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पीड़ित बच्चों के शरीर में कैसे पहुँचा एचआईवी,बड़ा सवाल..?

पीड़ित बच्चों के शरीर में कैसे पहुँचा एचआईवी
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 20, 2025 12:23 अपराह्न
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हाल ही में सामने आए एक गंभीर मामले ने देशभर में स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे पांच बच्चों के शरीर में एचआईवी संक्रमण पाए जाने की खबर ने अभिभावकों से लेकर चिकित्सा विशेषज्ञों तक को झकझोर कर रख दिया है। यह मामला न सिर्फ चिकित्सा लापरवाही की आशंका को जन्म देता है, बल्कि यह भी बताता है कि जीवनरक्षक इलाज के दौरान कितनी बड़ी चूक हो सकती है।

पीड़ित बच्चों के शरीर में कैसे पहुँचा एचआईवी

थैलेसीमिया और बार-बार खून चढ़ाने की मजबूरी

थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। इस बीमारी से पीड़ित बच्चों को जीवित रहने और सामान्य जीवन जीने के लिए नियमित रूप से रक्त चढ़ाने की जरूरत होती है। कई मामलों में हर 15 से 30 दिन में ब्लड ट्रांसफ्यूजन अनिवार्य हो जाता है।

यही नियमित रक्त चढ़ाने की प्रक्रिया इन बच्चों के लिए सबसे बड़ा जोखिम भी बन जाती है, अगर रक्त की जांच और सुरक्षा मानकों में थोड़ी भी लापरवाही हो। विशेषज्ञों के अनुसार, थैलेसीमिया पीड़ित मरीज एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और सी जैसी बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, क्योंकि उन्हें बार-बार बाहरी रक्त पर निर्भर रहना पड़ता है।

एचआईवी संक्रमण की आशंका: लापरवाही या सिस्टम फेल?

प्रारंभिक जांच और स्वास्थ्य अधिकारियों की जानकारी के मुताबिक, इन पांचों बच्चों में एचआईवी संक्रमण का सबसे संभावित कारण संक्रमित रक्त चढ़ाया जाना माना जा रहा है। आशंका जताई जा रही है कि जिस ब्लड बैंक या स्वास्थ्य केंद्र से रक्त लिया गया, वहां या तो जांच प्रक्रिया में कमी रही या फिर मानक प्रोटोकॉल का सही ढंग से पालन नहीं किया गया।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि सुरक्षित रक्त आपूर्ति के लिए हर यूनिट रक्त की एचआईवी समेत कई संक्रामक बीमारियों के लिए जांच अनिवार्य होती है। अगर यह जांच पुरानी तकनीक से की जाए, या जल्दबाजी में रिपोर्ट दी जाए, तो संक्रमण पकड़ में आने से चूक हो सकती है। कुछ मामलों में तथाकथित “विंडो पीरियड” भी जोखिम बढ़ाता है, जिसमें संक्रमण होने के बावजूद शुरुआती जांच में वायरस का पता नहीं चलता ।हालांकि, इस मामले में यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि एक नहीं बल्कि पांच बच्चों में संक्रमण कैसे पाया गया। इससे यह आशंका मजबूत होती है कि समस्या किसी एक गलती की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की खामी की हो सकती है।

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जांच के आदेश और अभिभावकों का आक्रोश

मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच के आदेश दे दिए हैं। संबंधित ब्लड बैंकों, अस्पतालों और रिकॉर्ड्स की पड़ताल की जा रही है। यह भी जांच की जा रही है कि बच्चों को कितनी बार और कहां-कहां से रक्त चढ़ाया गया था। बच्चों के परिजनों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि वे अपने बच्चों को बचाने के लिए अस्पतालों के चक्कर काटते रहे और बदले में उन्हें ऐसी बीमारी मिल गई, जो जीवनभर का बोझ बन सकती है। कई अभिभावकों ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और मुआवजे की मांग की है।

बड़ा सवाल: भरोसे की सुरक्षा कैसे होगी?

यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि क्या भारत में रक्त आपूर्ति प्रणाली पूरी तरह सुरक्षित है? विशेषज्ञों का मानना है कि थैलेसीमिया जैसे मरीजों के लिए विशेष निगरानी, अत्याधुनिक जांच तकनीक और पारदर्शी रिकॉर्ड सिस्टम अनिवार्य होना चाहिए।

साथ ही, यह भी जरूरी है कि अभिभावकों को यह जानकारी दी जाए कि रक्त कहां से आ रहा है, उसकी जांच कैसे हो रही है और क्या वह राष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरता है। जब तक सिस्टम में जवाबदेही और पारदर्शिता नहीं बढ़ेगी, तब तक ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति का खतरा बना रहेगा। पांच मासूम बच्चों में एचआईवी संक्रमण की यह घटना सिर्फ एक चिकित्सा चूक नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—कि जीवन बचाने वाली व्यवस्था में अगर भरोसा टूटे, तो उसका असर पूरी जिंदगी पर पड़ता है।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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