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Office Time के बाद Boss का Call रिसीव न करने का अधिकार संसद में पेश हुआ

ऑफिस टाइम के बाद बॉस का कॉल रिसीव
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 8, 2025 3:20 अपराह्न
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बदलाव की हवा: वर्क-लाइफ बैलेंस की तरफ़ पहला कदम

भारत में पिछले कई सालों से यह समस्या थी कि ऑफिस का समय ख़त्म होने के बाद भी कर्मचारी घर पहुँचते ही काम से जुड़े कॉल, मेसेज, ई-मेल आदि देखना शुरू कर देते थे — या फिर खुद को तैयार पाते थे। डिजिटल जमाना, रिमोट वर्क, और 24×7 कनेक्टिविटी ने काम और निजी जीवन के बीच की सीमाएँ लगभग मिटा दी थीं। इसी पृष्ठभूमि में, 6 दिसंबर 2025 को संसद के लोकसभा सदन में पेश किया गया — एक ऐसा प्रस्ताव, जो कहता है कि काम के घंटे खत्म होने के बाद कर्मचारी से काम से जुड़ी हर तरह की डिजिटल या टेलीफ़ोनिक कम्युनिकेशन की अपेक्षा करना, उन्हें काम करना… अब जबरदस्ती नहीं किया जा सकेगा।

ऑफिस टाइम के बाद बॉस का कॉल रिसीव

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यह बिल सिर्फ कर्मचारी-कंपनी के बीच नए नियम लाने का नहीं है — यह एक संकेत है कि अब भारत में “वर्क-लाइफ बैलेंस” को अधिकार और सम्मान मिले, न कि वह एक लचीली मांग मात्र हो।

  • पेश किया और क्यों

यह बिल एक प्राइवेट मेंबर बिल है, जिसे Supriya Sule (एनसीपी सांसद) ने लोकसभा में पेश किया। उन्होंने कहा कि अब की डिजिटल दुनिया में, कर्मचारी से यह अपेक्षा करना कि वह घर पहुँच कर भी काम करता रहे, यह उनके निजी समय, मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन के लिए बहुत बड़ा बोझ है। इसलिए, अगर कंपनी या नियोक्ता चाहते हैं कि ऑफिस घंटे खत्म होने के बाद कॉल या मेल न करें — तो इसे कानून द्वारा सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

उनका तर्क है कि वर्किंग पॉलिसी में स्पष्ट सीमाएं तय होनी चाहिए — ताकि लोगों को काम और जिंदगी के बीच संतुलन मिल सके। यह पहल केवल कामगारों के लिए राहत नहीं, बल्कि एक स्वस्थ कार्य-संस्कृति की ओर एक बड़ा कदम है।

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बिल में प्रस्तावित प्रावधान

बिल में कर्मचारियों को यह अधिकार देने की बात कही गई है कि वे ऑफिशियल काम के घंटे खत्म होने के बाद—चाहे कॉल हो, मेल हो या अन्य डिजिटल कम्युनिकेशन—उनका उत्तर देने के लिए बाध्य न हों। अगर किसी कंपनी या संस्था द्वारा ऐसा दबाव बनाया जाता है, तो उसे दंड या जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स इसके तहत ‘कंपनी के द्वारा कर्मचारियों से जुड़े ऐसे कॉल्स/मेल्स’ पर जुर्माना लगाने की बात करती हैं जैसे कि नियोक्ता द्वारा लगाए जाने वाले दायित्वों के उल्लंघन पर, कर्मचारियों के कुल वेतन का 1 % जुर्माना। बिल में यह सुझाव भी है कि कंपनियों को अपने कर्मचारियों के लिए “वेलफेयर अथॉरिटी” स्थापित करनी चाहिए — जो यह देखे कि नियोक्ता और कर्मचारी के बीच वर्क-लाइफ बैलेंस बना रहे और डिजिटल दवाब के दुरुपयोग पर नजर रखे।

क्यों अब यह बिल ज़रूरी हो गया है?

दूरदराज के इलाकों से लेकर बड़े शहरों तक — भारत की कार्यसंस्कृति में पिछले एक दशक में एक बड़ा बदलाव आया है। पहले जहां लोग काम ख़त्म कर घर लौट आते थे, अब बहुत से लोग कॉल, मेल या मैसेज से जुड़े रहते हैं — कभी उत्तर देने का दबाव, कभी रात-देर तक काम। इसने न सिर्फ उनके निजी समय को प्रभावित किया, बल्कि कई बार मानसिक तनाव, पारिवारिक जीवन में गिरावट, नींद और स्वास्थ्य की समस्याओं को जन्म दिया।

Digital connectivity ने काम को सुविधाजनक बनाया पर एक ही साथ — निजी और सार्वजनिक जीवन की सीमाएँ धुंधली कर दी। ऐसे में, एक कानून जो इस धुंधलेपन को मिटाए और स्पष्ट सीमाएं तय करे कामगारों, कंपनियों, दोनों के हित में हो सकता है। दुनिया में कुछ देशों — जैसे फ्रांस, इटली, स्पेन आदि — में पूर्व में इस तरह के “राइट टू डिस्कनेक्ट / राइट टू स्विच ऑफ” कानून लागू हो चुके हैं। भारत में यदि यह बिल कानून बन गया, तो यह आधुनिक कामकाजी जीवन के लिए एक बड़ा बदलाव होगा।

कंपनियों और कामगारों दोनों के लिए संभावित लाभ और चुनौतियाँ

अगर Right to Disconnect Bill लागू हो गया, तो इसके कुछ सकारात्मक फायदे हो सकते हैं —

  1. कर्मचारियों को काम और निजी जीवन में संतुलन मिलेगा, जिससे उनके मानसिक 2. स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है।
  2. काम के दबाव, रात-देर तक कॉल-मेल की चिंता, काम और विश्राम के बीच झड़प कम होगी।
  3. लंबे समय तक काम न करना, जला हुआ महसूस न करना (burnout) — इनसे राहत मिलेगी।
  4. कर्मचारी बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे, क्योंकि जब काम समय पर हो और आराम समय पर मिले, तो उत्पादकता बेहतर होती है।
  5. हालाँकि चुनौतियाँ भी होंगी। कुछ सकारात्मक पहलुओं के साथ जिन व्यवसायों में तात्कालिक या इमरजेंसी कॉल-मेल जरूरी होते हैं (जैसे IT, हेल्थ, सपोर्ट सर्विसेज, इन्फ्रास्ट्रक्चर), वहां नियमों का पालन मुश्किल हो सकता है।
  6. कंपनियों के लिए शिफ्ट-वर्क, अतिरिक्त संसाधन या समय-बद्धता की जिम्मेदारी बढ़ सकती है।
  7. बहुत से निजी क्षेत्र के नियोक्ता इस बिल को बाधा मान सकते हैं, और उनका रुझान हो सकता है कि वे इसे लागू करने में आनाकानी करें।

क्या बिल पास हो पाएगा — और कैसी रहेगी आगे की राह

यह ध्यान देने योग्य है कि Right to Disconnect Bill, 2025 एक प्राइवेट मेंबर बिल है। ऐसे बिल अक्सर सरकार द्वारा पेश नहीं किए जाते, और कई बार वे संसद में लंबी बहस या चर्चा तक नहीं पहुँच पाते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह प्रस्ताव बेकार है। कभी-कभी ऐसे बिल — चाहे पास न हों — लेकिन सार्वजनिक बहस, मजदूरों और कंपनियों के बीच संवाद, और भविष्य की श्रम-नीति के लिए दिशा तय कर जाते हैं। अगर यह बिल आगे बढ़ा और कानून बना, तो भारतीय कार्य-संस्कृति में “कॉल–मेल मत करो जब काम के घंटे ख़त्म हो चुके हों” — यह सिर्फ एक सलाह नहीं, बल्कि अधिकार हो जाएगा।

समृद्ध कार्य-संस्कृति की ओर एक कदम

Right to Disconnect Bill, 2025 किसी कर्मचारी या कंपनी के लिए सिर्फ कानून नहीं है — यह एक विचार है। यह विचार है कि काम और जीवन के बीच सीमाएँ होनी चाहिए; कि डिजिटल कनेक्टिविटी का मतलब यह नहीं कि जिंदगी सिर्फ काम बन जाए; कि परिवार, विश्राम, स्वास्थ्य — ये इंसानियत के हिस्से हैं, और इन्हें काम की पाबंदियों से पीछे नहीं छोड़ना चाहिए।

भारत में यह मामला सिर्फ कॉल-मेल बंद करने का नहीं है — यह बदलती कामकाजी दुनिया में लोगों के निजी समय, मानसिक संतुलन और गरिमामय जीवन की बात है।
अगर यह कानून बना — तो यह सिर्फ देश के लाखों कर्मचारियों के लिए राहत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत होगी — जहाँ काम, ज़िंदगी का हिस्सा होगा, पर ज़िंदगी सिर्फ काम नहीं।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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