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पाकिस्तानी सरकार से आर-पार के मूड में बलूच: नीदरलैंड में जोरदार बलूच विरोध प्रदर्शन, शहबाज–मुनीर की बढ़ी मुश्किलें

बलूच विरोध प्रदर्शन
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 16, 2025 7:26 अपराह्न
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नई दिल्ली। पाकिस्तान में बलूचिस्तान को लेकर लंबे समय से चले आ रहे असंतोष ने अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर और तेज़ रूप ले लिया है। नीदरलैंड में हुए एक बड़े और संगठित बलूच विरोध प्रदर्शन में बलूच समुदाय के लोगों ने पाकिस्तानी सरकार, सेना और सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ खुलकर नाराज़गी जाहिर की। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे अब केवल प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि अपने अधिकारों और पहचान की लड़ाई को वैश्विक स्तर पर मजबूती से उठाएंगे। इस घटनाक्रम को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के लिए एक नई चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

बलूच विरोध प्रदर्शन

यूरोप की सड़कों पर गूंजा बलूच आवाज़

नीदरलैंड के एक प्रमुख शहर में हुए इस प्रदर्शन में सैकड़ों की संख्या में बलूच कार्यकर्ता और समर्थक जुटे। हाथों में झंडे, बैनर और तख्तियां लिए प्रदर्शनकारी पाकिस्तान में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों, जबरन गायब किए जाने और सैन्य कार्रवाई के खिलाफ नारे लगाते नजर आए। प्रदर्शनकारियों का दावा था कि बलूचिस्तान की आवाज़ को पाकिस्तान के भीतर दबाया जा रहा है, इसलिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचने के लिए विदेशों में सड़कों पर उतरना पड़ रहा है।

बलूच विरोध प्रदर्शन – “अब चुप नहीं रहेंगे” का संदेश

बलूच विरोध प्रदर्शन में शामिल कई वक्ताओं ने कहा कि बलूच आंदोलन अब एक निर्णायक मोड़ पर है। उनका कहना था कि दशकों से चले आ रहे वादे, समझौते और आश्वासन अब खोखले साबित हो चुके हैं। प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा कि वे अब “आर-पार” की लड़ाई के मूड में हैं—या तो उन्हें राजनीतिक अधिकार, संसाधनों पर हक और सम्मान मिलेगा, या फिर उनका विरोध और तेज़ होगा।

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पाक सरकार और सेना पर सीधे आरोप

नीदरलैंड में हुए इस प्रदर्शन का सबसे अहम पहलू यह रहा कि इसमें पाकिस्तानी सरकार और सेना दोनों को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि बलूचिस्तान में सुरक्षा के नाम पर दमन किया जा रहा है और स्थानीय आबादी की आवाज़ को दबाने के लिए कठोर कदम उठाए जाते हैं। उनका कहना था कि अगर हालात सामान्य होते, तो इतनी बड़ी संख्या में बलूच युवाओं को देश छोड़कर विदेशों में विरोध प्रदर्शन नहीं करने पड़ते।

शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर के लिए बढ़ती चुनौती

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विदेशों में इस तरह के प्रदर्शन पाकिस्तान की छवि के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ पहले ही आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय दबावों से जूझ रहे हैं। वहीं सेना प्रमुख आसिम मुनीर के सामने भी आंतरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय असंतोष को काबू में रखने की बड़ी चुनौती है। नीदरलैंड जैसे यूरोपीय देश में खुले तौर पर हुआ यह प्रदर्शन संकेत देता है कि बलूच मुद्दा अब केवल पाकिस्तान का आंतरिक मामला नहीं रह गया है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर समर्थन जुटाने की कोशिश

बलूच कार्यकर्ता अब अपने आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, यूरोपीय संसदों और वैश्विक मीडिया तक ले जाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। नीदरलैंड में हुए प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रतिनिधियों ने कहा कि वे यूरोपीय नेताओं और संस्थाओं से मुलाकात कर बलूचिस्तान की स्थिति पर ध्यान आकर्षित करेंगे। उनका मानना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय दबाव नहीं बनेगा, तब तक पाकिस्तान की सत्ता संरचना गंभीर बदलाव के लिए मजबूर नहीं होगी।

प्रवासी बलूच समुदाय की बढ़ती भूमिका

विदेशों में बसे बलूच समुदाय की भूमिका इस आंदोलन में लगातार बढ़ती जा रही है। यूरोप, अमेरिका और मध्य पूर्व में रहने वाले बलूच अब संगठित होकर प्रदर्शन, सम्मेलन और संवाद के जरिए अपनी बात रख रहे हैं। नीदरलैंड का प्रदर्शन इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है, जहां प्रवासी बलूचों ने दिखाया कि वे अब केवल भावनात्मक समर्थन तक सीमित नहीं, बल्कि संगठित राजनीतिक दबाव बनाना चाहते हैं।

पाकिस्तान की आधिकारिक प्रतिक्रिया पर नजर

हालांकि इस विरोध प्रदर्शन पर पाकिस्तान की ओर से तत्काल कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन पहले भी ऐसे आंदोलनों को पाकिस्तान “प्रचार” या “विदेशी हस्तक्षेप” बताता रहा है। इसके बावजूद, विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार विदेशों में हो रहे ऐसे प्रदर्शनों को नजरअंदाज करना अब आसान नहीं होगा। हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठती बलूच आवाज़ पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक असहजता बढ़ा सकती है।

बलूचिस्तान: संसाधन समृद्ध, असंतोष गहरा

बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा लेकिन सबसे कम आबादी वाला प्रांत है, जो प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर माना जाता है,प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इन संसाधनों का लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिलता और फैसले केंद्र से थोपे जाते हैं। इसी असंतोष ने समय के साथ राजनीतिक आंदोलन और विरोध की शक्ल ले ली है, जो अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिखने लगा है।

यूरोप में क्यों मिल रही है जगह?

विश्लेषकों के अनुसार, यूरोप में लोकतांत्रिक माहौल, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर जोर होने के कारण ऐसे आंदोलनों को मंच मिल जाता है। नीदरलैंड में प्रदर्शनकारियों ने इसी लोकतांत्रिक स्पेस का इस्तेमाल करते हुए अपनी बात खुलकर रखी और वैश्विक मीडिया का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की।

आगे क्या?

नीदरलैंड में हुआ यह प्रदर्शन संकेत देता है कि आने वाले समय में बलूच आंदोलन और तेज़ हो सकता है। यदि पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक समाधान और संवाद की पहल नहीं होती, तो ऐसे अंतरराष्ट्रीय विरोध और बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यह स्थिति शहबाज शरीफ सरकार और सैन्य नेतृत्व—दोनों के लिए एक कठिन परीक्षा बन सकती है।

नीदरलैंड में हुआ बलूच विरोध प्रदर्शन सिर्फ एक विदेश में हुआ आयोजन नहीं, बल्कि यह उस गहरे असंतोष का प्रतीक है जो बलूचिस्तान में वर्षों से सुलग रहा है। प्रदर्शनकारियों का “आर-पार” का संदेश साफ करता है कि वे अब पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। पाकिस्तानी सरकार और सेना के लिए यह चेतावनी है कि बलूच मुद्दे को केवल सुरक्षा के नजरिये से नहीं, बल्कि राजनीतिक और मानवीय दृष्टिकोण से भी देखने की जरूरत है,वरना अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह आवाज़ और बुलंद होती जाएगी।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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