एक भी शर्त का उल्लंघन किया या अपनी बात से पलटा, तो उसे ऐसा करारा जवाब मिलेगा जो उसने सोचा भी नहीं होगा।ईरान की तरफ से बात रख रहे संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने देश का रुख साफ करते हुए कहा कि तेहरान अब किसी भी विदेशी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। उन्होंने साफ़ कहा कि ईरान इस समझौते की हर एक लाइन का कड़ाई से पालन करवाएगा, चाहे जो हो जाए।
साठ दिनों का अल्टीमेटम और परमानेंट समाधान की चुनौती
ईरान की यह तल्खी ऐसे समय पर आई है जब दोनों देश बहुत ही नाजुक मोड़ पर खड़े हैं। इस शुरुआती समझौते का असल मकसद पिछले कई महीनों से मिडिल ईस्ट में चल रही जंग और तनातनी को कम करना है, ताकि समुद्री व्यापार सुरक्षित रहे और बेवजह का खून-खराबा रुके।समझौते के हिसाब से दोनों पक्षों के पास सिर्फ 60 दिन का समय है। इसी दो महीने के भीतर उन्हें एक परमानेंट समाधान ढूंढना होगा। अब आगे की बातचीत की टेबल पर ईरान का परमाणु कार्यक्रम, उस पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना और पूरे इलाके की सुरक्षा जैसे बड़े और पेचीदा मुद्दे तय होने हैं।गालिबाफ ने तो यहाँ तक दावा कर दिया कि ईरानी जनता और वहां के नेताओं के अड़े रहने की वजह से ही अमेरिका को बातचीत की मेज पर आना पड़ा है। उन्होंने कहा कि अब यह अमेरिका की जिम्मेदारी है कि वह अपनी नीयत साफ रखे और समझौते का सम्मान करे। गालिबाफ ने सीधे शब्दों में चेताया कि अगर किसी ने भी इस डील को बिगाड़ने की कोशिश की, तो ईरान का एक्शन बेहद खतरनाक होगा।
also read :
- वैश्विक कूटनीति में ऐतिहासिक मोड़- अमेरिका और ईरान के बीच 14-सूत्रीय शांति समझौता (MoU)
- अमेरिका और ईरान के बीच परदे के पीछे बड़ी डील 25 लाख करोड़ के निवेश की इनसाइड स्टोरी
- ट्रंप के दावों पर तेहरान का ‘ब्रेक’ अमेरिका-ईरान परमाणु समझौते पर दस्तखत टले सस्पेंस बरकरार
लेबनान में सीजफायर का उल्लंघन और जमीनी विवाद
इस पूरी बातचीत के बीच लेबनान की जमीनी स्थिति सबसे बड़ा रोड़ा बनी हुई है। ईरान ने सीधे इजरायल पर निशाना साधते हुए कहा है कि वह दक्षिणी लेबनान में लगातार हमले कर रहा है, जो कि मौजूदा सीजफायर का खुलेआम मखौल उड़ाना है।ईरानी सेना के कमांडरों का कहना है कि इजरायली फौज ने पिछले कुछ दिनों में कई बार युद्धविराम का उल्लंघन किया है। ईरान की सेना ने दोटूक कहा है कि अगर लेबनान के आम लोगों और ठिकानों पर बमबारी नहीं रुकी, तो वे भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेंगे और सीधा जवाब देंगे।इस पर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी बात साफ की। उनका कहना है कि लेबनान के हालात ही इस पूरी डील की किस्मत तय करेंगे। अराघची के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में शांति तभी आ सकती है जब हर एक पार्टी जमीनी स्तर पर सीजफायर का पूरी ईमानदारी से पालन करे।
न्यूक्लियर डील की शर्तें और आर्थिक पाबंदियों का पेंच
जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में बातचीत का सबसे मुश्किल हिस्सा ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही होगा। शुरुआती बातचीत से जो संकेत मिल रहे हैं, उसके मुताबिक ईरान इस बात पर राजी हो सकता है कि वह परमाणु बम नहीं बनाएगा, लेकिन उसकी एक बड़ी शर्त है। शर्त यह है कि अमेरिका उस पर लगी कड़क आर्थिक और व्यापारिक पाबंदियों को पूरी तरह हटाए। इसके साथ ही, विदेशों के बैंकों में फ्रीज पड़े ईरान के अरबों डॉलर उसे वापस मिलने चाहिए।
इंटरनेशनल मामलों के एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह अंतरिम समझौता तो बस एक ट्रेलर है, असली पिक्चर तो अगले दो महीनों में दिखेगी। तब पता चलेगा कि दशकों पुरानी दुश्मनी, अविश्वास और यूरेनियम संवर्धन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर दोनों देश सच में किसी लिखित समझौते पर पहुंच पाते हैं या नहीं।
वैश्विक बिरादरी की पैनी नजर और इजरायल की चिंता
इस बीच, वाशिंगटन और तेहरान के बीच चल रही इस कूटनीतिक पहल पर पूरी दुनिया की नजर है। भारत ने इस कदम की तारीफ की है और इसे एक अच्छी शुरुआत बताया है।दूसरी तरफ, इजरायल और कुछ खाड़ी देश इस समझौते से काफी भड़के हुए हैं और चिंतित हैं। उनका मानना है कि इस डील के बाद इलाके में ईरान का दबदबा और उसकी सैन्य ताकत बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी। हालांकि, इस समझौते के समर्थकों का कहना है कि सालों से चली आ रही इस खूनी जंग को खत्म करने के लिए बातचीत को एक मौका देना ही पड़ेगा।
क्या वाकई मिडिल ईस्ट में आ पाएगी स्थायी शांति?
कुल मिलाकर, बात अब इस पर टिकी है कि अमेरिका और ईरान कागजी वादों को जमीन पर कितना सच कर पाते हैं। ईरान की इस ताजा और तीखी चेतावनी ने यह तो साफ कर दिया है कि तेहरान इस बार किसी भी ढीले रवैये या अमेरिकी चालबाजी को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। अब आने वाले कुछ हफ्ते ही तय करेंगे कि मिडिल ईस्ट में शांति का नया दौर शुरू होगा या फिर यह कोशिश भी इतिहास के बाकी नाकाम समझौतों की तरह ठंडे बस्ते में चली जाएगी।







