व्यापारभारतविदेशी समाचारखेलजीवन शैलीराजनीतिधर्मभौगोलिकसेलिब्रेटीज़शिक्षास्वास्थ्य

बैसाखी 2026- 14 अप्रैल दिन मंगलवार को जानिए तिथि इतिहास महत्व परंपरायें और  उत्सव

बैसाखी 2026- 14 अप्रैल दिन मंगलवार को जानिए तिथि इतिहास महत्व परंपरायें और  उत्सव
नवजोत कौर सिद्धू
On: अप्रैल 8, 2026 1:10 अपराह्न
Follow Us:

बैसाखी (Vaisakhi) उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब और हरियाणा का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक त्योहार है। यह न केवल नई फसल के आने की खुशी है बल्कि यह सिख पंथ के जन्म और स्वाभिमान का भी प्रतीक है।

​बैसाखी क्या है? 

​बैसाखी शब्द की उत्पत्ति ‘वैशाख’ मास से हुई है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार वैशाख सौर वर्ष का पहला महीना होता है। सौर नववर्ष की शुरुआत होने के कारण इसे भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है (जैसे केरल में विशु, असम में बोहाग बिहू और बंगाल में पोइला बैसाख)।

​पंजाब के किसानों के लिए यह सर्दियों की फसल (रबी), विशेष रूप से गेहूं की कटाई का समय होता है। जब फसलें लहलहाती हैं तो किसान अपनी मेहनत का फल देखकर खुशी से झूम उठते हैं और भंगड़ा व गिद्दा के माध्यम से अपना आभार प्रकट करते हैं।

ऐतिहासिक महत्व – खालसा पंथ की स्थापना

​सिख धर्म में बैसाखी का स्थान सर्वोच्च है। इसका मुख्य कारण साल 1699 की वह घटना है जिसने भारतीय इतिहास की धारा बदल दी।

​आनंदपुर साहिब की वह सभा

​13 अप्रैल 1699 को सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में एक भारी सभा बुलाई। उन्होंने हाथ में तलवार लेकर संगत से पूछा, “क्या कोई ऐसा है जो धर्म के लिए अपना सिर दे सके?” एक-एक करके पांच बहादुर व्यक्ति उठे, जिन्हें गुरु जी ने ‘पंज प्यारे’ (पांच प्रिय) का नाम दिया। ये थे:

  • ​भाई दया सिंह जी
  • ​भाई धर्म सिंह जी
  • ​भाई हिम्मत सिंह जी
  • ​भाई मोहकम सिंह जी
  • ​भाई साहिब सिंह जी

​गुरु जी ने उन्हें ‘अमृत’ छकाया और स्वयं भी उनके हाथों से अमृत ग्रहण किया। यहीं से खालसा पंथ की स्थापना हुई। गुरु जी ने सिखों को ‘सिंह’ (शेर) और महिलाओं को ‘कौर’ (राजकुमारी) की उपाधि दी और पांच ककार (केश, कंगा, कड़ा, कच्छेरा और कृपाण) धारण करने का आदेश दिया।

read also : विश्व कविता दिवस – नौरोज़

​बैसाखी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

​बैसाखी का दिन केवल खुशियों का ही नहीं बल्कि बलिदान का भी प्रतीक है। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हजारों लोग बैसाखी मनाने और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए थे।

​क्रूर जनरल डायर ने निहत्थे मासूमों पर गोलियां चलवाईं जिसमें सैकड़ों लोग शहीद हो गए। यह घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हुई और इसने शहीद उधम सिंह और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को जन्म दिया।

​बैसाखी मनाने की परंपराएं और रीति-रिवाज

​नगर कीर्तन

​बैसाखी के अवसर पर गुरुद्वारों से भव्य नगर कीर्तन निकाला जाता है। पंज प्यारों के नेतृत्व में गुरु ग्रंथ साहिब जी की पालकी निकाली जाती है। श्रद्धालु सड़कों पर सफाई करते हैं और ‘बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ के जयघोष से वातावरण गूंज उठता है।

​सेवा और लंगर

​गुरुद्वारों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है। श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर पवित्र सरोवरों में स्नान करते हैं। इसके बाद ‘कड़ाह प्रसाद’ बांटा जाता है और लंगर की व्यवस्था की जाती है, जहाँ अमीर-गरीब सब एक साथ बैठकर भोजन करते हैं।

​भंगड़ा और गिद्दा

​पंजाब के खेतों में ढोल की थाप सुनाई देती है। पुरुष रंग-बिरंगी पगड़ियाँ पहनकर भंगड़ा करते हैं और महिलाएँ पारंपरिक वेशभूषा में गिद्दा पाती हैं। यह नृत्य जीवन की जीवंतता और खुशहाली का प्रदर्शन है।

read more :

​ खगोलीय और धार्मिक संदर्भ

​ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बैसाखी के दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है जिसे ‘मेष संक्रांति’ कहा जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार

  • ​इसी दिन देवी गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं।
  • ​द्वापर युग में अर्जुन ने इसी समय के आसपास तीर मारकर धरती से जल की धारा निकाली थी।
  • ​यह दिन दान-पुण्य और पवित्र नदियों में स्नान के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

​बैसाखी के विभिन्न नाम (अनेकता में एकता)

​भारत एक विशाल देश है जहाँ बैसाखी के दिन ही अन्य प्रांतों में अलग-अलग उत्सव मनाए जाते हैं

राज्यउत्सव का नाम
पंजाब/हरियाणाबैसाखी
केरलविशु
असमबोहाग बिहू
पश्चिम बंगालपोइला बैसाख
तमिलनाडुपुथंडु
ओडिशामहाविषुव संक्रांति

साल 2026 में बैसाखी की तैयारी कैसे करें?

​14 अप्रैल 2026 को मंगलवार है। इस दिन को यादगार बनाने के लिए आप निम्न कार्य कर सकते हैं

  • गुरुद्वारा दर्शन –  सुबह के समय गुरुद्वारे जाकर मत्था टेकें और कीर्तन सुनें।
  • दान और सेवा –  इस दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों की मदद करें या लंगर सेवा में हाथ बटाएं।
  • पारंपरिक भोजन – घर पर पीले चावल, कढ़ी और हलवा जैसे पकवान बनाएं।
  • बच्चों को इतिहास बताएं –  अपनी नई पीढ़ी को गुरु गोविंद सिंह जी के बलिदान और खालसा पंथ के महत्व के बारे में जानकारी दें।

​बैसाखी केवल एक फसल उत्सव नहीं है; यह साहस, त्याग, भाईचारे और नई शुरुआत का संगम है। यह हमें सिखाता है कि जिस तरह किसान कड़ी मेहनत के बाद फसल काटता है उसी तरह जीवन में धैर्य और श्रम का फल हमेशा मीठा होता है। 2026 की बैसाखी आपके जीवन में नई उमंग और समृद्धि लेकर आए।

“वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह “

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment