डेलीबार्ता,डिंडौरी(म.प्र.)।आस्था, श्रद्धा और तपस्या की कई मिसालें आपने देखी और सुनी होंगी, लेकिन डिंडौरी जिले के रत्ना गांव के धर्मपुरी महाराज जो कर रहे हैं, वह न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि मन को भीतर तक झकझोर देने वाला भी है। मां नर्मदा की परिक्रमा आमतौर पर लोग पैदल, दंडवत या कभी-कभी कठिन व्रतों के साथ करते हैं, लेकिन धर्मपुरी महाराज की तपस्या इन सबसे अलग है। वे मां नर्मदा की अधोमुखी परिक्रमा कर रहे हैं—यानी सिर जमीन पर, हाथों के सहारे आगे बढ़ते हुए। यह दृश्य जहां भी पहुंचता है, वहां श्रद्धालु स्वतः ही रुक जाते हैं। फूलों की वर्षा होती है, जयकारे गूंजते हैं और हर आंख इस अद्भुत तपस्या को निहारती रह जाती है। धर्मपुरी महाराज की यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था को कर्म में बदलने का दुर्लभ उदाहरण बन गई है।
विजयदशमी से शुरू हुई तपस्या
धर्मपुरी महाराज ने इस कठिन तपस्या की शुरुआत विजयदशमी के पावन पर्व पर मां नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से की। अमरकंटक, जहां से नर्मदा की जीवनदायिनी धारा निकलती है, वहीं से महाराज ने यह संकल्प लिया कि वे इस बार परिक्रमा सामान्य तरीके से नहीं, बल्कि अधोमुखी रूप में पूरी करेंगे।
महाराज बताते हैं कि यह संकल्प उनके लिए अचानक लिया गया निर्णय नहीं था। इसके पीछे वर्षों की साधना, अनुभव और गुरु का आदेश है। चार बार पैदल नर्मदा परिक्रमा कर चुके धर्मपुरी महाराज के लिए यह पांचवीं परिक्रमा है, लेकिन स्वरूप सबसे कठिन और तपस्यापूर्ण है।
प्रतिदिन केवल तीन किलोमीटर की यात्रा
अधोमुखी परिक्रमा का अर्थ ही है वह है हर कदम पर संघर्ष। सिर और हाथों के बल आगे बढ़ना आसान नहीं होता। यही कारण है कि धर्मपुरी महाराज प्रतिदिन लगभग तीन किलोमीटर ही यात्रा करते हैं। यह दूरी सुनने में भले कम लगे, लेकिन इस तरह की शारीरिक साधना में हर मीटर एक परीक्षा होती है।
सड़क, कंकड़, मिट्टी, धूप और ठंड सब कुछ शरीर पर सीधा असर डालता है। इसके बावजूद महाराज के चेहरे पर न थकान है, न ही किसी तरह की शिकायत। उनकी आंखों में बस एक ही भाव दिखाई देता है अडिग संकल्प।
श्रद्धालुओं का उमड़ता सैलाब
जहां-जहां से धर्मपुरी महाराज की अधोमुखी परिक्रमा गुजरती है, वहां श्रद्धालुओं की भीड़ लग जाती है। ग्रामीण महिलाएं सिर पर कलश लेकर आती हैं, युवक फूल बरसाते हैं और बुजुर्ग हाथ जोड़कर आशीर्वाद लेते हैं। कई स्थानों पर लोग महाराज के चरणों में जल अर्पित करते हैं, तो कहीं उन्हें देखने मात्र से लोग भाव-विभोर हो जाते हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि ऐसी तपस्या उन्होंने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखी। यह दृश्य केवल आंखों से देखने का नहीं, बल्कि मन से महसूस करने का है।
धर्मपुरी महाराज का संदेश
धर्मपुरी महाराज कहते हैं,- “जब श्रद्धा कर्म बन जाती है, तब असंभव भी संभव हो जाता है।”
उनके अनुसार यह परिक्रमा किसी को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और मां नर्मदा के प्रति समर्पण का मार्ग है। वे मानते हैं कि आज के भौतिक युग में जब लोग सुविधा और आराम को ही सब कुछ मान बैठे हैं, तब ऐसी तपस्या मनुष्य को अपने भीतर झांकने का अवसर देती है।
नर्मदा परिक्रमा का विशेष महत्व
गौरतलब है कि मां नर्मदा विश्व की एकमात्र ऐसी नदी हैं, जिनकी परिक्रमा की जाती है। अमरकंटक से लेकर गुजरात के खंभात की खाड़ी तक फैली यह परिक्रमा लगभग सैकड़ों किलोमीटर लंबी होती है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, पैदल नर्मदा परिक्रमा पूरी करने में लगभग तीन साल, तीन महीने और तेरह दिन का समय लगता है। इस दौरान परिक्रमा करने वाला व्यक्ति नदी को कभी पार नहीं करता, बल्कि एक ही तट से यात्रा पूरी करता है।
चार बार पूरी कर चुके हैं पैदल परिक्रमा
धर्मपुरी महाराज इससे पहले चार बार पैदल नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। हर परिक्रमा उनके जीवन में नया अनुभव और नई सीख लेकर आई। लेकिन इस बार गुरु के आदेश पर उन्होंने स्वयं को और कठोर तपस्या के लिए तैयार किया।
उनका कहना है कि गुरु का आदेश उनके लिए सर्वोपरि है। अधोमुखी परिक्रमा का संकल्प भी उन्होंने गुरु की आज्ञा से ही लिया है। यही कारण है कि वे इसे किसी चमत्कार या प्रदर्शन की तरह नहीं, बल्कि साधना की तरह देख रहे हैं।
शारीरिक कष्ट, लेकिन अडिग मन
इस परिक्रमा में शरीर को असहनीय पीड़ा होती है। सिर और हाथों पर लगातार दबाव, घाव और थकान स्वाभाविक हैं। इसके बावजूद महाराज न तो रुकते हैं, न ही मार्ग बदलते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि कई बार उनके सिर और हाथों पर चोट के निशान साफ दिखाई देते हैं, लेकिन महाराज मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते हैं। मानो शरीर से ऊपर उठकर मन ने इस यात्रा को संभाल लिया हो।
आस्था की जीवंत तस्वीर
धर्मपुरी महाराज की अधोमुखी नर्मदा परिक्रमा आज पूरे नर्मदा अंचल में चर्चा का विषय बनी हुई है। यह तपस्या लोगों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि आस्था केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में भी होनी चाहिए। यह दृश्य बताता है कि विश्वास और संकल्प मिल जाएं, तो कठिन से कठिन मार्ग भी पार किया जा सकता है। महाराज की यह यात्रा सिर्फ उनकी व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि समाज के लिए भी एक संदेश है, कि सच्ची भक्ति में त्याग, अनुशासन और धैर्य अनिवार्य हैं।
कब पूरी होगी यह अद्भुत तपस्या?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह अधोमुखी नर्मदा परिक्रमा कितने दिनों में पूरी होगी। प्रतिदिन सीमित दूरी तय करने और शारीरिक सीमाओं को देखते हुए यह यात्रा वर्षों तक चल सकती है।
हालांकि, धर्मपुरी महाराज के लिए समय से ज्यादा महत्वपूर्ण संकल्प है। उनका कहना है कि जब तक मां नर्मदा की कृपा और गुरु का आशीर्वाद साथ है, तब तक मार्ग की कठिनाइयों की उन्हें चिंता नहीं।
आस्था जो मन को शुद्ध कर दे
धर्मपुरी महाराज की यह अधोमुखी परिक्रमा न सिर्फ चौंकाती है, बल्कि मन को शुद्ध भी करती है। यह हमें याद दिलाती है कि आस्था दिखावे का विषय नहीं, बल्कि आत्मा की साधना है। नर्मदा तट पर आगे बढ़ते महाराज का यह सफर आने वाले समय में आस्था और तपस्या की मिसाल के रूप में याद किया जाएगा, जहां सिर झुकाकर चलना ही सबसे ऊंची साधना बन गया।







