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2 साल में पड़ोसी देशों से 47 लाख से अधिक अफ़गानी लोग लौटे देश अफगानिस्तान 

2 साल में पड़ोसी देशों से 47 लाख से अधिक अफ़गानी लोग लौटे देश, अफगानिस्तान 
नवजोत कौर सिद्धू
On: जनवरी 29, 2026 7:30 अपराह्न
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अफगानिस्तान में शरणार्थियों की बड़े पैमाने पर वापसी हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक और मानवीय घटनाओं में से एक है। दो साल के भीतर लगभग 47 लाख अफगानों का स्वदेश लौटना न केवल अफगानिस्तान के जनसांख्यिकीय ढांचे (Demographics) को बदल रहा है, बल्कि इसके पहले से ही जर्जर आर्थिक तंत्र पर भारी दबाव भी डाल रहा है।

आबादी में 12% का इजाफा –  एक सांख्यिकीय अवलोकन

अफगानिस्तान की अनुमानित जनसंख्या लगभग 4.2 से 4.5 करोड़ के बीच मानी जाती है। ऐसे में 47 लाख लोगों की वापसी सीधे तौर पर कुल आबादी में 10% से 12% की वृद्धि दर्शाती है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का अचानक आगमन किसी भी विकासशील देश के संसाधनों को हिला देने के लिए पर्याप्त है।

किन देशों से लौटे? (प्रमुख स्रोत देश)

स्वदेश लौटने वाले अफगानों का एक बड़ा हिस्सा मुख्य रूप से दो पड़ोसी देशों से आया है

  • पाकिस्तान –  सबसे अधिक संख्या पाकिस्तान से लौटने वालों की है। नवंबर 2023 से पाकिस्तान सरकार ने ‘अवैध विदेशियों के प्रत्यावर्तन की योजना’ (IFRP) लागू की, जिसके तहत लाखों अफगानों को जबरन निकाला गया।
  • ईरान –  ईरान ने भी हाल के महीनों में अफगान प्रवासियों के प्रति कड़ा रुख अपनाया है और बड़ी संख्या में लोगों को सीमा पार वापस भेजा है।
  • अन्य देश –  मध्य एशियाई देशों (ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान) और तुर्की से भी कुछ संख्या में लोग वापस लौटे हैं।

वापसी के मुख्य कारण (Why and How?)

वापसी के कारण स्वैच्छिक कम और मजबूरन अधिक रहे हैं:

  • पाकिस्तान की निष्कासन नीति –  पाकिस्तान ने सुरक्षा चिंताओं और आर्थिक दबाव का हवाला देते हुए बिना दस्तावेजों वाले अफगानों को देश छोड़ने का अल्टीमेटम दिया। इसमें वे लोग भी शामिल थे जो दशकों से वहां रह रहे थे।
  • ईरान में आर्थिक दबाव – ईरान खुद मुद्रास्फीति और प्रतिबंधों से जूझ रहा है, जिससे वहां रह रहे अफगान श्रमिकों के लिए गुजारा करना मुश्किल हो गया और सरकार ने डिपोर्टेशन की प्रक्रिया तेज कर दी।
  • सुरक्षा और उत्पीड़न –  पड़ोसी देशों में पुलिस की छापेमारी, गिरफ्तारी का डर और सामाजिक भेदभाव ने भी लोगों को लौटने पर मजबूर किया।
  • तालिबान का ‘सुरक्षित अफगानिस्तान’ का दावा –  तालिबान सरकार ने प्रवासी अफगानों से वापस लौटने की अपील की, यह दावा करते हुए कि युद्ध समाप्त हो चुका है और अब देश सुरक्षित है।

अफगानिस्तान पर पड़ने वाले प्रभाव-इतनी बड़ी आबादी के अचानक आने से अफगानिस्तान के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं

मानवीय संकट (Humanitarian Crisis)-ज्यादातर लौटने वाले खाली हाथ आए हैं। उनके पास न घर है, न रोजगार। कड़ाके की ठंड और बुनियादी सुविधाओं (स्वच्छ पानी, शौचालय, स्वास्थ्य सेवा) की कमी ने सीमावर्ती इलाकों में मानवीय संकट पैदा कर दिया है।

सामाजिक ढांचा-कई लौटने वाले लोग दशकों से बाहर थे। उनकी नई पीढ़ी अफगानिस्तान की संस्कृति और वहां के सख्त नियमों से अपरिचित है। इससे सामाजिक सामंजस्य (Social Integration) बिठाने में समस्या आ रही है।

स्वास्थ्य और शिक्षा-अस्पतालों और स्कूलों पर अचानक बोझ बढ़ गया है। पहले से ही अंतरराष्ट्रीय सहायता में कटौती झेल रहे स्वास्थ्य केंद्रों के पास दवाइयों और डॉक्टरों की कमी है।

आर्थिक संकट गहराने के कारण-अफगानिस्तान पहले से ही दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक है। 47 लाख लोगों के आने से आर्थिक संकट और भयावह हो गया है क्योंकि

  • विदेशी संपत्ति फ्रीज होना –  तालिबान के सत्ता में आने के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान के केंद्रीय बैंक की लगभग 9.5 अरब डॉलर की संपत्ति फ्रीज कर दी है।
  • बैंकिंग सिस्टम का ठप होना –  अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग लेनदेन पर प्रतिबंधों के कारण व्यापार और निवेश शून्य के बराबर है।
  • बेरोजगारी की दर – लाखों नए लोगों के लिए बाजार में नौकरियां नहीं हैं। कृषि क्षेत्र सूखे और पुराने तरीकों के कारण इस अतिरिक्त आबादी का पेट भरने में सक्षम नहीं है।
  • सहायता में कमी –  दुनिया भर की संस्थाएं (जैसे UN) तालिबान की नीतियों (विशेषकर महिलाओं की शिक्षा और काम पर प्रतिबंध) के कारण फंडिंग में कटौती कर रही हैं।
  • मुद्रास्फीति (Inflation) –  मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने से खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं।

भविष्य की चुनौतियां

अफगानिस्तान वर्तमान में एक “प्रेशर कुकर” जैसी स्थिति में है। यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मानवीय आधार पर सहायता नहीं बढ़ाई और तालिबान ने अपनी नीतियों में लचीलापन नहीं दिखाया, तो यह जनसंख्या वृद्धि वरदान के बजाय अभिशाप बन सकती है। लौटने वाले लोगों में बड़ी संख्या में हुनरमंद युवा भी हैं, लेकिन बिना पूंजी और अवसर के, वे गरीबी के दुष्चक्र में फंस रहे हैं।

मुख्य बिंदु –  47 लाख लोगों की वापसी केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि एक मानवीय त्रासदी और आर्थिक चुनौती का संकेत है जिसे पूरी दुनिया को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

Swati Pandey

A versatile writer mainly works on trending news, daily updates from politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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