डोल पूर्णिमा, जिसे डोल जात्रा या डोल उत्सव के रूप में भी जाना जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे जीवंत और आध्यात्मिक त्योहारों में से एक है। यह विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जहाँ देश के बाकी हिस्सों में ‘होली’ का शोर होता है, वहीं इन क्षेत्रों में यह उत्सव भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम और भक्ति के रंग में रंगा होता है।
डोल पूर्णिमा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
डोल पूर्णिमा का उत्सव फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष डोल पूर्णिमा 3 मार्च, मंगलवार को मनाई जाएगी यह दिन न केवल रंगों का है, बल्कि यह चैतन्य महाप्रभु की जयंती का भी दिन है जो वैष्णव धर्म के महान संत और समाज सुधारक थे।
- राधा-कृष्ण का प्रेम – माना जाता है कि इसी दिन भगवान कृष्ण ने देवी राधा के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया था और उनके साथ फगुआ खेला था।
- वसंत का स्वागत—यह ऋतु परिवर्तन का प्रतीक है जहाँ शीत ऋतु विदा लेती है और वसंत का आगमन होता है।
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डोल जात्रा (डोल पूर्णिमा) की मुख्य परंपराएँ
डोल जात्रा की रस्में अन्य क्षेत्रों की होली से थोड़ी भिन्न और अत्यंत शालीन होती हैं
- पालकी यात्रा – इस दिन भगवान कृष्ण और राधा की मूर्तियों को एक सुंदर सजी हुई पालकी (डोल) में बिठाया जाता है। श्रद्धालु इस पालकी को कंधे पर उठाकर नगर भ्रमण कराते हैं।
- अबीर का अर्पण – लोग सबसे पहले भगवान के चरणों में गुलाल (अबीर) अर्पित करते हैं और उसके बाद एक-दूसरे को रंग लगाते हैं।
- भजन और कीर्तन- डोल जात्रा के दौरान हरे कृष्ण महामंत्र का जप और पारंपरिक गीतों का गायन मुख्य आकर्षण होता है।
विभिन्न राज्यों में डोल पूर्णिमा का स्वरूप
| क्षेत्र | मुख्य विशेषता | पारंपरिक भोजन |
| पश्चिम बंगाल | शांतिनिकेतन का ‘बसंत उत्सव’, चैतन्य महाप्रभु जयंती | मालपुआ, खीर, संदेश | |
| ओडिशा | जगन्नाथ मंदिर में डोल गोविंद उत्सव | छेना पोड़ा, पना |
| असम | ‘दौल उत्सव’, बारपेटा में भव्य आयोजन | पीठा, लारु |
शांतिनिकेतन और डोल उत्सव
रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा शुरू किया गया शांतिनिकेतन का बसंत उत्सव विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ छात्र और कलाकार पीले रंग के वस्त्र पहनकर नृत्य और संगीत के माध्यम से वसंत का स्वागत करते हैं। टैगोर के गीत (रवींद्र संगीत) इस दिन की शोभा बढ़ाते हैं।
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डोल पूर्णिमा की पौराणिक कथाएँ
इस पर्व से जुड़ी कई कथाएँ प्रचलित हैं-
- हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद – बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक, जहाँ होलिका का दहन होता है।
- श्री चैतन्य महाप्रभु का अवतार- 1486 ईस्वी में इसी दिन चैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ था जिन्हें कृष्ण का ही स्वरूप माना जाता है।
आधुनिक समय में प्रासंगिकता और पर्यावरण
आज के समय में डोल पूर्णिमा को इको-फ्रेंडली तरीके से मनाने पर जोर दिया जा रहा है। प्राकृतिक फूलों से बने रंगों और अबीर का उपयोग परंपरा और प्रकृति दोनों का सम्मान करता है।







