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साख के संकट में सरकारी खेल संस्थान – खेल विकास कोष में भारी गिरावट पर संसदीय समिति ने जताई चिंता

साख के संकट में सरकारी खेल संस्थान - खेल विकास कोष में भारी गिरावट पर संसदीय समिति ने जताई चिंता
नवजोत कौर सिद्धू
On: मई 14, 2026 1:45 अपराह्न
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नई दिल्ली। देश में खेलों को बढ़ावा देने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय खिलाड़ियों को तैयार करने के लिए बनाया गया ‘नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फंड’ (एनएसडीएफ) खुद अब आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा है। संसद की एक स्थाई समिति ने इस फंड में लगातार हो रही कमी और इसके पैसों के इस्तेमाल के तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। समिति की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में इस फंड की राशि में भारी गिरावट आई है, जिसका सीधा असर खिलाड़ियों की ट्रेनिंग और सुविधाओं पर पड़ सकता है।

क्या है एनएसडीएफ?

नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फंड की स्थापना 1998 में की गई थी। इसका मुख्य मकसद सरकार से मिलने वाले बजट के अलावा निजी और सरकारी कंपनियों से पैसा इकट्ठा करना है, ताकि उस राशि को सीधे तौर पर खिलाड़ियों के विकास और आधुनिक खेल ढांचे पर खर्च किया जा सके। फिलहाल, खेल मंत्रालय के सामने चुनौती यह है कि वह कैसे इस गिरते फंड को दोबारा बढ़ाए और व्यवस्था में पारदर्शिता लाकर कॉरपोरेट जगत का विश्वास बहाल करे।

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दो साल में आधी रह गई आय

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फंड में आने वाली राशि में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है। साल 2023-24 में इस फंड को करीब 85 करोड़ रुपये मिले थे, जो साल 2025-26 तक आते-आते महज 37 करोड़ रुपये रह गए। यानी मात्र दो साल के भीतर ही फंड की कमाई आधे से भी कम हो गई है। संसदीय समिति ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो ओलंपिक और विश्व स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों को दी जाने वाली सहायता राशि में कटौती करनी पड़ सकती है।

सरकारी कंपनियों ने खींचे हाथ

इस फंड में सबसे बड़ा योगदान सार्वजनिक क्षेत्र की सरकारी कंपनियों का रहता है। कोल इंडिया, ओएनजीसी और अन्य बड़ी कंपनियां हर साल अपने सामाजिक दायित्व के तहत करोड़ों रुपये खेल विकास के लिए देती हैं। रिपोर्ट बताती है कि 2023-24 में जहां 10 बड़ी सरकारी कंपनियों ने फंड में पैसा दिया था, वहीं 2025-26 में इनकी संख्या घटकर केवल 6 रह गई है। कोल इंडिया जैसी कंपनियों का योगदान भी पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम हुआ है।

निजी अकादमियों पर कॉरपोरेट को ज्यादा भरोसा

समिति के सामने पेश किए गए एक उदाहरण ने खेल मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि बेंगलुरु स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के केंद्र को कॉरपोरेट कंपनियों से केवल 5 करोड़ रुपये का फंड मिला, जबकि उसी शहर की एक निजी बैडमिंटन अकादमी को कंपनियों ने 25 करोड़ रुपये दे दिए। समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि यह अंतर बताता है कि निजी कंपनियां अब सरकारी खेल संस्थानों के बजाय निजी अकादमियों को अधिक भरोसेमंद मान रही हैं। कंपनियों को लगता है कि उनका पैसा निजी संस्थानों में ज्यादा बेहतर तरीके से खर्च हो रहा है और वहां से परिणाम भी अच्छे मिल रहे हैं।

खिलाड़ियों के फंड से अधिकारियों की सुख-सुविधा पर खर्च

रिपोर्ट में फंड के दुरुपयोग को लेकर भी चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। जानकारी मिली है कि जिस पैसे का इस्तेमाल खिलाड़ियों की विदेशों में ट्रेनिंग और आधुनिक उपकरणों के लिए होना चाहिए था, उसका एक हिस्सा दिल्ली में सरकारी आवासों और अधिकारियों से जुड़े संस्थानों में खेल सुविधाएं बनाने में खर्च किया गया। साल 2021 से 2025 के बीच लगभग 6 करोड़ रुपये की राशि ऐसे स्विमिंग पूल और टेनिस कोर्ट के नवीनीकरण पर खर्च की गई, जिसका सीधा लाभ देश के उभरते खिलाड़ियों को नहीं मिल रहा था। खेल विशेषज्ञों और विपक्षी दलों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि खिलाड़ियों के हक के पैसे को अधिकारियों की विलासिता और आवासीय परिसरों की सजावट पर खर्च करना नैतिक रूप से गलत है।

तैयारियों पर पड़ेगा बुरा असर

देश के कई खेल विशेषज्ञों का मानना है कि इस फंड की कमी का सबसे बुरा असर ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम’ (टॉप्स) जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं पर पड़ सकता है। इसी फंड के जरिए एलीट खिलाड़ियों को कोच, फिजियो और विदेशों में अभ्यास की सुविधा मिलती है। बजट कम होने से उन युवा खिलाड़ियों का सपना टूट सकता है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और पूरी तरह सरकारी मदद पर निर्भर हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि फंड में पारदर्शिता की कमी न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि यह देश की खेल साख को भी प्रभावित कर रही है।

समिति ने दिए सुधार के सुझाव

संसदीय समिति ने केंद्र सरकार को कुछ कड़े कदम उठाने की सलाह दी है। समिति का कहना है कि फंड के हर पैसे का हिसाब सार्वजनिक किया जाए ताकि दान देने वाली कंपनियों का भरोसा फिर से जीता जा सके। इसके साथ ही वित्त मंत्रालय और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के साथ मिलकर ऐसे नियम बनाने की आवश्यकता है जिससे सरकारी खेल संस्थानों को भी आसानी से सीएसआर फंड मिल सके। समिति ने उन खर्चों की जांच करने को भी कहा है जो खिलाड़ियों के बजाय आवासीय परिसरों या अधिकारियों के लाभ के लिए किए गए हैं।

Swati Pandey

A versatile writer mainly works on trending news, daily updates from politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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