व्यापारभारतविदेशी समाचारखेलजीवन शैलीराजनीतिधर्मभौगोलिकसेलिब्रेटीज़शिक्षास्वास्थ्य

पाकिस्तान से ‘धुरंधर’ पर तीखा तंज: “हमारे चौधरी असलम, संजय दत्त से ज़्यादा हैंडसम” — सीमा पार सिनेमा पर छिड़ी बहस

पाकिस्तान से ‘धुरंधर’ पर तीखा तंज: “हमारे चौधरी असलम, संजय दत्त से ज़्यादा हैंडसम”
नवजोत कौर सिद्धू
On: जनवरी 4, 2026 8:42 अपराह्न
Follow Us:

भारत में फिल्म ‘धुरंधर’ को लेकर चर्चा तेज़ है, लेकिन इस बार सुर्खियाँ देश के भीतर नहीं, बल्कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से आई प्रतिक्रिया के कारण बनी हैं। पाकिस्तान के एक चर्चित ब्लॉग में न सिर्फ फिल्म के कथानक और किरदारों पर सवाल उठाए गए, बल्कि सीधे-सीधे बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त की तुलना कथित तौर पर एक पाकिस्तानी किरदार “चौधरी असलम” से कर दी गई। ब्लॉग की एक पंक्ति—“हमारे चौधरी असलम तुम्हारे संजय दत्त से ज़्यादा हैंडसम थे”—अब सोशल मीडिया पर बहस का विषय बन चुकी है। यह बयान केवल सिनेमा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत-पाक रिश्तों, इतिहास की व्याख्या और सांस्कृतिक नजरिए को लेकर नई बहस को जन्म दे रहा है।

पाकिस्तान से ‘धुरंधर’ पर तीखा तंज: “हमारे चौधरी असलम, संजय दत्त से ज़्यादा हैंडसम”

‘धुरंधर’ और विवाद की जड़

धुरंधर एक ऐसी फिल्म मानी जा रही है, जिसमें अपराध, अंडरवर्ल्ड और सत्ता के गलियारों से जुड़े किरदारों को केंद्र में रखा गया है। संजय दत्त के किरदार को लेकर पहले ही यह चर्चा थी कि वह वास्तविक जीवन के कुछ विवादित चेहरों से प्रेरित है। फिल्म के ट्रेलर और शुरुआती जानकारियों के बाद भारत में जहां इसे एक सशक्त परफॉर्मेंस के तौर पर देखा जा रहा है, वहीं पाकिस्तान में इसका नजरिया बिल्कुल अलग दिखा।

पाकिस्तानी ब्लॉग में दावा किया गया कि धुरंधर में दिखाया गया किरदार एकतरफा दृष्टिकोण से गढ़ा गया है और इसमें सीमा पार के तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। ब्लॉग लेखक ने आरोप लगाया कि भारतीय फिल्में अक्सर पाकिस्तान से जुड़े पात्रों को या तो नकारात्मक रूप में दिखाती हैं या फिर उन्हें ग्लैमराइज करके अपने हिसाब से ढाल लेती हैं। इसी क्रम में “चौधरी असलम” का ज़िक्र किया गया, जिसे लेखक ने एक वास्तविक और “ज़्यादा प्रभावशाली” व्यक्तित्व बताया और संजय दत्त के किरदार से उसकी तुलना करते हुए यह विवादित टिप्पणी कर दी।

“हैंडसम” टिप्पणी के पीछे छिपा सियासी व्यंग्य

ब्लॉग में की गई “हैंडसम” वाली टिप्पणी को कई लोग सतही तुलना मान रहे हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि इसके पीछे गहरा राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यंग्य छिपा है। यह सिर्फ चेहरे-मोहरे की तुलना नहीं, बल्कि यह संदेश देने की कोशिश है कि पाकिस्तान अपने कथित किरदारों और इतिहास को भारतीय सिनेमा से बेहतर और ज्यादा “ऑथेंटिक” मानता है।

सोशल मीडिया पर इस बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। भारत में कई यूज़र्स ने इसे हास्यास्पद बताया, तो कुछ ने कहा कि जब सिनेमा की बात हो रही है, तो तुलना अभिनय और कहानी से होनी चाहिए, न कि “हैंडसमनेस” से। वहीं पाकिस्तान में कुछ लोगों ने इस ब्लॉग का समर्थन करते हुए कहा कि भारतीय फिल्में अक्सर सीमा पार की कहानियों को अपने नजरिए से पेश करती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे बयान दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद अविश्वास को और हवा देते हैं। सिनेमा, जो कभी सांस्कृतिक पुल माना जाता था, अब कई बार वैचारिक टकराव का माध्यम बनता जा रहा है।

सोशल मीडिया से सिनेमा तक गरमाई बहस

ब्लॉग सामने आने के बाद धुरंधर अचानक सोशल मीडिया ट्रेंड में आ गई। ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब पर लोग इस बयान को लेकर मीम्स, प्रतिक्रियाएं और लंबी बहसें कर रहे हैं। कुछ लोग इसे पाकिस्तान की “फिल्मी हताशा” बता रहे हैं, तो कुछ इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में रखकर देख रहे हैं।

फिल्म समीक्षकों का कहना है कि विवाद से धुरंधर को अप्रत्यक्ष फायदा भी मिल सकता है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी फिल्म को लेकर अंतरराष्ट्रीय विवाद होता है, तो दर्शकों की जिज्ञासा और बढ़ जाती है। हालांकि, वे यह भी मानते हैं कि फिल्मों को राजनीतिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति सिनेमा की मूल भावना को नुकसान पहुंचाती है। 

संजय दत्त या फिल्म निर्माताओं की ओर से अभी तक इस पाकिस्तानी ब्लॉग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन बॉलीवुड के भीतर यह चर्चा जरूर है कि अब हर बड़ी फिल्म को सिर्फ घरेलू नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखकर देखा जा रहा है।

सिनेमा, पहचान और सीमा पार की संवेदनाएं

धुरंधर पर पाकिस्तान से आया यह ब्लॉग एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या सिनेमा केवल मनोरंजन है, या फिर वह राष्ट्रीय पहचान और राजनीतिक विचारधारा का विस्तार बन चुका है? भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों के इतिहास को देखते हुए यह साफ है कि दोनों देशों में एक-दूसरे की फिल्मों और कहानियों को हमेशा संदेह की नजर से देखा जाता रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर फिल्मों को ऐतिहासिक या सामाजिक संदर्भ में बनाया जाता है, तो उन्हें बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। एकतरफा प्रस्तुति न केवल विवाद को जन्म देती है, बल्कि कला की स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े करती है।

वहीं आम दर्शकों का एक वर्ग यह भी मानता है कि फिल्मों को फिल्मों की तरह ही देखना चाहिए। उनके मुताबिक, धुरंधर एक कहानी है, न कि इतिहास की किताब, और उस पर इस तरह की तुलना अनावश्यक है।

बयान से ज़्यादा बड़ी बहस

“हमारे चौधरी असलम तुम्हारे संजय दत्त से ज़्यादा हैंडसम थे” — यह पंक्ति भले ही व्यंग्य या तंज के रूप में लिखी गई हो, लेकिन इसने भारत-पाक सिनेमा और सोच के फर्क को एक बार फिर उजागर कर दिया है। यह विवाद दिखाता है कि सीमा पार सिर्फ ज़मीन नहीं बंटी है, बल्कि कहानियों, किरदारों और नज़रों का फासला भी गहरा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि धुरंधर दर्शकों के बीच कैसी प्रतिक्रिया पाती है और क्या यह विवाद यहीं थम जाता है या फिर दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक बहस को और तेज़ करता है। फिलहाल इतना तय है कि एक ब्लॉग की एक पंक्ति ने सिनेमा को फिर से सुर्खियों के केंद्र में ला दिया है।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment