नर्मदा जयंती के पावन पर्व पर यह लेख मां रेवा के प्रति आपकी गहरी आस्था को दर्शाता है। 25 जनवरी 2026 को आने वाली यह तिथि भक्तों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है।
नर्मदा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत की हृदय रेखा और साक्षात् शिव-पुत्री हैं। माघ शुक्ल सप्तमी को जब सूर्य देव अपनी रश्मियों से धरा को आलोकित करते हैं, तब मां नर्मदा का अवतरण उत्सव मनाया जाता है।
तिथि और शुभ मुहूर्त (25 जनवरी 2026)
वर्ष 2026 में नर्मदा जयंती 25 जनवरी को मनाई जाएगी।
सप्तमी तिथि प्रारंभ – 24 जनवरी 2026 की शाम से।
सप्तमी तिथि समाप्त – 25 जनवरी 2026 की शाम तक।
सर्वोत्तम समय – सूर्योदय के समय स्नान और दोपहर (अभिजीत मुहूर्त) में विशेष पूजन का विधान है।
पौराणिक उत्पत्ति – भगवान शिव के पसीने से जन्म
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव ने अंधकासुर का वध किया और तांडव किया, तब उनके शरीर से निकले स्वेद (पसीने) की बूंदों से एक कन्या का जन्म हुआ। वह कन्या इतनी सुंदर थी कि देवताओं ने उसका नाम ‘नर्मदा’ रखा (नर्म = सुख, दा = देने वाली)। शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे प्रलय काल में भी नष्ट नहीं होंगी और उनका हर पाषाण (पत्थर) ‘नर्मदेश्वर शिवलिंग’ कहलाएगा।
उद्गम स्थान – अमरकंटक की महिमा
मां नर्मदा का उद्गम मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित अमरकंटक की पहाड़ियों से होता है। यह मैकल पर्वत श्रृंखला का हिस्सा है, इसलिए मां को ‘मैकलसुता’ भी कहा जाता है। अमरकंटक में ‘नर्मदा कुंड’ वह स्थान है जहाँ से मां की जलधारा प्रकट होती है।
क्या करें नर्मदा जयंती पर
इस दिन सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए भक्तों को निम्नलिखित कार्य करने चाहिए
- ब्रह्म मुहूर्त स्नान – संभव हो तो नर्मदा जल में स्नान करें, अन्यथा घर पर जल में थोड़ा नर्मदा जल मिलाकर स्नान करें।
- दीपदान – शाम के समय आटे के दीपक बनाकर उसमें घी डालकर नदी में प्रवाहित करें। यह ‘पाप मुक्ति’ का सबसे बड़ा मार्ग माना गया है।
- अभिषेक – मां की प्रतिमा या प्रतीकात्मक जल का दूध, दही, घी, शहद और शक्कर (पंचामृत) से अभिषेक करें।
- चुनरी मनोरथ – नर्मदा जी को लंबी चुनरी चढ़ाने की परंपरा है, जिससे परिवार में खुशहाली आती है।
आस्था की उलटी यात्रा: सिर और हाथों के सहारे मां नर्मदा की परिक्रमा कर रहे धर्मपुरी महाराज
“गंगा स्नाने, नर्मदा दर्शने”: दर्शन मात्र से पाप मुक्ति क्यों?
शास्त्रों में कहा गया है-
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥
माना जाता है कि गंगा में स्नान करने से जो फल मिलता है, वह मां नर्मदा के केवल दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है। इसका कारण उनकी तपस्या और शिव का वरदान है। नर्मदा ‘नित्य’ और ‘शाश्वत’ हैं। इनके दर्शन से मन की चंचलता समाप्त होती है और नकारात्मकता का नाश होता है।
नर्मदा परिक्रमा का महत्व और लाभ
संसार में नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी पूरी परिक्रमा की जाती है (लगभग 3,300 किमी)।
- आध्यात्मिक लाभ – अहंकार का नाश और आत्म-साक्षात्कार।
- वैज्ञानिक लाभ – लंबी पैदल यात्रा से स्वास्थ्य और प्रकृति के साथ जुड़ाव।
- मान्यता – कहा जाता है कि परिक्रमा करने वाले भक्त को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।
‘हर कंकर में शंकर’ का रहस्य
नर्मदा की धारा इतनी तीव्र और पवित्र है कि इसके वेग से रगड़ खाकर पत्थर स्वयं शिवलिंग का आकार ले लेते हैं। इन पत्थरों को ‘नर्मदेश्वर शिवलिंग’ कहा जाता है। इन्हें प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती; ये स्वयं सिद्ध होते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि नर्मदा का हर पत्थर शिव है।
जीवनदायिनी नर्मदा – एक आर्थिक और सामाजिक आधार
नर्मदा केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि जीवनदायिनी भी हैं:
- कृषि – मध्य प्रदेश और गुजरात के लाखों किसानों की खेती नर्मदा के जल पर निर्भर है।
- पेयजल – इंदौर, भोपाल, जबलपुर और अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों की प्यास मां नर्मदा बुझाती हैं।
- ऊर्जा – नर्मदा पर बने बांधों (जैसे सरदार सरोवर) से बिजली का उत्पादन होता है।
मुख्य राज्य और अमरकंटक के कार्यक्रम
नर्मदा जयंती मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में बड़े उत्साह से मनाई जाती है।
अमरकंटक में उत्सव
वहां तीन दिवसीय उत्सव होता है जिसमें संतों का समागम, सांस्कृतिक कार्यक्रम और विशाल भंडारे होते हैं। रात के समय होने वाली ‘महाआरती’ का दृश्य अलौकिक होता है, जहाँ हजारों दीपक एक साथ जलते हैं।
सुख और समृद्धि का मार्ग
नर्मदा जयंती हमें प्रकृति के संरक्षण और अपनी जड़ों से जुड़ने का संदेश देती है। यदि हम इस दिन निष्काम भाव से मां की सेवा करते हैं और जल प्रदूषण न करने का संकल्प लेते हैं, तो मां निश्चित रूप से हमें सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करती हैं।
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