महाराष्ट्र की राजनीति में साल 2025 का अंत काफी नाटकीय रहा। दिसंबर 2025 के आखिरी सप्ताह में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा बुलाई गई कैबिनेट की आखिरी बैठक में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अनुपस्थिति ने राज्य के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी।
यह केवल एक बैठक से दूरी नहीं थी बल्कि महायुति BJP, शिवसेना-शिंदे और NCP-अजित पवार के भीतर गहराते मतभेदों का एक स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।
साल की आखिरी कैबिनेट बैठक और शिंदे की अनुपस्थिति
31 दिसंबर 2025 को हुई इस कैबिनेट बैठक को बेहद अहम माना जा रहा था क्योंकि इसमें आगामी नगर निकाय चुनावों BMC सहित और कुछ महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी जानी थी। हालांकि एकनाथ शिंदे इस बैठक में नहीं पहुंचे।
- आधिकारिक कारण-शिंदे गुट के मंत्रियों जैसे उदय सामंत ने इसे स्वास्थ्य संबंधी कारणों बुखार और थकान से जोड़ा।
- सियासी कारण –जानकारों का मानना है कि यह डिप्लोमैटिक इलनेस थी। शिंदे अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए पहले भी अहम मौकों पर इसी तरह बैठकों से दूरी बना चुके हैं।
- अनुपस्थिति के पीछे के प्रमुख कारण-एकनाथ शिंदे की नाराजगी के पीछे कोई एक वजह नहीं बल्कि कई राजनीतिक कड़वाहटें हैं जो पिछले कुछ महीनों में जमा हुई हैं ।
सीट शेयरिंग (Seat Sharing) का विवाद
आगामी स्थानीय निकाय चुनावों विशेषकर बीएमसी BMC चुनाव को लेकर भाजपा और शिवसेना शिंदे के बीच खींचतान चरम पर थी|
भाजपा मुंबई की 227 सीटों में से करीब 137-150 सीटों पर लड़ना चाहती है जबकि शिंदे गुट अपनी पकड़ वाले क्षेत्रों में समझौता करने को तैयार नहीं है।
कहा जा रहा है कि शिंदे ने 90-100 सीटों की मांग की थी लेकिन भाजपा उन्हें कम सीटों पर समेटने की कोशिश कर रही है। बैठक में न जाना इसी दबाव की राजनीति का हिस्सा माना गया।
कार्यकर्ताओं की पोचिंग (Poaching) का मुद्दा
नवंबर-दिसंबर 2025 के दौरान ठाणे कल्याण-डोंबिवली और पालघर जैसे क्षेत्रों में भाजपा ने शिवसेना शिंदे के कई स्थानीय नेताओं और पूर्व पार्षदों को अपनी पार्टी में शामिल किया। ठाणे शिंदे का गढ़ है। अपने ही गढ़ में भाजपा की इस सेंधमारी से शिंदे बेहद आहत हैं।
इससे पहले नवंबर 2025 में भी शिंदे के मंत्रियों ने कैबिनेट का बहिष्कार किया था क्योंकि भाजपा नेता रविंद्र चव्हाण ने डोंबिवली में शिवसेना कार्यकर्ताओं को तोड़ा था।
मुख्यमंत्री पद की टीस और शक्ति संतुलन
2024 के अंत में हुए विधानसभा चुनावों के बाद जब देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाया गया और एकनाथ शिंदे को उपमुख्यमंत्री पद से संतोष करना पड़ा तभी से समीकरण बदल गए थे। शिंदे को लगता है कि उनके पास अब वे अहम विभाग नहीं हैं जो पहले थे जैसे गृह मंत्रालय भाजपा के पास है| महत्वपूर्ण फाइलों और निर्णयों में फडणवीस का बढ़ता प्रभाव शिंदे को जूनियर पार्टनर की तरह महसूस करा रहा है।
क्या शिंदे ऐसा पहले भी कर चुके हैं पिछला इतिहास
जी हां एकनाथ शिंदे ने अपनी नाराजगी दर्ज कराने के लिए कई बार बहिष्कार या अनुपस्थिति का सहारा लिया है-
- फरवरी 2025-शहरी विकास विभाग UDD की बैठकों से शिंदे नदारद रहे थे क्योंकि भाजपा नेतृत्व ने उनके कुछ पसंदीदा अधिकारियों के तबादले रोक दिए थे।
- अगस्त 2025 –रायगढ़ जिले के पालक मंत्री Guardian Minister पद को लेकर जब विवाद बढ़ा तब भी शिंदे अचानक अपने गांव चले गए थे और कैबिनेट बैठक में शामिल नहीं हुए थे।
- नवंबर 2025 –डोंबिवली में दलबदल के मुद्दे पर शिंदे के मंत्रियों ने सामूहिक रूप से बैठक छोड़ी थी।
महायुति गठबंधन पर प्रभाव और भविष्य की चुनौतियां
साल 2025 का अंत महायुति के लिए सुखद नहीं रहा। हालांकि सार्वजनिक रूप से नेता सब कुछ ठीक है का दावा करते हैं लेकिन जमीनी हकीकत अलग है
- बीजेपी का रुख –भाजपा अब महाराष्ट्र में बड़े भाई की भूमिका में पूरी तरह आ चुकी है और वह नगर निगमों में अपना पूर्ण वर्चस्व चाहती है।
- शिंदे की मजबूरी-एकनाथ शिंदे के पास गठबंधन से बाहर निकलने के विकल्प सीमित हैं लेकिन वह अपनी शिवसेना की पहचान बचाए रखने के लिए भाजपा से लगातार लड़ रहे हैं।
- विपक्ष MVA की नजर-उद्धव ठाकरे और शरद पवार इस फूट का फायदा उठाने की ताक में हैं। शरद पवार ने हाल ही में बयान दिया था कि भाजपा को अब शिंदे की जरूरत नहीं रही।
एकनाथ शिंदे का साल 2025 की आखिरी बैठक में न जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि 2026 की शुरुआत महाराष्ट्र में राजनीतिक संघर्षों से भरी होगी। सीट शेयरिंग का पेच और वर्चस्व की लड़ाई इस गठबंधन की स्थिरता को आने वाले समय में और कड़ी चुनौती देगी।







