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15 फरवरी महाशिवरात्रि सृष्टि के सृजन और मिलन का महापर्व

15 फरवरी महाशिवरात्रि सृष्टि के सृजन और मिलन का महापर्व
नवजोत कौर सिद्धू
On: फ़रवरी 14, 2026 12:38 अपराह्न
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महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के मिलन का वह महापर्व है जो आध्यात्मिक ऊर्जा, श्रद्धा और भक्ति की त्रिवेणी है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आने वाली यह रात्रि अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है।

महाशिवरात्रि –  सृष्टि के सृजन और मिलन का महापर्व

महाशिवरात्रि का पौराणिक महत्व और कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन की महिमा के पीछे तीन प्रमुख घटनाएं बताई जाती हैं-

  • शिव और शक्ति का विवाह – सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। यह वैराग्य का गृहस्थ जीवन से मिलन का प्रतीक है।
  • ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य –  शिवपुराण के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में इसी दिन भगवान शिव निराकार रूप से साकार रूप (अग्नि स्तंभ) में प्रकट हुए थे। ब्रह्मा और विष्णु जी के बीच श्रेष्ठता के विवाद को सुलझाने के लिए शिव ‘ज्योतिर्लिंग’ के रूप में प्रकट हुए थे।
  • हलाहल विष का पान-  समुद्र मंथन के दौरान जब कालकूट विष निकला, तो संसार की रक्षा के लिए शिव ने उसे पी लिया और अपने कंठ में धारण किया, जिससे वे ‘नीलकंठ’ कहलाए।

साल में कितनी शिवरात्रियाँ आती हैं?

अक्सर लोग भ्रमित रहते हैं कि शिवरात्रि साल में कितनी बार आती है। वास्तव में

मासिक शिवरात्रि-  हिंदू कैलेंडर के अनुसार, प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को ‘मासिक शिवरात्रि’ मनाई जाती है। इस प्रकार साल में 12 शिवरात्रियाँ होती हैं।

महाशिवरात्रि-  फाल्गुन मास की चतुर्दशी को आने वाली शिवरात्रि को ‘महाशिवरात्रि’ कहा जाता है। यह साल की सबसे बड़ी और मुख्य शिवरात्रि मानी जाती है क्योंकि इस दिन ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है कि मनुष्य के भीतर की आध्यात्मिक ऊर्जा स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर बढ़ती है।

भगवान शिव का स्वरूप – प्रतीकों का अर्थ

शिव का स्वरूप निराला है, उनके शरीर पर धारण की गई प्रत्येक वस्तु का एक गहरा अर्थ है

प्रतीकअर्थ 
जटाएँअंतरिक्ष का प्रतीक 
चंद्रमामन की शांति और समय का नियंत्रण 
त्रिशूलतीन गुण (सत्व, रज, तम) और तीन काल (भूत, वर्तमान, भविष्य) 
तीसरा नेत्रविवेक और अज्ञान का नाश करने वाली दृष्टि 
भस्मसंसार की नश्वरता का प्रतीक 
सर्प (वासुकी)कुंडलिनी शक्ति और अहंकार पर नियंत्रण 

महाशिवरात्रि व्रत और पूजा विधि

इस दिन भक्त उपवास रखते हैं और शिवलिंग पर विशेष सामग्री अर्पित करते हैं

  • पंचामृत स्नान-  दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अभिषेक।
  • बिल्वपत्र-  तीन पत्तों वाला बेलपत्र शिव के तीन गुणों का प्रतीक है।
  • धतूरा और भांग-  ये शिव को प्रिय हैं क्योंकि वे विषैले और त्यागे हुए पदार्थों को भी स्वीकार करते हैं।
  • रात्रि जागरण– इस रात जागने का विशेष महत्व है ताकि रीढ़ की हड्डी सीधी रहे और ऊर्जा का प्रवाह बेहतर हो।

आध्यात्मिक कविता- 

“ओघड़दानी शिव”

शून्य से जो जन्म ले, वो शिव का ही स्वरूप है,

कण-कण में जो व्याप्त है, वही सत्य का रूप है।

न आदि है, न अंत है, वो अघोर है, प्रचंड है,

मृत्यु जिसका दास है, वो देवों का मार्तंड है।

कंठ में विष का वास है, फिर भी जग में प्यार है,

जटा से बहती जाह्नवी, अधरों पर ओंकार है।

सती का प्रेम साथ है, पार्वती का साथ है,

जो त्याग दे संसार को, वही शिव के पास है।

डम-डम डमरू बाजता, गूँज उठा ब्रह्मांड है,

तांडव की हर ताल पर, मिटता पाखंड है।

भस्म रमाए अंग पर, जो श्मशान का राजा है,

वही तो मेरे महादेव, वही सबसे साझा है।

महाशिवरात्रि का वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व

  • ऊर्जा का प्रवाह-  खगोलीय रूप से, इस रात पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध इस तरह स्थित होता है कि मनुष्य के भीतर ऊर्जा का ऊर्ध्वगामी (Upward) प्रवाह सहज हो जाता है।
  • समरसता का संदेश – शिव की बारात में देवता, मनुष्य, भूत-प्रेत और पशु-पक्षी सभी शामिल थे। यह समाज के हर वर्ग को एक साथ स्वीकार करने का संदेश देता है।
  • संयम और अनुशासन-  उपवास के माध्यम से भक्त अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना सीखते हैं।

महाशिवरात्रि केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर छिपे शिवत्व को पहचानने का अवसर है। यह पर्व सिखाता है कि हम अपने भीतर के ‘विष’ (बुराइयों) को गले में रोकें और संसार को ‘अमृत’ (प्रेम और सेवा) प्रदान करें।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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